दिलीप सी मंडल... चल हट्ट... दुर्रर-दुर्रर...

समाज हो या सोशल मीडिया... किसी व्यक्ति के नाम, तस्वीर प्रोफाइल से हम महज उसे पहचान सकते हैं लेकिन उसके विचारों के माध्यम से हम उसे जान भी सकते हैं। निजी जिंदगी हो या वर्चुअल लाइफ; किसी को पहचानने के बाद भी उसे जानना इसीलिए महत्वपूर्ण है ताकि तब हम निर्णय कर सकें कि अमुक व्यक्ति हमारे लिए अनुकरणीय है या त्याज्य। समाज के लिए उपयोगी है या खतरा; आदमी है कि उसके रूप में कोई आवारा, पागल, खूंखार कुत्ता; प्रोत्साहित किए जाने योग्य है या दुर्रर्ररर कहकर भगा देने के लायक या फिर...!

     सोशल मीडिया पर किसी व्यक्ति, उसके विचार को बढ़ावा देने, उसका समर्थन करने का तरीका है कि उस व्यक्ति को हम फॉलो करें, उसके पोस्ट को लाइक, शेयर करें और यदि हम उसकी शख्सियत से अत्यंत प्रभावित हैं तो इससे भी आगे जाकर उसे अपनी फ्रेंडलिस्ट में जगह दें। कई बार व्यक्ति बिना जाने भी मित्र हो जाता है लेकिन जानने के बाद भी कि वह हमारी मित्रता के लायक नहीं, उस व्यक्ति का हमारी मित्र सूची में होना हमें भी संदिग्ध बनाता है...। क्योंकि हमारी भी पहचान इस बात से जुड़ी होती है कि हमारी फ्रेंडलिस्ट में कैसे लोग हैं, हम किन्हें फॉलो करते हैं, किस तरह के पोस्ट को लाइक, शेयर करते हैं...। अपनी पहचान तय करने वाले बिंदुओं पर हमें गंभीरता से सोचना ही चाहिए और उस अनुसार निर्णय भी लेना चाहिए उसे तत्क्षण व्यवहार में भी लाना चाहिए...!
  
     प्रोफाइल के जरिए जानने और विचार के जरिए किसी व्यक्ति को पहचानने के बाद भी कि यदि हम उसके बारे में अपने व्यवहार का निर्णय नहीं कर पा रहे हैं तो हम खुद केे बारे में भी निर्णय नहीं कर पा रहे हैं; उसके मानसिक विकारों को, कुकृत्य को, अन्याय को बर्दाश्त करते जा रहे हैं या मौन समर्थन देते जा रहे हैं तो हम खुद के साथ भी न्याय नहीं कर पा रहे हैं...। सही और गलत, दोनों व्यक्तियों के साथ हम एक जैसा व्यवहार नहीं कर सकते, न ही किया जाना चाहिए इसलिए हमें किसी भी व्यक्ति के बड़े नाम नहीं, बल्कि उसकी सोच, उसके विचार, व्यवहार के आधार पर उसके प्रति अपने व्यवहार का निर्णय करना ही होगा... अपने बचाव में, समाज के बचाव में और यह प्रदर्शित करने के लिए भी कि उसकी सोच के प्रति हमारी खुद की सोच क्या है...!

      मेरी राय में दिलीप सी. मंडल जैसे मनोरोगियों के लिए वही व्यवहार किया जाना चाहिए, जो हम गली के आवारा कुत्तों के लिए करते हैं। ऐसे कुत्ते भौंकते हैं तो सावधान हो जाइए, उनसे दूर हो जाइए; नहीं तो मौका मिलने पर ये कभी भी काट सकते हैं। इनके भौंकने पर भागिए तो पीछा करते हैं, खड़े हो जाइए तो औकात में आ जाते हैं। बाद में एन्टी रेबीज के टीके लगवाने से बेहतर है कि पहले ही इन्हें चल हट्टटट... दुर्रर-दुर्रर कहा जाए, किया भी जाए...। गली ही नहीं, सोशल मीडिया में भी इस तरह के कुत्ते यदि घूमते-भौंकते दिखाई दें तो इनके लिए हमारा यही व्यवहार होना चाहिए- अनफ्रेंड...अनफॉलो...डिसलाइक... नो शेयरिंग और इनकी हर पोस्ट पर बस एक कमेंट- दुर्रर्र। फिर देखिएगा, जिस तरह अपनी लंबी-चौड़ी फ्रेंडलिस्ट, फॉलोवर लिस्ट और लाइक, शेयर के आंकड़े देखकर इनमें 'स्वीट बेबी' वाली फीलिंग आ रही है न; जब हर पोस्ट पर कमेंट बॉक्स में 'दुर्रर-दुर्रर' ही लिखा मिलेगा तो आवारा कुत्तों वाली फीलिंग भी आएगी...। इन आवारा कुत्तों का तो 'यही' उपाय है और ज्यादा पागल, आदमखोर हो जाएं तो बस 'वही' उपाय है...!


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