यदि अम्बेडकर युग यही है तो इसे आने न दीजिए...



हम डरते हैं कि हकीकत कह देंगे तो अम्बेडकर की आत्मा बुरा मान जाएगी और अम्बेडकरवाद के नाम पर हनुमानजी को जूते मारे जा रहे हैं...। यदि इसके बाद भी आप चुप हैं तो समझिए अब खून पानी हो गया है आपका...।

सरकारों की दोगली नीति ने तो जाति-धर्म के नाम पर किसी को भी कुछ भी करने की छूट दे रखी है लेकिन हम क्यों चुप हैं? सरकारों को कोई फर्क नहीं पड़ता कि जूते अम्बेडकर को लगते हैं या हनुमानजी को... लेकिन हमें तो पड़ता है? हनुमानजी की पूजा हम करते हैं तो उनको जूते मारने की घटना और ऐसी निकृष्ट सोच वालों का विरोध भी पहले हमें ही करना होगा... तभी सरकारें भी देखेंगी। यदि हम अब भी चुप रहे तो आज हनुमानजी की तस्वीर को जूते मारने वाले कल हमारे घरों पर चढ़ आएंगे, हमारे आंगन से उनका ध्वज पताका उखाड़ ले जाएंगे। हम जैसे आज सिर्फ देख रहे हैं, कल भी देखते रह जाएंगे...!
इस असहनीय कृत्य पर चुप्पी सही नहीं है। हनुमानजी पर जूते मारने वालों का व्यवहार देखकर इनके अंदर की घृणा का अनुमान लगाइए... इन्हें छूट मिली तो ये कुछ भी कर सकते हैं.. इसलिए अब चुप मत रहिए। पानी सिर से ऊपर जा रहा है। हाँ, विरोध में जरूर धैर्य बनाए रखिए लेकिन हकीकत कहने से, उसका प्रतिकार करने कतई न डरिए। यह डर आपको जीने नहीं देगा...। अम्बेडकर के बैनर तले जातियों पर जातियों का यह आतंक अब यहीं थमना चाहिए वरना जातीय रक्तपात से पूरा देश सनेगा। शायद याद हो आपको... जातिवाद के इसी तरह के आतंक ने बिहार में एक सीधे आदमी को ब्रह्मेश्वर मुखिया बनने पर मजबूर कर दिया था। अपने स्वाभिमान, आबरू की रक्षा के लिए किसानों ने अपने खेत बेचकर हथियार खरीद डाले थे...। आज की यह जातीय आतंकी गतिविधि यदि यहीं न रोकी गई तो वह दौर समस्त भारत देखेगा...। वह दौर आने से पहले इस दौर को यहीं रोक दीजिए। साहस कीजिए, जातीय आतंक वाले इस अम्बेडकर युग की भर्त्सना कीजिए...।

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