जाति नहीं, काम देखिए...


नरेंद्र मोदी मंत्रिमंडल का विस्तार होना है। संभवतः कल नए मंत्री शपथ लेंगे। इस बीच छह मंत्री हटाए (इस्तीफा के जरिए) गए हैं- जल संसाधन मंत्री उमा भारती, कलराज मिश्र, महेंद्रनाथ पांडेय, कौशल विकास मंत्री राजीव प्रताप रूडी, संजीव बालियान और फग्गन सिंह कुलस्ते। जाहिर है इनकी भी जाति है जो मंत्री थे तब भी थी और अब नहीं हैं, तब भी है। इसमें दो मंत्री मेरी जाति (ब्राह्मण) के भी थे...।

... सवाल यह है कि क्या हम सिर्फ जाति के आधार पर इन नेताओं का समर्थन करते हुए बतौर सांसद/मंत्री इनके काम-काज, इनके दायित्व को नजरअंदाज कर जाएं? भूल जाएं कि ये मंत्री देश की हालत सुधारने के लिए, अपने विभाग के कार्य करने के लिए बनाए गए थे, न कि अपनी-अपनी जातियों का प्रतिनिधत्व करने के लिए? दिल पर हाथ रखकर कहिए कि क्या इनमें से किसी के काम दिखाई दिए आपको? अब जब ये मंत्री नहीं रहे तो देश के लिए इनकी उपलब्धियां न पूछिए लेकिन बतौर सांसद अपने क्षेत्र के लिए भी इनकी उपलब्धियां क्या हैं? पूछिए, जवाब नहीं मिलेगा, ना रुड़ी से, ना कलराज से...। थोड़ा सा यदि उमा भारती को छोड़ दें (जो कि मेरी जाति की नहीं हैं) तो बाकी सिर्फ मंत्री पद की शोभा बने हुए थे, बल्कि भार कह सकते हैं। किसी सरकारी कर्मचारी की तरह ड्यूटी के दिन काट रहे थे, न कि देश की बेहतरी के लिए कार्य कर रहे थे। ऐसे में क्या इनका बचाव सिर्फ जाति के नाम पर सही है? आखिर देश को कहां ले जाना चाहते हैं हम? सिर्फ मोदी को दोष देकर, नसीहत देकर देश बदल जाएगा क्या? हम अपनी जिम्मेदारी भूल जाएं? अपनी सोच न बदलें तो देश बदल जाएगा क्या? सोचिए यदि प्रधानमंत्री ब्राह्मण हो जाए, मंत्री भी हो जाएं, विधायक हो जाएं लेकिन सड़कें न बनें, बिजली न आए, शिक्षा बेहतर न हो, तो क्या ब्राह्मणों का कल्याण सम्भव है? ठाकुरों का है कि दलितों का है? क्या हमारे संविधान ने यह छूट दी है या दी जानी चाहिए कि जब राजपूत मंत्री रोड बनवाए तो उस पर सिर्फ राजपूत चलें? ब्राह्मण बिजली लाए तो सिर्फ उसी जाति वालों के घर रोशन हों? यदि काम होगा तो सबके लिए यदि काम करने वाला मंत्री नहीं होगा तो उस जाति विशेष के लोग भी उतना ही झेलेंगे, जितना कि अन्य। इसलिए जाति के नाम पर किसी का समर्थन, बचाव बंद कीजिए। कम से कम समझदार और पढ़े-लिखे सामाजिक लोगों से तो यही उम्मीद है।

2014 को याद कीजिए। देश ने कोई मंत्री नहीं चुना था। हमने सिर्फ प्रधानमंत्री चुना था। सिर्फ नरेंद्र मोदी पर भरोसा किया और उनके नाम पर जो भी आया, सबको जीता दिया बिना उसकी जाति देखे। मंत्री उन्हें नरेंद्र मोदी ने बनाया और हटाया (इस्तीफा) भी। देश ने भरोसा सिर्फ मोदी पर किया इसलिए सारे सवाल भी उन्हीं से पूछे जा रहे हैं। जवाब उन्हें देना है, इन मंत्रियों को नहीं। इसलिए चिंता तो उन्हें ही करनी है कि कैसे लोगों को मंत्री बनाएं कि 2019 में जनता से सामना हो तो जवाब दे सकें, न कि ऐसे मंत्री हों जो इस हालत में पहुंचा दें कि जवाब ही न सूझे। मेरी समझ में तो अब भी कई नाकारा मंत्री हैं जो मोदी का नाम खराब कर रहे हैं, देश का कीमती समय बर्बाद कर रहे हैं। इन्हें भी हटाकर किसी अच्छे को मौका देना चाहिए। यदि नितिन गडकरी, सुषमा स्वराज को छोड़ दें तो कोई मंत्री ऐसा नहीं दिखता जो नरेंद्र मोदी के मंत्रिमंडल में रहने लायक है। एक ऐसा प्रधानमंत्री जो 18 घण्टे काम करता हो, उसके मंत्रिमंडल में सिर्फ जाति के नाम पर कोई बैठा रहे, यह उम्मीद हम करें भी क्यों?

आपकी निजी राय कुछ और भी हो सकती है लेकिन मेरा मानना है कि देश के फैसले देश हित में लिए जाने चाहिए, किसी जाति-धर्म विशेष के हित में नहीं और इसलिए यह फैसला सही है। इसका हम स्वागत करते हैं। साथ ही प्रधानमंत्री से अपेक्षा करते हैं कि मंत्रिमंडल विस्तार के समय जो नए मंत्री आएंगे वह भी अपनी योग्यता के आधार पर शामिल किए जाएंगे, न कि उनकी जाति या क्षेत्र विशेष से होने को उनकी योग्यता मान ली जाएगी।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट