पत्रकार के साथ वामपंथी, और वामपंथी भी ब्रांडेड होना चाहिए!
यशवंत सिंह पत्रकार हैं। उम्र से युवा हैं लेकिन पत्रकारीय अनुभव से वरिष्ठ हैं और थोड़े से वामपंथी भी हैं। आम आदमी के लिए ही लिखने वाले पत्रकार नहीं हैं, बल्कि आम आदमी के लिए लिखने वाले पत्रकारों के पत्रकार हैं। उन्हें मार पड़ी लेकिन आम आदमी तो छोड़िए, किसी पत्रकार को दर्द नहीं हुआ...। कोई आवाज नहीं आई...। हमें भी दो-चार दिन बीतने पर दर्द का अहसास हुआ है, वह भी इस भय वाले भाव के साथ कि आज हम किसी के साथ नहीं खड़ा हुए, तो कल हमारे साथ कौन खड़ा होगा...।
यशवंत कभी भी गौरी लंकेश से बड़ा नाम है। हां वे यकीनन अभी जीवित हैं लेकिन हमला तो हुआ है। फिर कोई शोर क्यों नहीं? मेरी समझ में यशवंत के बाद 'सिंह' लगा होना और उनका 'ब्रांडेड वामपंथी' नहीं होना, उनके प्रसिद्ध होते हुए भी उनके दर्द की गुमनामी का सबसे बड़ा कारण है। 'सिंह' का मतलब ही शोषक है, वे दलित होते तो समर्थन में खड़ा होने वालों के कुछ काम आ सकते थे...। कर्म से तो हर पत्रकार वामपंथी है लेकिन वामपंथी होने को साबित भी करना होता है, वामपंथ के पक्ष में सही-गलत हर हाल में खड़ा होकर। यशवंत यह भी ठीक से नहीं कर पाए। वे वामपंथी तो बने लेकिन 'ब्रांडेड वामपंथी' तब भी नहीं बन पाए। इसीलिए तो उनके पक्ष में न वामपंथ खड़ा हुआ और न विरोध में संघ और न ही इन विचारधाराओं से जुड़े बड़े पत्रकार। बाकी बिना पंथ वाले पत्रकारों को जानता ही कौन है, सो यदि उन्होंने उनके लिए आवाज भी उठाई तो नक्कारखाने की तूती साबित हुई...।
भाई, अब सब कुछ सेलेक्टिव है... दर्द भी। किसी खास के दर्द पर ही 'उनकी' आह निकलती है वरना चोट तो रोज किसी न किसी को लगती है...। आम आदमी की आवाज बनकर आप पत्रकार तो हो सकते हैं लेकिन आपके लिए आवाज सिर्फ तभी सुनाई देगी जब आप किसी खास जाति, पंथ, पार्टी का नेमप्लेट लगाए हों। और अब तो सिर्फ पंथ से होने से भी काम नहीं चलता। आपके उस पंथ से होने का खूब शोर भी होना चाहिए। इसलिए व्यवस्था में अभी से लग जाइए...!

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