अब भी इवीएम छोड़कर अपने दोष देख लीजिए!
कोई जीते, कोई हारे... ईवीएम को दोष देना बेकार है। यह युग जो ईवीएम से भी आगे बढ़ने का है, बैलेट पर पीछे लौटने की बात मूर्खतापूर्ण है...। जिसने बैलेट वाले चुनाव देखे हैं वे जानते हैं कि तब चुनाव कितने निष्पक्ष होते थे। जिनके भी नाम मतदाता सूची में होते, उनके मतदान केंद्र पर न पहुंचने पर भी बैलेट बॉक्स में उनके नाम पर मत चला जाता था; कभी सहमति से तो कभी बलातपूर्वक...। इवीएम में यह रुका है। इसके जरिए चुनाव में समय की बचत है। पैसे की बचत है...।
हाँ, एक खतरा इवीएम को हैक करने का है जिससे पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता लेकिन यह खतरा तो हर जगह है। आजकल सबकुछ कंप्यूटराइज्ड है, सबकुछ नेट कनेक्टेड है। इवीएम तो अभी ऑफलाइन ही है लिहाजा यह ट्रेन, प्लेन, सैटेलाइट, आधार, बैंक अकाउंट, सेना की साइट या कुछ भी हैक किए जाने से कहीं अधिक मुश्किल है। हैरत है कि सबकुछ हैकरों की पहुंच में सौंपकर भी उस पर कोई सवाल नहीं उठाया जा रहा और हैकरों की पहुंच से अभी बहुत दूर इवीएम पर इतनी हाय-तौबा मच रही है। बैलेट-बैलेट चिल्लाने से बेहतर है कि इवीएम को ही और सुरक्षित बनाया जाए या इवीएम से भी बेहतर तकनीक ढूंढी जाए; बैलेट पर वापसी अब इस युग में तो सम्भव नहीं है...!
मतदान के पहले तक अपनी हवा बता रहे दलों, नेताओं की एग्जिट पोल के बाद हवा खराब हो गई है तो फिर दोष इवीएम पर आ गया है जबकि अभी अंतिम परिणाम आना बाकी है। इवीएम पर राजनीतिक दलों का इस तरह सवाल उठाना फिलहाल सिर्फ उनकी संभावित हार की घबराहट है, नाकामियों का बहाना है...। यह इवीएम से अधिक उनका अपने प्रति संदेह है। कोई हार के लिए खुद को दोष नहीं देना चाहता क्योंकि इवीएम को दोषी ठहराकर हल्ला मचाना आसान है और खुद में सुधार लाना मुश्किल है। इवीएम अभी उतनी दोषपूर्ण नहीं है, जितने राजनीतिक दल और उनके नेता हैं लेकिन कोई अपने दोष देखना नहीं चाहता। अपनी भड़ांस कोई किसी विपक्षी नेता पर निकाल रहा है, कोई चुनाव आयोग तो कोई इवीएम पर। किसी एक दल का लगातार जितना उसके प्रति जनता का भरोसा भी तो हो सकता है? और हारने वाले से भरोसा उठ गया भी हो सकता है? यह बात दिमाग में क्यों नहीं आती? कांग्रेस भी तो दशकों तक लगातार सत्ता में रही और तब तो इवीएम भी नहीं था? फिर अब एक दल के कुछ ही साल सत्ता में होने पर संदेह इवीएम पर क्यों?
ओह! आप इंदिरा के खिलाफ जयप्रकाश नारायण नहीं बन सकते, लोकनायक नहीं बन सकते, ना तैयार कर सकते हैं...। बहुत मुश्किल है यह और बहुत आसान है इवीएम में चिप बता देना...! हमें तो लगता है इवीएम में चिप नहीं, आपके दिमाग में भूंसा भर गया है; हार की हताशा में दिलोदिमाग हैक हो गया है आपका और सच मानिए आपकी इन्हीं हरकतों ने ही विकल्पहीनता की यह स्थिति लाई है या कहिए कि आप सबका एक सशक्त विकल्प तैयार किया है। यह विकल्प एक दिन में तैयार नहीं हुआ, न आपसे भरोसा एक दिन में डिगा है इसलिए यह स्थिति जो दशकों में बनी है, एक दिन में आपके चाहनेभर से, बयानबाजीभर से नहीं बदल जाएगी। आपके पास सत्ता एकाधिकार की तरह थी, आप नहीं संभाल पाए। अभी विपक्ष में हैं तो सत्ता को नियंत्रित नहीं कर पा रहे हैं। जनता किस बूते कर ले आप पर भरोसा? अरे भाई, चुनाव इवीएम से करा लीजिए या बैलेट से, जब तक जनता आपको नहीं चुनना चाहेगी, वह बटन भी वहीं दबाएगी, अंगूठा भी वहीं लगाएगी...।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणियों का स्वागत है लेकिन फूहड़ शब्द निषेध हैं।