मां की ममता बड़ी कि स्त्री की हवस?
माँ! यह शब्द बोलनेभर से ही इतने भाव, इतनी ममता स्वतः प्रकट हो जाते हैं कि हम माँ कहकर खुद भी उस शब्द से परे नहीं रह पाते हैं, उस क्षण में माँ या उसकी संतान हो जाते हैं...। अद्भुत शक्ति, अपार ममता, जहां त्याग ही त्याग है... माँ वह नाम है। और हवस? अवैध संबंध? कोई तुलना है? जब औरत अपने पूजनीय रूप में होती है तब माँ होती है और जब सबसे घृणित रूप में होती है, हवस की भूखी होती है तो डायन कहलाती है... वही डायन जो अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए अपने भी पुत्र को मारकर खा जाती है...! जब मां की ममता जगती है तो वह सन्तान के लिए मौत से भी टकरा जाती है और जब औरत की हवस जगती है तो वह अपनी ही सन्तान के मौत का सामान बन जाती है... यह औरत भी वही औरत है...लेकिन हर औरत माँ नहीं होती, सिर्फ जन्म देने से कोई माँ नहीं हो जाती...।
पूर्वी दिल्ली का गाजीपुर इलाका...। 30 साल की महिला ने पति को सूचना दी कि बेटी गायब हो गई है। कहीं मिल नहीं रही। पिता पागल हो गया बेटी के गायब होने की सूचना से। वह घर के हर हिस्से के साथ मोहल्ले में हर तरफ भागता रहा, बिटिया का नाम लेकर चिल्लाता रहा, पुकारता रहा, ढूंढता रहा...। इधर महिला भी उसे ढूंढती दिखी। आधी रात तक जब बच्ची नहीं मिली तो भागा-भागा पिता थाने गया और पुलिस से मदद मांगी। वह रो-रोकर पागल हुआ जा रहा था। पुलिस ने उसकी हालत देखी तो संवेदनशीलता दिखाई और तुरन्त जांच शुरू कर दी। उसके घर पहुंची। आस-पास खंगालना शुरू किया। इधर पिता भी ढूंढता रहा। घर की छत पर अचानक बेटी की लाश दिखी तो उसी क्षण जैसे उसकी भी जान निकल गई। वह समझ नहीं पाया कि 6 साल की बच्ची की हत्या कोई क्यों करेगा? वह भी तब जबकि उसके परिवार से किसी की कोई दुश्मनी नहीं थी? पुलिस भी हैरान। इसी बीच पुलिस को पता चला कि पास रहने वाला 23 साल का युवक भी गायब है। पुलिस ने उसे ढूंढ निकाला। दो-चार डंडे दिए तो उसने वह बताया जिससे हर मां कांप जाए, हर प्रेम हार जाए, हर हवस अपनी जीत पर अट्टाहास करे...।
महिला के उस युवक से अवैध संबंध थे। शाम में बच्ची ने मां को युवक के साथ आपत्तिजनक हालत में देख लिया था। दोनों ने उसे मना किया कि वह किसी को न बताए लेकिन बिटिया ने कहा कि वह पापा को सब बता देगी। पता नहीं... हर बात पापा को बता देने वाली बिटिया ने यह बात मासूमियत में, भोलेपन में, आदतन कही थी या वह मां के अपराध की गंभीरता भी जानती थी लेकिन उसके बोल ने दोनों के होश उड़ा दिए। पहले ही एक पाप करते आ रहे पापियों ने महापाप की तैयारी कर ली। रात में माँ बिटिया को छत पर घुमाने के बहाने ले गई। वहां पहले से दरिंदा युवक बैठा था। कलंकिनी, हवस की भूख में मां की ममता को भी अपना निवाला बना गई। अपनी ही बेटी के हाथ पकड़ लिए और दरिंदे ने उसका गला रेत डाला। बेटी की मौत से पहले ही उसकी ममता मर चुकी थी इसलिए उसकी लाश देखकर भी उसे रोना न आया बल्कि आगे की योजना में लगी रही। पति को बेटी के लापता होने की सूचना दी और खुद भी उसे ढूंढने की अदाकारी क़रती रही...।
एक साल पहले इसी तरह की घटना हुई थी गोरखपुर में। पत्नी ने प्रेमी को बुलाकर पति की हत्या करा दी। बच्चे ने देख लिया तो प्रेमी को उसे मारने के लिए कहा लेकिन वह इतने छोटे बच्चे को मारने से इनकार कर दिया तो महिला ने खुद ही उसका गला घोंट डाला। इससे भी आगे जाकर घर में पति, बेटे की लाश पड़ी रही और महिला ने युवक के साथ अपनी हवस बुझाई। अभी दोनों जेल में हैं...।
एक साल पहले इसी तरह की घटना हुई थी गोरखपुर में। पत्नी ने प्रेमी को बुलाकर पति की हत्या करा दी। बच्चे ने देख लिया तो प्रेमी को उसे मारने के लिए कहा लेकिन वह इतने छोटे बच्चे को मारने से इनकार कर दिया तो महिला ने खुद ही उसका गला घोंट डाला। इससे भी आगे जाकर घर में पति, बेटे की लाश पड़ी रही और महिला ने युवक के साथ अपनी हवस बुझाई। अभी दोनों जेल में हैं...।
इस तरह की जो नई कहानियां, इतने घृणित रूप में सामने आ रही हैं, सोचिए क्यों आ रही हैं? अभी तक आपकी सारी चिंताएं पुरुष से महिलाओं की सुरक्षा को लेकर है लेकिन ये महिलाएं तो रेपिस्टों से भी अधिक खतरनाक, अधिक घृणित हैं। इस खतरे को स्त्री-पुरुष में बांटकर न देखिए, दोनों पर ही अब कोई नियंत्रण नहीं है। दोनों ही 'आजाद' हैं। दोनों ही दरिंदे। पर क्यों हो गए? कभी सोचा आपने? सिनेमा और बाजार ने समाज को वहां पहुंचा दिया है जहां क्या लड़का, क्या लड़की; दोनों के लिए सेक्स ही जिंदगी है और इसे पाने-जीने के लिए कथित आजादी सबसे बड़ा हथियार। अब इतनी आजादी में यह न जिया तो क्या जिया? 7वीं-8वीं में पढ़ने वाली छात्राएं उस लड़के के प्रेम में भाग रही हैं जो जानता नहीं कि प्रेम क्या है। इन लड़कियों के लिए भी प्रेम सेक्स तक ही है। और बाजार ने इस सेक्स को सुरक्षित करने के नाम पर इसके लिए कितना उकसाया है, कहने की जरूरत नहीं है। सिर्फ सुबह में टीवी पर कुछ भजन, प्रवचन के बाद देर रात तक कंडोम से लेकर शक्तिवर्धक दवाइयों के ही विज्ञापन दिखाए जाते हैं। हर फिल्म में सेक्स दिखाया जाता है, हर धारावाहिक से घृणा फैलाई जाती है... यह सब आखिर कहाँ जाता है? आप क्या सोचते हैं कि इन्हें देखने का कोई असर नहीं होता? आप तो बच्चों को समय देने से रहे और हवाले कर दिया है इन माध्यमों के जो उन्हें सिर्फ हवस, हत्या, घृणा की तरफ ले जा रहे हैं। इंटरनेट से लेकर टीवी तक सबसे बड़े कारण हैं इसके और इन सबका कारण यह है कि आपके पास समय नहीं रहा बच्चों के लिए। आप नई तरह की आजादी के नाम पर नई तरह की बीमारी अपने ही घर में फैला रहे हैं। कोई शिकायत कर दे आपकी बिटिया की, बेटे की तो आप उस पर ही भड़क उठते हैं क्योंकि आप भी वही सहूलियत वाली बेपरवाह जिंदगी के आदी हो चुके हैं जिसमें किसी का गलत के लिए भी टोकना अपनी आजादी में खलल लगता है...। आप हर शिकायत को नजरअंदाज कर जाते हैं और अपनी ही संतान को इस अंजाम तक पहुंचाते हैं कि वह किसी भी जिद के लिए आत्महत्या कर ले, किसी गेम का टास्क समझकर आपकी हत्या कर दे या फिर समाज में दरिंदा बनकर घूमे... यह सब अपनी ही संतानें हैं... किसी न किसी की तो जरूर हैं...!
लंबा पढ़कर ऊब गए होंगे, जम्हाई आ रही होगी लेकिन सच सुन लीजिए। एक मित्र हैं मेरे। उनकी पत्नी दिल्ली के एक अच्छे गर्ल्स स्कूल की शिक्षिका हैं। पिछले दिनों वह बड़ी परेशान थीं क्योंकि छात्राओं को परिभ्रमण पर ले जाना था। मित्र ने मजाक किया कि इसमें परेशानी वाली क्या बात है? हम भी तुमको घुमा नहीं पाते, इसी बहाने तुम भी घूम लेना। उनकी पत्नी ने बताया कि समस्या यह है कि ज्यादातर लड़कियों के 7वीं-8वीं से ही बॉयफ्रेंड हैं और मेरी छात्राएं हाई स्कूल की हैं। कहीं बाहर लेकर जाओ तो वे वहां अपने बॉयफ्रेंड को बुला लेती हैं। वहां माहौल को नियंत्रित करना मुश्किल हो जाता है। सबसे बड़ा डर है उनका भाग जाना। फिर सारी जिम्मेदारी स्कूल और टीचर पर आ जाती है...। सबकुछ जानते हुए भी हमलोग किसी लड़की को डांट नहीं सकते। अब कोई लड़की टीचर से डरती नहीं। मन किया तो सम्मान करती हैं, नहीं तो वह भी नहीं। सब अपने मन की हैं। स्कूल भी कहता है कि गार्जियन की कंप्लेन नहीं आनी चाहिए कि आपने किसी बच्चे को डांटा या मारा। अब यही डर है। आप प्रिंसिपल से बोलकर परिभ्रमण डयूटी से हमें हटवा दीजिए नहीं तो कुछ होगा तो आपको भी झेलना होगा। मित्र को यह करना भी पड़ा... लड़कियां दूसरे शिक्षिकाओं के साथ गईं और दो वापस नहीं लौटी। एक को तो उसके भाई ने अपने ही दोस्त के घर से बरामद कर लिया, एक के लिए एफआईआर दर्ज कराई गई। एक शिक्षिका की नौकरी गई...। इसी के साथ मेरे मित्र को लगा कि पत्नी ठीक कह रही थी, उन्होंने ड्यूटी से हटवाकर ठीक ही किया...।
सोचिए, एक टीचर को आपने किस कदर डरा रखा है कि आपकी बिटिया इस कदर बिगड़ रही हों लेकिन वह न उसको डांट सकती हैं, न आपसे शिकायत कर सकती हैं। वह बस स्कूल से सैलरी ले रही हैं और सिलेबस पढा रही हैं। बाकी के अधिकार तो आपने खुद ही छीन लिए हैं तो कुछ होने पर हाय-तौबा क्या करना? आपने दूसरों को तो डर ही रखा है खुद भी अनजान हैं कि बेटी कहाँ जा रही है? जहां जा रही है वहीं पहुंच रही है या नहीं? कभी भी थोड़ी फुरसत निकाली और व्यक्तिगत रूप से कभी मिले उसके शिक्षक से? पढ़ाई से इतर भी उसके बारे में पूछा? घर से स्कूल-कॉलेज तक कोई निगरानी रखी? ओह... यह आपका भरोसा नहीं है उस पर जो कच्ची उम्र में जहर निगलने तक की आजादी दे रहा है; यह आपकी कमजोरी है कि आप समय नहीं दे पा रहे तो उसे अपनी लापरवाही की जगह आजादी का नाम दे दे रहे हैं और समाज में इसके लिए अपमानित होने की जगह यह कहकर गौरवान्वित होते हैं कि हमें तो पूरा भरोसा है बिटिया- बेटे पर। पूरी आजादी दे रखी है...। आप खुद सोचिए कि जब टीन एज में पूरी आजादी मिलेगी तो कोई लड़की क्या करेगी, क्या करना चाहेगी? और क्यों रोकेगी ख़ुद को जबकि उसे यह सब करने की आजादी मिली है...? यह लड़की जो किशोरावस्था से ही अलग-अलग बॉयफ्रेंड बना रही है... कब यह उम्र के साथ उसकी आदत बन जाती है, उसे भी पता नहीं होता। हर दो-चार साल पर बॉयफ्रेंड चेंज हो रहे हैं। सम्बन्धों में 'एक्स' की एंट्री के बाद और घटियापना शुरू होता है। हर नए से जुड़ने के साथ ही एक्स भी कहीं न कहीं रह ही जाता है। उम्र के साथ एक्स बढ़ते जाते हैं। अधिकतर के साथ संबंन्ध बनते जाते हैं...। अब यह आजाद खयाल लड़की एक दिन पत्नी बनती है तो उसके पत्नी होने के क्या मायने हैं? फिर माँ बनने के भी क्या मायने हैं? और फिर स्त्री होने के भी क्या मायने हैं? हर कहानी शुरू से ही शुरू होती है... और यदि शुरू में ही हमने शुरुआत ठीक न की तो आगे की कहानी और उसका अंत तो वह खुद लिख देती है। जब बिटियाँ ऐसे पलेंगी, इस तरह बड़ी होंगी तो आने वाली अधिकतर माएँ भी ऐसी ही होंगी...। फिर जमाने में सिर्फ हवस रह जाएगी, न कहीं प्रेम बचेगा, न कोई मां होगी, ना उसकी ममता...!
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