हां, निष्पक्ष नहीं हैं हम...!




किसी की मिथ्या प्रशंसा करने वालों से जितनी चिढ़ नहीं होती, उससे अधिक नफरत होती है हमें मिथ्या दोषारोपण करने वालों से। इस कारण जब भी कोई अंधविरोध होता है तो हम उसके विरोध में हो जाते हैं और ऐसा होते ही न होते हुए भी हम आरोपित पक्ष के प्रति रक्षात्मक दिखने लगते हैं। यही स्वभाव है मेरा, यही काम है मेरा... इसलिए जब हाल में ब्राह्मणों पर लगातार झूठे हमले किए गए तो हम फिर खड़े हैं उसी तरह सच और झूठ के बीच में या कहिए कि सच की तरफ और इसलिए आश्चर्य नहीं यदि आपको हम नजर आ रहे हैं ब्राह्मणों की तरफ...।

हां, थोड़ा दुख है लेकिन आश्चर्य नहीं यदि आप इनबॉक्स में, फोन पर और मिलने पर भी मेरी निष्पक्षता पर संदेह कर रहे हैं। अपने या अपनों के झूठे आरोपों को प्रमाणित नहीं कर सकते आप इसलिए उससे भी आगे जाकर हमें भी झूठा आरोपित करने लगे हैं कि इस तरह की पोस्ट कोई पत्रकार नहीं, सच लिखने वाला मृत्युंजय नहीं बल्कि उसके साथ जुड़ा त्रिपाठी लिख रहा है...। जानते हैं हम हर झूठ बोलने वाले की आदत... कि कैसे वह अपने बचाव में किसी को ऐसे लपेटता है कि कोई भी व्यक्ति घबरा जाए, सच से पीछे हट जाए और उसका झूठ आगे बढ़ जाए। हम यह भी जानते हैं कि बिल्कुल यही खेल ब्राह्मणों—सवर्णों के विरोध के भी पीछे भी खेला जा रहा है कि जब इनके खिलाफ फैलाए झूठ के विरुदृध इनके बीच का कोई व्यक्ति खड़ा हो, उसका खंडन करे तो घोर ​जातिवाद को जीने वाले और उसका समर्थन करते नहीं लजाने वाले आप तड़ से उसे ही जातिवादी करार दे दें और वह निष्पक्षता का पुजारी कहलाने की चाह में तुरंत अपना पांव पीछे खींच ले।

हां, हम जानते हैं घबराए हुए हैं आप अपने झूठ का रायता न फैलता देखकर, वर्षों से फैलाए रायते को हमें समेटता देखकर और इसलिए अब आपका विरोध तथ्यों से इतर व्यक्तिगत होने लगा है। लेकिन, आप निश्चिंत रहिए... हमें हर हाल में सच के साथ ही खड़ा पाएंगे; हम तब भी नहीं डिगेंगे जब हम आपको मित्र की जगह सिर्फ हिंदू, सवर्ण, ब्राह्मण, त्रिपाठी ही नजर आएंगे। कोई मुगालता न रखिए, मन को बिल्कुल साफ रखिए। जैसे—जैसे आपका अंधविरोध बढ़ेगा, वैसे—वैसे मेरी तरफ से आपका विरोध बढ़ेगा। जैसे—जैसे आप हमें हतोत्साहित करने की कोशिश करेंगे, मेरा मनोबल और बढ़ता जाएगा। और मित्र, हमसे ​बात करते समय निष्पक्षता की दुहाई तो न ही दीजिए, हमसे इसकी उम्मीद भी न कीजिए क्योंकि हम सदैव खड़े हैं सत्य के पक्ष में और झूठ के खिलाफ। फिर यदि आजकल उस झूठ के साथ आप खड़े हैं तो समझ लीजिए कि हम आपके ही खिलाफ खड़े हैं। मेरा तो यही स्वभाव है तो मेरे पास कोई रास्ता भी नहीं है; हां, आपके पास है कि सच को स्वीकार कर लीजिए, नहीं तो आदत डाल लीजिए अपने झूठ के विरुद्ध हमें देखने की...। हां, निष्पक्ष नहीं हैं हम, क्योंकि सच के पक्ष में हैं हम...।

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