किसे छापना है, किसे दिखाना है, यह टीआरपी से तय होता है...


आज तक पर अंजना ओम कश्यप के डिबेट में बाबर कादरी और एक डिप्टी मु्फ्ती को बुलाया गया था। एक ने जिन्ना को कायदे आजम कहने के लिए कहा तो दूसरे ने देश के एक और बंटवारे की बात की...। कादरी के प्रोफाइल को देखिए तो उसे और उसके विचार को समझना मुश्किल नहीं है। यह जानना मुश्किल नहीं कि यदि वह डिबेट में आया तो क्या बोलेगा। यही बात उस मुफ्ती पर भी लागू होती है। फिर भी दोनों को बुलाया गया जान—बुझकर... वैसे ही भड़काउ सवाल पूछे गए जान—बुझकर... और वैसे ही जवाब भी मिले जिसकी उम्मीद चैनल को थी...।
अब इस तरह के ओछे लोगों को मीडिया द्वारा शह देने का असर देखिए..! दोनों ही शख्स जो सिर्फ अपने फेसबुक या वेबसाइट पर भौंक सकते थे,(वह भी सरकार की मर्जी से वरना इन्हें बैन कर देना चाहिए) इन्हें डिबेट में शामिल कर एक चैनल की माइक थमा दी गई ताकि वह भौंकें तो पूरा देश सुने और बहुत हद तक यकीन भी कर ले। इन्हें डिबेट में सम्मान के साथ बैठाया गया, जहां बैठने वाले के बारे में लोगों की एक धारणा बनी हुई है कि वह उस विषय का मर्मज्ञ और उस समुदाय का सर्वमान्य प्रतिनिधि ही होता होगा। वह जो बोलता है वह पूरा कौम बोल रहा है...। इस तरह इन घृणा फैलाने वालों का मतलब सध गया और इस तरह के घृणित लोगों को आमंत्रित कर टीआरपी की चाह रखने वालों का भी। लोगों ने न सिर्फ डिबेट देखा बल्कि समर्थन या निंदा में, बहस की। पोस्ट किए, वीडियो शेयर किए। यही तो आजकल दोनों ही चाहते हैं... आतंक फैलाने वाले आतंकी भी और टीआरपी बटोरने वाले चैनल भी--!
यह सिर्फ चैनल ही नहीं कर रहे, अखबारों का भी यही काम रह गया है। कौन कितना विवादास्पद है, कितने विवाद पैदा करने वाला ​लेख लिख सकता है, उसे संपादकीय पृष्ठ पर आसानी से जगह दी जाती है। दो—तीन परिचित सेवानिवृत्त संपादक हैं, जिनसे बात होती है, जो आजकल देश—समाज के लिए कुछ सकारात्मक कर रहे हैं और लिख भी रहे हैं लेकिन उन्हें उन्हीं अखबारों में जगह नहीं दी जाती, जहां के कभी वे संपादक हुआ करते थे, जहां क्या छपेगा, यह वहीं तय किया करते थे...। लेकिन दिलीप सी. मंडल, जिसकी एकमात्र विद्वता फेसबुक पर गाली देने की है, दलित—ब्राह्मणवाद करने और धर्म—जातियों में घृणा बांटने, वैमनस्यता फैलाने की है; वह हर अखबार के संपादकीय पन्ने पर जगह पाता है। कारण? कारण वहीं टीआरपी है! पठनीयता है...!
पूरे देश में धार्मिक—जातीय उन्माद की आग पूरी तरह फैलने से पहले इस तरह के बोलने—लिखने वालों और इन्हें दिखाने—छापने वालों पर पूरी तरह शिकंजा कसा जाना चाहिए...। यही एकमात्र उपाय है। इनका हर तरह से, हर जगह बहिष्कार—तिरस्कार किया जाना चाहिए तभी यह देश—समाज बचेगा!

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