इस साजिश में सब शामिल हैं...
सोच तो हम भी यही रहे हैं कि अब कोई राजनीतिक पोस्ट न करें, किसी नेता के बारे में कुछ न कहें, कोई व्यवस्था मेरे निशाने पर न हो। मेरा भी मन करता है कि जो अखबार में लिखना होता है वही बात ब्लॉग, फेसबुक पर न लिखना पड़े। यहां हम कुछ कविताएं लिखें, कहानियां लिखें, कुछ शायरी-वायरी हो... लेकिन कैसे? कैसे देखें कि हमें हकीकत दिखाई न दे? कैसे सुनें कि हमें किसी की चीख सुनाई न दे? किस तरह यूं संवेदनशील हो जाएं कि हर हादसा, हर घटना हमें बस रूटीन लगे? हम कैसे इतना समझदार हो जाएं कि लड़कियों को छेड़े जाने की घृणित घटना के बाद के विरोध को महज राजनीतिक साजिश करार देकर मूल समस्या से सबका ध्यान भटका दिया जाए और हमें इतनी सी भी बात समझ में न आए?
बीएचयू में लड़कियों से छेड़खानी हुई। न जांच हुई, ना कार्रवाई हुई। जो उसके बाद हुआ उस पर हम नहीं जा रहे। हमें उसके बाद के घटनाक्रम से कोई मतलब ही नहीं, हमें सिर्फ इससे मतलब है कि छेड़खानी हुई, होती है, क्यों होती है, कार्रवाई नहीं हुई, क्यों नहीं होती है? सबकी तरह हमें यह नहीं जानना कि आंदोलन करने वाले कौन थे? हमें यह जानना है कि छेड़खानी कौन करते हैं? हमें उस घटनाकम्र की तरफ जाना ही नहीं, जो रचा ही इसलिए गया है कि हम 'शुरुआत' भूल, सिर्फ 'अंत' को याद रखें। और इसीलिए अंत इतना धमाकेदार, इतना भयानक है कि आप उससे आगे निकलकर सोच ही ना सकें। आप लड़कियों के साथ छेड़खानी की बात भूल जाएं, आप नागरिक न रहें, आप संघी वामपंथी, मोदी भक्त, विरोधी बन जाएं। फिर, आप उसी नजर से देखें और तब आपको न लड़कियां नजर आएंगीं, ना उनकी तकलीफ। मुद्दा ही खत्म। सब साजिश नजर आएगा...।
दरअसल, यह साजिश ही है, असल मुद्दे से ध्यान भटकाने की और अभी यह खूब हो रहा है, हर घटना में हो रहा है। और देखिए कि क्या गजब की कामयाब साजिश है। किसी को वीसी अयोग्य नजर आ रहा है, किसी को रवीश के इंटरव्यू में खोट दिख रहा है, किसी को पुलिस दोषी दिख रही है, किसी को आंदोलन एक साजिश और करने वाले बाहरी नजर आ रहे हैं। हर तरफ संघी हैं, वामपंथी हैं, बीएचयू में छात्र हैं कहाँ? और लड़कियां और उनकी सुरक्षा? वह भी भला चर्चा का कोई विषय है? बेहतरीन। हर समस्या का कितना अच्छा समाधान है। बजाइए ताली, एक दिन आएगी आपकी भी बारी...।

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