... तब तो टायलेट में लिखने वाले भी पत्रकार हैं!

Gauri Lankesh
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अभी तक हमने गौरी लंकेश के बारे में कुछ नहीं कहा...। वजह थी कि हम उन्हें जानना तो दूर, उनका नाम तक नहीं सुने थे उनकी हत्या वाली घटना के पहले। ऐसे में कहते भी क्या? जिसकी लिखी आज तक एक भी खबर न पढ़ी हो, वह पत्रकार कैसा है, कितना वरिष्ठ है, कितना निष्पक्ष है, इसका दावा भी कैसे करते? इसलिए चुप रहे। हां, पत्रकार तो क्या किसी की भी हत्या घृणित है, इसलिए इसकी निंदा जरूर की। गौरी के लिए न्याय की मांग की। लेकिन जब हमने देखा कि मौत के पहले जिस गौरी को पत्रकार के रूप में हम जानते तक न थे, वह मृत्यु के उपरांत पत्रकारिता की 'ब्रांड' बनने लगी हैं, तो गौरी को अधिक से अधिक जानने की इच्छा होने लगी। गौरी के लिए न्याय की लड़ाई लड़ने वालों की हरकतें हमने देखी तो संदेह गहराया और जानना जरूरी हो गया। इतने दिनों में अब बहुत जान लिया गौरी को, बहुत पढ़ लिया इसलिए अब हमें भी कुछ कहना है...।

कहना है कि गौरी की हत्या की जितनी भी निंदा की जाए कम है लेकिन इसे 'कलम' की हत्या न कही जाए, न ही गौरी को पत्रकार कहा जाए क्योंकि एक पत्रकार का चेहरा ऐसा नहीं हो सकता। इतना घृणित, असभ्य तो कतई नहीं...। हां, हमारे समाज में मृत्यु के उपरांत किसी के बारे में टिप्पणी नहीं करने की परंपरा है लेकिन यदि इस चुप्पी से हकीकत का गला घोंटा जाने लगे तो बोलना जरूरी भी हो जाता है...।

सच यह है कि गौरी न तो महिला थी, न पत्रकार थी क्योंकि न उसमें पत्रकार की मर्यादा थी, न औरत की लाज थी। निष्पक्ष तो वह कतई नहीं थी, वह एक विचारधारा की गुलाम थी जो बाकी सभी के विचारों की हत्या चाहती थी। इसलिए पत्रकार और निष्पक्षता की ब्रांड उसे तो न ही बनाइए। उसे ही क्यों, बिना किसी के बारे में जाने किसी की भी ब्रांडिंग से बचिए और यदि दूसरा कर रहा है तो इसके प्रभाव में आने से खुद को रोकिए। जिस दिन गौरी जैसी महिला को लोग पत्रकार और उसकी लेखनी को पत्रकारिता समझने लगेंगे, उसी दिन पत्रकार और पत्रकारिता दोनों ही खत्म समझिए।

हां तो आते हैं गौरी लंकेश पर। गौरी की जगह यदि सिर्फ लंकेश कहिए तो वह बिल्कुल अपने नाम के अनुरूप ही थी। बेहद घटिया सोचती थी। उसकी यह घटिया सोच तो फिर भी चल जाती यदि वह उसे मन में रख पातीं लेकिन बेहयाई और फूहड़ता के साथ वह अपनी ओछी सोच का नंगा प्रदर्शन करती थी। सिर्फ कुछ खास लोगों, समाज को निशाने पर रखती और ख़ास लोगों, समाज और उसके विचारों का बचाव करती थी, संरक्षण देती थी जो कि उसे पढ़कर कोई भी आसानी से समझ सकता है। लेकिन, इसके बाद भी इसमें किसी को निष्पक्षता दिखाई देती है तो चश्मा ठीक कराए अपना। लंकेश ऐसे फूहड़ शब्दों का प्रयोग करती थी कि पत्रकार तो छोड़िए, एक आम सभ्य व्यक्ति भी वैसा न बोले। कोई महिला तो हरगिज नहीं।

लंकेश को पढ़ने के बाद अब न तो उसे और पढ़ने की इच्छा है, न ही उसे पत्रकार मानने को जी चाहता है क्योंकि हर लिखने वाले को पत्रकार नहीं मान सकते। जिस तरह की सोच उसकी थी, उस तरह की सोच वाले हमारे यहाँ ट्रेन के टॉयलेट में लिखा करते हैं तो क्या उन्हें भी पत्रकार मान लें? कुछ भी लिख देने वाला पत्रकार कैसे हो जाएगा? पत्रकार अपनी जिम्मेदारी से बंधा होता है, न कि किसी खास विचारधारा की गुलामी करता है। उसकी एक भाषा होती है, मर्यादा होती है लेकिन लंकेश को पढ़ने के बाद आप शर्मा जाएंगे, साथ ही क्षोभ से भर जाएंगे। ऐसों ढेरों आर्टीकल हैं जो गौरी लंकेश की हकीकत बताने के लिए काफी हैं लेकिन आप सिर्फ यही एक पढ़िए जो उसने संघ के लिए लिखा है और बताइए कि क्या कोई सभ्य महिला ऐसे लिख सकती है, पत्रकार तो भूल ही जाइए। और हां, इसके बाद भी धैर्य बचा रहे तो उसके टाइमलाइन पर चले जाइए। दावा है, गौरी को कुतिया कहने वाले दधीचि और इसमें आप कोई अंतर नहीं पाएंगे बल्कि इसकी सोच तो उससे भी खतरनाक है।
फिलहाल,
ईश्वर गौरी लंकेश की आत्मा को शांति दें।
हत्यारें जल्द ही गिरफ्त में हों।

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