आजादी नहीं, आइए बैन का समर्थन करें!
आप अच्छी तरह जान रहे हैं समाज के पतन के लिए कौन सी चीजें जिम्मेदार हैं। आप अच्छी तरह जानते हैं कि कुछ चीजों पर पाबंदी लगाकर ही हम इस पतन को रोक सकते हैं लेकिन आप इतने कमजोर हो चुके हैं कि आपसे इतना भी नहीं होता। आप इतने स्वार्थी हो गए हैं कि अपनी जिंदगी से आगे सोचते ही नहीं। बस जी ली अपनी जिंदगी, चाहे मर्जी जैसे... भले ही उसके कारण आने वाला कल नरक बन जाए... हमारा क्या जाता है? हम तो तब न होंगे ना? क्यों नहीं सोचते कि तब आपकी पीढियां होंगी बर्बाद होने के लिए, आपके आज के किए मजे की सजा भुगतने के लिए। इतने आजाद ख्याल भी न बनिए कि आदमी की तरह सोचना छोड़कर बस जानवर बन जाइए... या उससे भी आगे। आपको तो बस आजादी चाहिए चाहे अंजाम जो हो उसका...! बदलिए खुद को ताकि समाज बदल सके। आज को जीभरके जी लीजिए लेकिन इस तरह जिएं कि उसमें कल की भी परवाह शामिल हो...।
आजादी; इस शब्द के लिए हमने जानें दी हैं लेकिन अब यही शब्द कितना भारी पड़ने लगा है। इस आजादी ने आज के समाज को तहस-नहस कर रखा है। हर कोई अपनी जिम्मेदारी भूल चुका है, सिर्फ अधिकार याद हैं; जीने का अनुशासन भूल गया है, सिर्फ आजादी याद है। सबको ऐसी आजादी चाहिए, जिससे उनकी मनमर्जी हो सके...। आजादी; मीडिया को चाहिए ताकि सच बताकर कोई झूठ परोस सकेे, फिल्मकार को चाहिए ताकि वह कैसी भी फ़िल्म बना ले, नेता को चाहिए ताकि कितना भी झूठ बोल ले, अभिनेता को चाहिए ताकि विलेन का किरदार भी इस तरह दिखाए कि युवा प्रेरित होकर विलेन ही बनना चाहें, साहित्यकार को चाहिए ताकि वह अपनी सारी कुंठा को किताब का रूप दे सके, शिक्षक को चाहिए ताकि वह अपनी ही छात्रा संग रोमांस कर सके, अधिकारी को चाहिए ताकि वेतन छूना भी न पड़े और रिश्वत लेकर सारा काम हो जाए, डॉक्टर को चाहिए ताकि वह पैसे के लिए अपने ही मरीज की जान ले सके, प्रगतिशील युवाओं को चाहिए ताकि देश को गाली दे सकें, नेताओं को चाहिए ताकि देश लूट सकें, प्रगतिशील महिलाओं को चाहिए ताकि पुरुषों की तरह वे भी शराब-शबाब चख सकें, यहां तक कि माता-पिता को चाहिए ताकि बच्चों की जिम्मेदारी से मुक्त होकर वह निजी जिंदगी जी सकें... जिसमें वह खुद भी बिगड़े बच्चे हों... और बच्चों को तो चाहिए ही ऐसी आजादी चाहिए कि वे कम उम्र में ही वह सबकुछ कर सकें जो बड़े उम्र की चीज है...या उनके लिए भी वर्जित। नशा, खुले में इश्कबाजी। लिव इन या पार्टनर बदलने तक की आजादी। पार्क, सड़कें, मेट्रो, सार्वजनिक स्थान हर जगह सामाजिक प्रदूषण फैलाने की आजादी...। जो जब जहां चाहें, वहीं शुरू हो जाए... ऐसी आजादी...।
ओह... समझते क्यों नहीं इस आजादी ने ही तो यह दिन दिखाए हैं। यह आजादी नहीं गुलामी है। हम आजादी के नाम पर एक बड़ी गुलामी की तरफ बढ़ रहे हैं। हमारा खुद से नियंत्रण छिनता चला गया है और हम आजादी के रूप में बुराइयों का गुलाम होते चले गए हैं, आदमी से जानवर बनते चले गए हैं...। समझना मुश्किल नहीं कि जिम्मेदारी को जीना सबके लिए मुश्किल है, इसलिए इससे सबको आजादी चाहिए। हर आदमी अनजाने में या जान-बूझकर भी जहर को आजादी का नाम देकर फैला रहा है और साथ ही दूसरे के जहर बांटे जाने पर उसका भी समर्थन कर रहा है...। कोई अनुशासित नहीं होना चाहता, जिम्मेदार नहीं बनना चाहता समाज के प्रति। कोई समाज को कुछ देना नहीं चाहता, बस समाज का शोषण कर उससे अपने लिए छीनना चाहता है। आदमी इतना उच्छृंखल हो चला है कि उसका प्रभाव समाज पर भारी पड़ने लगा है। यह प्रभाव जब समाज से होकर अपने ही घर में पड़ता है तो सिर्फ अपनी आजादी जीने वाला आदमी अचानक सामाजिक हो जाता है... बिफर पड़ता है... चिल्ला उठता है कि समाज तो बहुत गंदा हो गया है... हम कहाँ आ गए? यहीं तो हम भी कह रहे हैं कि पूछिए अपने जमीर से कि आप कहाँ आ गए? समाज को बनाने के लिए क्या किया आपने? कुछ नहीं किया तो बिगड़े समाज के लिए अपने को आप ही शुक्रिया बोलिए और उसका बुरा असर जब अपने परिवार, बच्चों पर पड़े तो खुद की आजादी के असरदार परिणाम के लिए ताली भी बजाइए... फिर रोइए मत कि समाज कहाँ जा रहा है...।
अरे अब भी रोकिए इस जहरीली हवा को अपने घर में आने से, समाज में घुलने से...। हर गंदगी को आजादी कहकर सराहने की जगह उसका असर देखिए और उसे अलविदा कहिए, थोड़ा कष्ट उठाइए लेकिन जिम्मेदारियों के साथ जीने की शुरुआत कीजिए ताकि यह बुरा वक्त यहीं ठहर जाए, और बुरे दिन न देखने पड़े। बहुत हुई आजादी की बातें, अब बंदिशों पर बात करिए। नियंत्रण की बात कीजिए...। आप फिल्मों को मजाक में मत लीजिए, उसका असर देखिए कि उसे देखकर बच्चे कैसे बिगड़ रह हैं। आप कहते हैं कि फ़िल्म कैसी भी बने, इसकी आजादी फिल्मकार को मिलनी चाहिए...। हम तो कहते हैं कि फ़िल्म ही क्यों, सीरियल भी सेंसर के दायरे में होना चाहिए। सबसे अधिक इसने ही तो बिगाड़ा है महिलाओं को जो अपना समय बच्चों से अधिक टीवी को देने लगी हैं। हर घर सीरियल बन गया नहीं लगता आपको? असर देखिए इसका...। हम तो कहते हैं अखबारों, न्यूज चैनलों पर भी सेंसर लगे। खबरों के नाम पर सबसे अधिक झूठ, हत्या, सेक्स यही तो परोसते हैं? अपनी कौन सी जिम्मेदारी निभाते हैं? जब जिम्मेदारी नहीं तो फिर आजादी क्या उत्पात मचाने के लिए? बच्चों को इंटरनेट दीजिए तो रचनात्मक वेबसाइट, स्टडी मटीरियल छोड़कर सारी साइट बैन करा दीजिए। इस बैन के लिए टेलीकॉम ऑपरेटर से बात कीजिए कि उस पर कोई ऑनलाइन गेम न खुले, पोर्न साइट न खुले। नेताओं की वह आजादी छीन लीजिए जिससे वह लूट रहे हैं आपको और अपनी भी वह आजादी छीन लीजिए जिसके कारण आप सबकुछ जानते हुए भी उनका गुलाम बन गए हैं, उनका समर्थन किए जा रहे हैं। आजादी बस सही करने की होनी चाहिए, सच बोलने की होनी चाहिए, ऐसा कुछ करने तक ही होना चाहिए जिसका कोई बुरा असर न हो। आजादी बस इतनी ही जरूरी है कि हर व्यक्ति अपनी प्रतिभा साबित कर सके, न कि अपनी कुंठा भी निकाल सके। जितनी जरूरी है सच की आजादी, उतनी ही जरूरी है गलत पर बैन...। हम हर क्षेत्र में, हर व्यक्ति की ऐसी आजादी पर बैन लगाए जाने का समर्थन करते हैं जिसके जरिए वह समाज को दूषित कर रहा है... समाज को कलियुग के प्रथम चरण में ही अंतिम चरण के परिणाम तक पहुंचा रहा है...!
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