लक्ष्य से भटक गए या लक्ष्य ही कुछ और है...?


कलबुर्गी, अख़लाक़, दाभोलकर, लंकेश...! बस? इतनी छोटी सूची है? यह अभिव्यक्ति की आजादी की लड़ाई है या कुछ खास लोगों के लिए, कुछ खास लोगों की? किसी को इंसाफ दिलाने के लिए लड़ाई लड़नी है या किसी खास को टारगेट बनाने के लिए...? विचारों की स्वतंत्रता की लड़ाई है या किसी खास विचारधारा के खिलाफ? ...ऐसा कीजिए पहले यही तय कर लीजिए कि इंसाफ किसे-किसे दिलाना है और किसे-किसे नहीं। कौन आपके खेमे से है और कौन दूसरे खेमे से। किसकी मौत शहादत है और किसकी सिर्फ एक हादसा। कौन बड़ा पत्रकार है, कौन छोटा। कौन ब्राह्मण विरोधी है, कौन दलित विरोधी। कौन वामपंथी है, कौन संघी...।

... माफ करिए यह समय नसीहत देने का नहीं है, एक-दूसरे का साथ देने का है, हमें भी पता है। लेकिन, आप जिस तरह इस संघर्ष का अगुआ बनने या किसी और चक्कर में मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं, हमें संदेह होने लगा है। इसलिए आपके साथ या आपके पीछे खड़ा होने से पहले आपके बारे में स्पष्ट हो लेना जरूरी है, पता कर लेना जरूरी है कि हम किसको फॉलो कर रहे हैं। हां भाई, पीएम ने किसी को फॉलो किया और उसने किसी को कुतिया कहा, दोषी वह न हुआ, प्रधानमंत्री हो गए...। आरोप ऐसे लगाए जा रहे हैं जैसे कि पीएम अपने ज्योतिष ज्ञान से जान गए थे कि आने वाले समय में वह व्यक्ति 'कुतिया' शब्द का उच्चारण करने वाला है और इसके बाद भी उसे फॉलो किया? आपके 'इंसाफ की लड़ाई' में अचानक एक सिरफिरा आया, उसने एक शब्द उछाला और आप अपना लक्ष्य भूल उसके पीछे हो लिए। कातिलों पर कार्रवाई की मांग भूल 'अनफॉलो' की मांग में उलझ गए। अब इतना जानने के बाद भी हम आपके साथ ऐसे ही कैसे हो जाएं? क्या पता, आपकी मंशा क्या है? क्योंकि हरकतें संदेहपूर्ण हैं। पीएम ने ट्विटर पर फॉलो किया, हम सच में करेंगे इसलिए गलती हो गई तो मेरे पास तो 'अनफॉलो' का ऑप्शन भी नहीं होगा...। समझ रहे हैं ना आप?

कोई लड़ाई अकेले लड़ी जा सकती है लेकिन अंजाम तक पहुंचेे, इसके लिए सबको साथ लेना होगा और सब साथ हों, सबका साथ मिले इसके लिए जरूरी है कि आप अपनी नीयत भी साफ रखें। मीडिया की स्वतंत्रता की लड़ाई को अपनी व्यक्तिगत लड़ाई मत बनाइए। स्पष्ट हो लीजिए कि आप चाहते क्या हैं फिर रोड पर उतरिए। जी हां, भाई साहब! आप खुद तो भटके हैं ही, इस लड़ाई को भी भटका रहे हैं। आप भीड़ तो इकट्ठी कर रहे हैं एक पत्रकार की हत्या का विरोध करने के लिए लेकिन भीड़ मिलते ही आप विरोध किसी और का करने लग जा रहे हैं, आप हत्या की वजह ढूंढ रहे हैं लेकिन उसके पहले ही आप तय कर चुके हैं कि हत्या क्यों हुई। आप सवाल भी करते हैं कि आखिर वो कौन थे जिन्होंने लंकेश को गोली मारी लेकिन कमाल की बात यह है आपको पता है कि दोषी 'फला' है, छोड़िए, इतना लंबा क्या खींचना, जब सबकुछ आपको पता ही है तो अब फैसला भी खुद ही सुना दीजिए। हमने तो पूरा संविधान नहीं पढ़ा है, आप ज्यादा जानकार हैं। क्या पता, लोकतंत्र में 'जज' बन जाने की भी आजादी मिली हो, मौके का फायदा उठाइए, पत्रकार कब तक रहिएगा, अब खुद ही जज बन जाइए...।

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