जिसका डर था, वह भी हो गया...
ग्रेटर नोएडा में माँ-बेटी की हत्या हो गई। पुलिस परेशान कि आखिर हत्या किसलिए की गई? ना लूट, ना रेप... यानी न तो बदमाश पैसे के लिए आए थे, न अस्मत के लिए... फिर हत्या क्यों? सीसीटीवी ने सुराग दिया और जब परिणाम सामने आया तो हत्यारे और हत्या की वजह के बारे में जानकर पुलिस भी हैरान रह गई, हम तो हैं ही...! दरअसल, हत्यारा कोई और नहीं, माँ का ही बेटा था, बहन का ही भाई था और हत्या महज एक टास्क था उसके लिए... गैंगस्टर हाई स्कूल गेम की तरफ से। यह टास्क उसने अपनी ही माँ, बहन को मारकर पूरा कर दिया...। 11वीं का छात्र खेल-खेल में हत्यारा बन गया...। अब उसके टीन एज को मासूमियत न समझिए, अब हत्या उसके लिए महज एक खेल है... सोचकर तो देखिए कि बेवजह की आजादी, इंटरनेट, टीवी, आधुनिकता और पश्चिम के अंधानुकरण ने एक मासूम बच्चे को कितना खतरनाक बना दिया है वह भी कहीं दूर से, और इस तरह की पास रहकर ही हमें पता नहीं चलता...।
सोचिए, रो लीजिए, रो-रोकर, सोच-सोचकर पागल हो जाइए इस हालत पर लेकिन यह हालात नहीं बदलेंगे यदि खुद आप नहीं बदलेंगे। याद रखिए यह आजादी, यह आधुनिकता, यह अंधानुकरण और यह इंटरनेट सबकुछ खत्म कर देने के लिए काफी है। फिर आप बाहरी लोगों से लाख जतन कर लीजिए, आपका बेटा ही गला रेत देगा। हम ऐसे युग में आ गए हैं जहां बच्चे मर्डर-मर्डर खेल रहे हैं। सोचकर तो देखिए, जो बच्चे गेम का टास्क पूरा करने के लिए मां का गला काट सकते हैं, वे अपनी ही बहन का रेप भी कर सकते हैं... और जब वे अपनों के साथ ऐसा कर सकते हैं तो वे किसी के साथ कुछ भी कर सकते हैं। किसी की जान लेना आपके लिए हत्या होगी, आपके लिए रेप होगा, आपके लिए रिश्ते होंगे, माँ-बहन होगी; आपकी दी 'आजादी' की वजह से वह तो ऐसी दुनिया में जी रहा है जहां सिर्फ रोमांच है, नशा है, कम उम्र में जवानी का रोमांस है... और इन सबके लिए आपका समर्थन है। सबकुछ आपने ही तो मुहैया कराया है...। अपनी ही हत्या का बीज बो रहे हैं आप...। जिन्हें अपने बुढापे का, अपने जीने का सहारा बनाते थे, उन्हें ही अपना हत्यारा बना रहे हैं आप...। बताइए ना और कितनी आजादी चाहिए?
इस घटना ने हमें हैरान कर दिया है। नींद गायब है। बहुत सोचा हमने कि एक बेटा मां की हत्या कैसे कर सकता है? जिसके स्कूल से मिले टास्क को सब उसपर बोझ समझते हैं और वह भी बहाने बनाकर उन्हें पूरे नहीं करता, एक गेम के टास्क को वह मां-बहन की जान लेकर पूरा करता है। उसमें बड़े से बड़े टास्क पूरा करने की ताकत तो है...! वह बस राह भटक गया है। लेकिन क्यों? कैसे? हमें सोचना ही होगा कि यह भटकाव कैसे हो रहा है। वरना... मौत तो हमारे ही घर में हमारे साथ हमारे बच्चों के रूप में खेल रही है जो खेल-खेल में हमें ही समाप्त कर देगी। सोचिए कि हम अपनी बेपरवाही से, देखादेखी किसी परिणाम की परवाह किए बिना, न जाने किस राह पर और कितनी दूर निकल आए हैं कि बच्चे ही हमारे कातिल बनने लगे हैं। हम वाकई बहुत दूर निकल आए हैं फिर भी यदि हम लौटना चाहें तो अभी वक्त है लेकिन अब वक्त बहुत कम है...।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणियों का स्वागत है लेकिन फूहड़ शब्द निषेध हैं।