पत्रकार' को मारने वाला 'संवाद सूत्र' अब मरना चाहिए...!

कानपुर के पत्रकार नवीन गुप्ता की हत्या के बाद अखबार में जो खबर छपी, उसमें उन्हें 'संवाद सूत्र' बताया गया है। पूरी खबर में कहीं भी पत्रकार नवीन नहीं लिखा गया है। स्याही उतनी ही लगनी थी, जगह भी उतनी ही देनी थी लेकिन नहीं...!
     जिस सम्मान के लिए नवीन अखबार से जुड़े रहे, मृत्युपरांत श्रद्धान्जलिस्वरूप मानकर ही, उनके लिए एक सम्मानजनक शब्द लिख देने से अखबार का क्या चला जाता...? ओह... वर्षों तक बगैर वेतन काम लेने वाले अखबार प्रबंधन ने कम से कम अपने पत्रकार को अंतिम वेतन यही दे दिया होता... एक पत्रकार को बस पत्रकार कह दिया होता...!
     संवाद सूत्र; यह कितना अपमानजनक है; इसे जीने वाले ही जानते हैं...। यह शब्द जिससे जुड़ जाता है, वह अपनों के बीच में ही अछूत हो जाता है। उफ्फ... 'बंधुआ' शब्द आज भी अपने बदले हुए नाम से मीडिया में कितनी शान से जिंदा है। अपने मतलब के लिए इसमें कितनी शक्ति भर दी गई है कि पत्रकार तो मर भी जाता है लेकिन यह शब्द नहीं मर पाता है...। पत्रकार को हर क्षण मारने वाला यह शब्द भी अब मरना चाहिए।
       मेरी उच्चतम न्यायालय से मांग है कि जिस तरह समाज में एक जाति विशेष के नाम को गाली बताते हुए उसके प्रयोग पर रोक लगा दी; मीलॉर्ड, मीडिया में भी संवाद सूत्र/स्ट्रिंगर शब्द पर रोक लगाइए...। गांव, कस्बा, पंचायत, प्रखंड, नगर निगम, राजधानी कोई भी जगह हो... किसी पत्रकार को संवाद सूत्र न कहा जाए; वह पत्रकार है, उसे बस पत्रकार ही कहा जाए...!

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