अगड़ी-पिछड़ी जाति और आदमी...

कैसा लगता है सुनने में जब करोड़ों-अरबों के लालू के लिए पिछड़ा शब्द का इस्तेमाल होता है? अब लालू पिछड़ा हैं तो फिर अगड़ा कौन है? माने राजनीति के लिए कुछ भी...? हमारे राष्ट्रपति महोदय दलित हैं और भिक्षाटन के लिए घूमने वाले 'पंडित जी' सवर्ण हैं...। आश्चर्य है ना? नेता, पत्रकार सब लगे हैं पिछड़ा, दलित के उत्थान में लेकिन किसी को पता ही नहीं कि पिछड़ा और दलित कौन है...! कोई उन तक जाना नहीं चाहता। न तो सवर्णों की टूटी झोपड़ी तक, न दलितों की मलीन बस्ती तक। सरसरी निगाह डालने की ऐसी आदत पड़ी है कि पिछड़ा, दलित, सवर्ण... सबको ऊपर से ही निहार लेते हैं आजकल के नेता, सरकार, पत्रकार। इस तरह जब टीम आदमी को उसकी हैसियत से नहीं, बल्कि जाति से अगड़ी-पिछड़ी तौलने की आदत बनी रहेगी तब तक लालू पिछड़े होंगे, मायावती दलित होंगी और इनके बेटे-बेटियों के लिए भी आरक्षण की जरूरत बनी रहेगी...। इसी के साथ जातीय वैमनस्यता बढ़ती रहेगी... जातियों के नाम पर अपराधियों के बचाव की प्रवृत्ति बनी रहेगी। लालू को दोषी करार दिए जाने के बाद जाति के आधार पर उनका बचाव यह साबित करने के लिए पर्याप्त है...।

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