आज हिंदू भी जरूर लिखिए... या फिर कभी मुस्लिम—दलित भी न लिखिए!


देश के तमाम पत्रकार मेरी मित्र सूची में हैं लेकिन पता है कि उनसे कहने का कोई फायदा नहीं। इसलिए इस मामूली पत्रकार का आग्रह सबकुछ तय करने वाले देश के महान संपादकों से है...!

समस्त आदरणीय,
गणतंत्र दिवस के अवकाश के चलते कल न छप पाया अखबार जब आज छापिए तो कासगंज की खबर के साथ इस तरह के शीर्षक, उपशीर्षक जरूर लगाएं-
"कासगंज में सरेआम हिन्दू की हत्या"
"तिरंगा यात्रा निकालने पर मुस्लिमों का हमला"
"हिन्दू बोले हिंदुस्तान जिंदाबाद तो मुस्लिम युवक बोला- पाकिस्तान जिंदाबाद"
"तिरंगा लेकर निकला तो मार डाला चंदन को"
कोई बात नहीं यदि आप यह न लिख पाएं तो भी...!कासगंज में साम्प्रदायिक तनाव होने के बाद भी देश में साम्प्रदायिक सौहार्द की कामना हो, सबकुछ जानते हुए भी इसे महज दो गुटों या सम्प्रदायों में भिड़ंत जैसा ही कुछ लिखना हो, जैसा कि कल से ही तमाम अखबारों के पोर्टल पर चल भी रहा है; तो प्लीज साथ में यह कसम भी खा लीजिएगा कि आगे कभी "मुस्लिम की हत्या", "दलित की हत्या" शीर्षक लगाकर देश में आग नहीं लगाइएगा...।

जी बिल्कुल,
हम भी जानते हैं कि कल कैसे और क्यों सबकुछ पता होते हुए भी देर शाम तक हर जगह "झड़प में एक व्यक्ति की मौत" ही खबर थी। उस व्यक्ति का नाम तक लिखने से बचा गया क्योंकि उससे भी पता चल जाता कि मरने वाला हिन्दू है। हाँ, हम यह भी जानते हैं कि ऐसा किया जाना क्यों जरूरी है, इसलिए इस पर सवाल नहीं उठा रहे। हम तो बस इतना कह रहे हैं कि यदि आपको "मुस्लिम युवक की हत्या" लिखना जायज लग रहा है तो आज "हिन्दू युवक की हत्या" भी जरूर लिखिए, लिखने की इजाजत दीजिए! पत्रकारीय धर्म या अधर्म जो भी निभाते हैं आप, आज भी निभाइए, हर समय निभाइए...।

महोदय,
काफी जनसंख्या है देश की, शरीफों के साथ मवाली भरे पड़े हैं यहां तो हर दिन किसी न किसी वजह से, किसी न किसी की हत्या होती है और मरने वाला हर शख्स किसी न किसी जाति, कौम का तो होता ही है; तो यदि आप जाति-धर्म से ऊपर सोच ही नहीं सकते, आपकी नजर में हर व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसकी यही है तो प्लीज आज भी जरूर लिखिए-
"तिरंगा फहराने पर हिन्दू युवक की निर्मम हत्या"
अब हम थोड़े भावुक हो गए हैं! इसलिए इससे अलग भी अनुरोध है...
आग्रह है कि साइड स्टोरी में ही सही, 22 साल के लड़के के घर वालों का भी ख्याल रखा जाएगा। उसकी माँ के आंसू तस्वीरों से लेकर शब्दों तक झलकेंगे। जवान बेटे के खोने का दर्द बिना हिन्दू-मुस्लिम देखे, दिखेगा। तिरंगा यात्रा में शामिल देशभक्ति से ओत-प्रोत नौजवान को खो देने का दर्द उसी तरह झलकेगा, जिस तरह तिरंगा फहराते हुए शहीद हो जाने वाले जवान के लिए दिखता है। हाँ, आप उसे शहीद भले ना लिख पाएं लेकिन उसकी मौत की बिल्कुल वही वजह होने के कारण उसे वही सम्मान भी जरूर मिलना चाहिए। चंदन तो अन्याय का शिकार हो गया, आतंकियों ने मार डाला उसे लेकिन आप उसकी माँ के साथ न्याय कर सकते हैं, उसके बेटे को सरकार से शहीद का दर्जा दिलाकर। उसे वही सम्मान दिलाकर...! आपको तो सब याद रहता है! याद है ना कि केजरीवाल ने अपनी सभा के दौरान पेड़ से लटककर आत्महत्या करने वाले किसान को शहीद का दर्जा देने की घोषणा कर दी थी? तब शहादत किस बात की थी, पता नहीं! लेकिन आज चंदन ने शहादत ही दी है...!
अंत में,
पुनः आग्रह है कि हिन्दू, मुस्लिम को दिमाग से निकालकर निष्पक्ष होकर देश के एक होनहार देशभक्त लड़के की हत्या की खबर लिखी जाए; उसकी शहादत का सम्मान किया जाए, आतंकियों को आतंकी घोषित न करा पाएं तो भी कोई बात नहीं, देशद्रोहियों को देशद्रोही न लिख पाएं तो भी दिक्कत नहीं लेकिन चंदन को शहीद का दर्जा जरूर दिलाइए...! अपना जमीर जगाइए, अपना पत्रकारीय धर्म निभाइए...!
सादर,
मामूली पत्रकार

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