इस 'अच्छे दिन' के लिए महाकवि हमें माफ करें...


यदि बिना किसी दुश्मनी महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला के पौत्र अखिलेश त्रिपाठी को बम लग सकता है तो वाकई डरने की जरूरत है। यह समझने की जरूरत है कि हालात यही रहे तो एक दिन सब्जी लेने जाते समय कोई बम आपको-हमें भी लग सकता है। इससे भयावह कुछ नहीं हो सकता कि राष्ट्र के महाकवि का पौत्र बेमौत मारा जाए...।

अब इससे बुरे हालात तो नहीं हो सकते कि आप कुछ न करें तो भी मार दिए जाएं। लेकिन, इसके बाद भी यदि आप इस सच्चाई को स्वीकार नहीं कर रहे हैं तो यह उस बुरे हालात का सबसे बुरा पक्ष है। यदि आप यह सोचते हैं कि यह इलाहाबाद की बात है, आपके शहर की नहीं, अखिलेश त्रिपाठी की बात है, आपकी नहीं... तो जरा चेत जाइए क्योंकि आप कभी इस हालात से खुद को अलग नहीं कर सकते। हालात गलत होंगे तो सबके लिए होंगे, आपके लिए भी। यह माहौल न बदला तो कल आप भी जाएंगे सब्जी खरीदने ही लेकिन हिस्से में मौत आएगी, अखिलेश त्रिपाठी की तरह...। आप खुद को किसी का दुश्मन होने से रोक सकते हैं, सबके दोस्त भी हो सकते हैं, हो सकता है कि कोई आपको मारने के लिए सोचे तक नहीं लेकिन जब हालात सही नहीं होंगे तो बम आपको तब भी लगेगा, गोली पर आपके नाम तब भी लिख दिए जाएंगे। इसलिए हालात बदलने के लिए कोशिश सिर्फ उन्हें नहीं करनी, जिन्हें किसी से ख़तरा है, यह कोशिश सबको करनी होगी...। अब भी मान लीजिए कि यह 'बुरे दिन' हैं तभी 'अच्छे दिन' आएंगे। यदि आपने सोच लिया कि यही अच्छे दिन हैं तो इससे भी बुरे दिन देखने के लिए तैयार हो जाइए...।

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