बोलने, लिखने, नए लोगों के जुड़ने से ही बढ़ेगी हिंदी
हम हिंदी में बोलते, लिखते ही नहीं, हिंदी में सोचते हैं, हिंदी को जीते हैं। हमारे लिए यह अभिव्यक्ति का माध्यम ही नहीं है, रोजी—रोजगार का साधन भी है। संपूर्ण जीवन है...। इसलिए हमें हिंदी के बारे में क्या कहना? और उसके भविष्य की भी क्या चिंता करनी? जब तक हम हैं, तब तक हिंदी है और रहेगी...।
आज हिंदी पर चिंता करने वालों की बाढ़ आ गई है। वह सरकार चिंता व्यक्त कर रही है जो कभी इसे राष्ट्रभाषा की मान्यता न दे सकी। वह लोग चिंतित हैं जो घर में बच्चों को हिंदी बोलने से मना करते हैं। वह विद्वान भी चिंतित हैं जो किसी लेखक, कवि को उभरने नहीं देना चाहते यह कहकर कि यह कोई साहित्य नहीं, कविता नहीं, गद्य नहीं है। कुछ वैसे लोग भी चिंतित हैं जो हिंदी की दशा सुधारने के नाम पर नौकरी करते हैं। कथित तौर पर इनकी चिंता हिंदी की दशा सुधारने के लिए है लेकिन उस चिंता के पीछे की इनकी चिंता यह है कि कहीं हिंदी की दशा सुधर न जाए, क्योंकि तब इनकी नौकरी की जरूरत खत्म हो जाएगी...। इसलिए हिंदी के लिए यदि ऐसे लोग चिंता जाहिर कर रहे हैं तो दुखी मत होइए। अपनी हिंदी बड़ी तेजी से बढ़ रही है बिना इनकी मदद के...।
मेरा सलाम है फेसबुक, ट्विटर, ब्लॉग पर आप हिंदी में लिखने वालों को और दुत्कार है आपकी अशुद्धियां देखकर हिंदी न लिखने की सलाह देने वालों को। आपकी रचनाओं को दोयम दर्जें का कहने वाले स्वयंभू विद्वानों को। आप इनकी चिंता न कीजिए। आप लिखिए, फर्क नहीं पड़ता कि अशुद्धियां कितनी हैं। रोज सुधार हो रहा है न? यह बहुत है। उन्हें सोचने दीजिए, जो सोचते हैं कि हिंदी का अभिमन्यु पेट से ही निकलकर आएगा। आप लिखिए, आपके लिखने से ही हिंदी आगे बढ़ेगी, न कि हिंदी के स्वयम्भू विद्वानों के लिखने से। हां, उनकी किताबें अपनी अशुद्धियां दूर करने के लिए पढ़ सकते हैं लेकिन हिंदी को आप कभी भी उनसे ज्यादा बढाएंगे। हिंदी को आप जैसे ही नए पाठकों, लेखकों की जरूरत है। वे जो फेसबुक पर लिखी रचना को रचना नहीं मानते, उन्हें उनकी सोच मुबारक रहने दीजिए, आप फेसबुक वाली ही भाषा में किताबें भी लिखिए। उनकी हिंदी सिर्फ किताबी है, आपकी हिंदी ही लोक की भाषा है...। इसलिए आप इसी लोक भाषा में लोक साहित्य रचिए, उन्हें सिर्फ व्याकरण दोष निकलने में ही उम्र गंवाने दीजिए। वे रच चुके हैं, उन्हें जो रचना था। कुछ नया नहीं है उनके पास इसलिए जलन होती है जब कोई किताब उनसे अधिक बिक जाती हैं। फिर वे उसकी भाषा दोष देखते हैं और आपकी रुचि पर भी सवाल उठा सकते हैं...। लेकिन आप अब भूलकर, बिंदास होकर लिखिए। मन करे तो हिंदी-अंग्रेजी मिलाकर लिखिए। इन्हें प्लेटफॉर्म 2 को अब भी चबूतरा संख्या 2 ही लिखने दीजिए...। हिंदी के द्वारपाल हैं वे, किसी को उस तक पहुंचने नहीं देंगे। इसलिए आप खिड़की के रास्ते आइए। खूब लिखिए। मेरी मानिए आप कमाल की हिंदी लिखते हैं, लिखते रहिए और हिंदी को आगे बढ़ाते रहिए...।

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