राम-राम सत है, हर रावण की यही गत है
'राम तेरे युग का रावण अच्छा था...!' खूब शेयर हो रहा है। कुछ के अंदर का रावण अट्टाहास कर रहा है। कह रहा है कि क्या तुममें से है कोई राम...? जो मुझे मारेगा...?
रावण को अच्छा कहने वाले और उसे मारने के लिए राम को ढूंढने वाले दोनों ही बहानेबाज हैं। ये नहीं चाहते कि बुराई खत्म हो, सच्चाई जीते इसलिए बार-बार रावण के पुतले और कलाकार राम तक ही जाकर ठहर जाते हैं। प्रतीकों तक पहुंचना नहीं चाहते हैं। यह अपनी सारी बहस पुतलों तक रखते हैं और रावण को बचाने के लिए जितना कर सकते हैं, करते हैं क्योंकि इनके अंदर का रावण अपना बचाव चाहता है, ठीक वैसे ही जैसे हर अपराधी बचना चाहता है, अपने बचाव में तर्क गढ़ता है, उसकी बुराइयों के लिए सजा दिए जाने पर वह अपनी अच्छाइयों का बखान करने लगता है...।
हमें समझना होगा कि हम जिसेे जलाते हैं, वह रावण कौन है और जो उसका वध करता है, वह राम कौन हैं। मित्र मेरे, वह रावण, लंका वाला वही रावण नहीं है जिसे वेदों का ज्ञान है, महापंडित है, अनन्य शिव भक्त है...। वह रावण, सिर्फ वह रावण है जो महाअहंकारी है, जो छल करता है, स्त्री हरण करता है और उसे उचित भी समझता है। हम रावण के रूप में सिर्फ उसकी बुराइयों का दहन करते हैं। और यदि आप यह भी मानते हैं कि पुतले के रूप में जलने वाला प्रतीक रावण, सम्पूर्ण रावण ही है जिसमें अच्छाई भी समाहित है तब भी उसकी वही गति होनी है। आप अच्छाइयों की खान हो जाएं, तब भी आपकी बुराइयों की सजा आपको वैसी ही मिलनी है, जैसी उसकी होती है...।
पुतले से बाहर निकलिए और विजयादशमी के संदेश तक पहुंचिए। अंदर के रावण के बचाव के बहाने न बनाइए, उसे खत्म करने का प्रयास कीजिए। और इसे इतना कठिन भी न बनाइए। बहुत सरल है ऐसा करना...। रावण एक बुराई है, जिसे मारने के लिए राम एक अच्छाई है; तो अपने अंदर अच्छाई को लाइए, बुराई को मरना ही है। और इसके लिए आपको अयोध्या वाले राम बनने की कोई आवश्यकता नहीं क्योंकि आपको लंका वाले रावण को मारना ही नहीं है। बिल्कुल तनाव न लीजिए। बहुत कठिन लगता है यह राम-रावण प्रसंग तो छोड़ दीजिए इसे। आप अपने अंदर के रावण को न मारिए, कोई बात नहीं, अंदर के राम को न जगा पाएं तो भी ठीक है; बस अपने अंदर के इंसान को न मरने दीजिए, इतना काफी है...।
विजयादशमी पर रावण दहन का यह बहुत ही सरल संदेश है फिर भी आप ना समझना चाहें तो और बात है। आपका ध्यान राम की तरफ न जाए, जलतेे हुए रावण में अच्छाई नजर आए तो और बात है। आपको मां दुर्गा में खोंट और, महिषासुर अपना पूर्वज नजर आए तो और बात है। बुराई पर अच्छाई के विजय का यह उत्सव भी आपको किसी अपने की हत्या का समारोह नजर आए तो इतने भी नासमझ नहीं हम कि ना समझ पाएं कि क्या बात है...।
जो राम (इंसान) बनने के लिए तैयार हैं उनके लिए शुभकामना; जो अपने अंदर के रावण (बदमाश) के बचाव में लगे हैं, उन्हें राम सद्बुद्धि दें।
विजयादशमी की बधाई !

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणियों का स्वागत है लेकिन फूहड़ शब्द निषेध हैं।