गोरखपुर में उपेंद्र नहीं, योगी हारे हैं...
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| Yogi Adityanath |
राजनीति हो, खेल हो या फिर जिंदगी; जीत—हार तो लगी ही रहती है। इस रूप में यदि गोरखपुर लोकसभा सीट पर गोरक्षपीठ समर्थित भाजपा प्रत्याशी उपेंद्रदत्त शुक्ल की हार को देखें तो किसी तरह का कोई आश्चर्य नहीं होता, चौंकने जैसी कोई बात नहीं लगती लेकिन एक तथ्य यह भी है कि किसी क्षेत्र में जब कोई वर्षों तक न हारा हो तो वह अपराजेय मान लिया जाता है, और तब यदि वह अचानक पहली बार आखाड़े में उतरे लड़के से पटखनी खा जाए तो पिछली कई जीत से इस एक हार की कहानी अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है, यह हार बेहद चौंकाने वाली हो जाती है...। गोरखपुर लोकसभा सीट पर भाजपा प्रत्याशी उपेंद्रदत्त शुक्ल की हार भी कुछ इसी तरह की है, क्योंकि यह हार उनकी नहीं, बल्कि 29 साल तक गोरखपुर की सत्ता पर काबिज रहे गोरक्षपीठ के महंत योगी आदित्यनाथ की हार है और हराने वाला है पहली बार चुनाव लड़ने वाला मात्र29 साल का लड़का प्रवीण निषाद। यानी महज उतनी उम्र का, जितनी पीठ की सत्ता की उम्र है। अभी यह परिणाम हकीकत नहीं होता तो बस कोरी कल्पना ही होता इसलिए इस परिणाम से सबको चौंकना लाजिमी है और हारने वालों का चौकन्ना होना भी...। यह परिणाम इतना अप्रत्याशित है, इतना आश्चर्यजनक है कि जब तक यह परिणाम न आया था, इसकी थोड़ी आशंका तो जताई जा सकती थी मगर कोई भी पूरी यकीन के साथ नहीं कह सकता था... यहां तक कि अभी विजयी मुस्कान लिए इंजीनियर प्रवीण निषाद भी नहीं। गोरखपुर में रहना है तो योगी—योगी कहना है, गोरखपुर में योगीजी को कोई हरा नहीं सकता... इस तरह की बातें इतनी आम हो चुकी थीं कि ये बातें सच भी लगने लगी थीं और ऐसे में जब प्रवीण नाम के अभिमन्यु ने योगी के राजनीतिक चक्रव्यूह को भेदा तो उससे गोरखपुर में राजनीति की नई इबारत बननी ही थी...। कल तक इस हार के कोई कयास तक ठीक से नहीं लगा सकता था लेकिन आज इस हार के सभी के पास कई कारण हैं। यहां तक कि मुझ जैसे अज्ञानी के पास भी...। हम कोई राजनीतिक पंडित तो नहीं हैं लेकिन गोरखपुर क्षेत्र से हैं वहां वर्षों तक रहने, वहां की बाहरी दुनिया के साथ ही अंदर की बातें जानने—समझने के कारण इस हार की कुछ वजहें मेरे पास भी हैं। इनमें कुछ प्रमुख कारणों की चर्चा कर देना जरूरी है...।
1. आस्था का सवाल न रहा...
आस्था बहुत कुछ होती है। मानें तो मूरत नहीं तो पत्थर...। मानें तो गंगा नहीं तो पानी...। मानें तो सोना नहीं तो माटी...। इस तरह मान लेना भी बहुत कुछ होता है जिसका जन्म आस्था से होता है। किसी के प्रति आस्था उसे हर समीक्षा से परे कर देती है। गोरक्षपीठ के लिए गोरखपुर वालों की इसी आस्था ने इसके ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ से लेकर वर्तमान महंत योगी आदित्यनाथ तक को अपराजेय बना दिया। पहली बार जब पीठ से अलग जाकर किसी को प्रत्याशी बनाया गया तो चुनाव में आस्था का सवाल न रहा। वर्षों तक भक्त बने रहे लोग अचानक जनता बन गए क्योंकि सामने महाराजजी की जगह नेताजी थे। फिर, बीजेपी के कार्यों की भी समीक्षा होनी थी और उसके प्रत्याशी की भी। फिर तो प्रत्याशी की जाति भी देखनी थी। और जब सबकुछ देखा तो उपेन्द्रदत्त के रूप में योगी को हारना ही था...।
2. विकास महज छलावा...
भाजपा ने यह चुनाव विकास के नाम पर लड़ा लेकिन यदि इस मुद्दे पर उसका मूल्यांकन किया जाए तो वोट न देने का निर्णय ही लेना होगा...। इसके पूर्व, हालिया कई चुनाव भी भाजपा ने विकास के नाम पर ही लड़े थे लेकिन उनमें बाकी समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा था, विकास का मुद्दा तो सिर्फ मुखौटा था। इस बार पार्टी ने योगी के नाम को ही सबकुछ मान लिया और विकास को मुख्य मुद्दा ही नहीं बनाया, मान भी लिया इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि तीन दशक तक राज करने के बाद भी पार्टी गोरखपुर में विकास के नाम पर कुछ खास नहीं कर पाई है। सड़कों में गड्ढे हैं, नालियां जाम हैं, रात में मच्छर काटते हैं, दिन में सड़क पर सांड़ भिड़ जाते हैं, हाट—बाजारों में शौचालय नहीं हैं, बिजली मनमर्जी कटती है और बिल मनमर्जी बनता है, अपराध में कोई कमी नहीं, सड़कें अतिक्रमित और चलने की जगह नहीं... कुल मिलाकर कहीं, कुछ भी व्यवस्थित नहीं फिर भी मुद्दा उछाल दिया विकास का...? यह कुल्हाड़ी पर पैर दे मारने जैसा ही तो था... इस तरह के विकास पर वोटिंग पड़ने पर यह परिणाम तो तय ही था...।
भाजपा ने यह चुनाव विकास के नाम पर लड़ा लेकिन यदि इस मुद्दे पर उसका मूल्यांकन किया जाए तो वोट न देने का निर्णय ही लेना होगा...। इसके पूर्व, हालिया कई चुनाव भी भाजपा ने विकास के नाम पर ही लड़े थे लेकिन उनमें बाकी समीकरणों का भी पूरा ध्यान रखा था, विकास का मुद्दा तो सिर्फ मुखौटा था। इस बार पार्टी ने योगी के नाम को ही सबकुछ मान लिया और विकास को मुख्य मुद्दा ही नहीं बनाया, मान भी लिया इस बात को नजरअंदाज करते हुए कि तीन दशक तक राज करने के बाद भी पार्टी गोरखपुर में विकास के नाम पर कुछ खास नहीं कर पाई है। सड़कों में गड्ढे हैं, नालियां जाम हैं, रात में मच्छर काटते हैं, दिन में सड़क पर सांड़ भिड़ जाते हैं, हाट—बाजारों में शौचालय नहीं हैं, बिजली मनमर्जी कटती है और बिल मनमर्जी बनता है, अपराध में कोई कमी नहीं, सड़कें अतिक्रमित और चलने की जगह नहीं... कुल मिलाकर कहीं, कुछ भी व्यवस्थित नहीं फिर भी मुद्दा उछाल दिया विकास का...? यह कुल्हाड़ी पर पैर दे मारने जैसा ही तो था... इस तरह के विकास पर वोटिंग पड़ने पर यह परिणाम तो तय ही था...।
3. जाति है कि जाती नहीं...
यह सच है कि आदमी के कर्म बाद में तय होते हैं लेकिन उसके पैदा होते ही उसकी जाति तय हो जाती है। जाति की यह भावना सबके मन में होती है; किसी में कम, किसी में ज्यादा। बात जब चुनाव की हो तब यह जातिगत भावना खुलकर सामने होती है। योगी इस बात को जानते हैं और जरूरत पड़ने पर खुद कभी हिंदूवादी चेहरा तो कभी ठाकुर बन जाते हैं लेकिन उनकी बात नहीं मानी गई और गोरखपुर में प्रत्याशी चयन में शीर्ष नेतृत्व ने जातिगत समीकरण का ठीक से ख्याल न रखा...। गोरखपुर के जातीय गणित को देखें तो यहां करीब 19.5 लाख मतदाताओं में 3.5 लाख मतदाता उस निषाद समाज से हैं, जिस समाज से सपा—बसपा ने अपना प्रत्याशी खड़ा किया। इस समाज का वोट यहां के कुल वोटरों का 18 प्रतिशत है जो जीत—हार तय करने के लिए काफी है। यही नहीं, यहां करीब साढ़े तीन लाख मुस्लिम, दो लाख दलित, दो लाख यादव और डेढ़ लाख पासवान मतदाता हैं। इस तरह ये सभी मिल जाएं तो किसी की भी जीत—हार तय हो जानी है। दूसरी तरफ गोरखपुर में ब्राह्मण और ठाकुरों की पुरानी दुश्मनी है जो दिल में दफन है लेकिन जब भी मौका मिलता है बाहर आ जाती है। ब्राह्मण प्रत्याशी चुने जाने से ठाकुरों में गुस्सा था क्योंकि वह इसे अपने समाज से एक बड़ा सीट छीन लिए जाने के रूप में देख रहे थे और कहीं न कहीं उनमें यह डर भी था कि कहीं फिर से गोरखपुर में ब्राह्मण न हावी हो जाएं। एक तरफ ठाकुर इस चुनाव के प्रति उदास हो गए, वहीं उपेंद्रदत्त शुक्ल अपने बलबूते ब्राह्मणों को भी एकजुट नहीं कर पाए। ब्राह्मणों के वोट बंटे तो नहीं लेकिन सारे बूथों तक पहुंचे भी नहीं। दूसरी तरफ, प्रवीण निषाद को निषाद समाज का वोट तो मिला ही, सपा—बसपा गठजोड़ के चलते यादव, मुस्लिम, दलित वोट भी थोक में मिले। जीत के लिए सबसे बड़ा कारण यही जातीय समीकरण बना, जिसे भाजपा ने नजरअंदाज कर दिया था और गोरखपुर की नब्ज जानने वाले योगी ने भी बहुत गंभीरता से नहीं लिया।
4. प्रत्याशी चयन में गड़बड़ी...
भाजपा ने ऐसा ब्राह्मण प्रत्याशी खड़ा किया, जिसका कई ब्राह्मण वोटर पहली बार नाम सुने वहीं निषाद समाज से ऐसा प्रत्याशी खड़ा हुआ जिसका परिवार वर्षों से सिर्फ निषादों के लिए ही संघर्ष करता आ रहा है और अपने समाज का इस समय अगुआ है। उपेंद्रदत्त शुक्ल भाजपा के अच्छे कार्यकर्ता हैं और सक्रिय भी लेकिन जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी कोई पहचान नहीं है। संगठन में तो उन्हें हर कोई जानता है लेकिन ब्राह्मण समाज में उनकी वह ख्याति नहीं है। कई लोगों ने तो पहली बार गणेशदत्त का नाम सुना। इस बात को योगी भी समझते हैं इसलिए उन्होंने 16 चुनावी रैलियां कीं जबकि अखिलेश यादव ने केवल एक रैली की और बाजी पलट दी। गणेशदत्त जमीनी स्तर पर ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी बहुत प्रभावी नाम नहीं है इसलिए युवाओं में उनकी लोकप्रियता बहुत कम है। वर्षों गोरखपुर में रहने, सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के बाद भी हम खुद उनके बारे में बहुत नहीं जानते थे, ब्राह्मण चेहरा के रूप में तो कतई नहीं। जब प्रत्याशी के रूप में उनके नाम की घोषणा हुई तो हमने सबसे पहले उन्हें सोशल मीडिया पर ढूंढा था। एक पेज मिला था—
https://m.facebook.com/upendrabjpofficial/ लेकिन इस पर भी बहुत कम गतिविधियां दिखीं। गोरखपुर से भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी उपेंद्रदत्त के पेज पर आज भी मात्र 13872 लाइक्स हैं। हां, लाइक्स वोट नहीं होते लेकिन हुए तो? भाजपा की आईटी सेल कहां है? इस पेज पर अंतिम पोस्ट 9 मार्च को है। चुनाव के बाद जो मत मिले, उसके लिए भी जनता का आभार नहीं जताया...। जाहिर है कि जो वोट मिले भी, वह योगी के नाम पर वरना उपेंद्रदत्त गोरखपुर में आज भी कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं हैं। इस हकीकत को जानने के बाद भी इस नाम का चयन आ बैल मुझे मार जैसा ही था लेकिन जैसा कि योगी ने हार का कारण अति आत्मविश्वास को बताया; तब तक चर्चा यह थी कि जिसके सिर पर महाराजजी हाथ रख दें वह गोरखपुर का सांसद हो जाएगा और इसलिए यह नाम भी एक पल के लिए लोगों को मुफीद ही लगा लेकिन परिणाम उसके लिए मुफीद बना जिसने सारे समीकरण समझे और पूरी तैयारी से अपनी जीत के लिए संघर्ष किया।
भाजपा ने ऐसा ब्राह्मण प्रत्याशी खड़ा किया, जिसका कई ब्राह्मण वोटर पहली बार नाम सुने वहीं निषाद समाज से ऐसा प्रत्याशी खड़ा हुआ जिसका परिवार वर्षों से सिर्फ निषादों के लिए ही संघर्ष करता आ रहा है और अपने समाज का इस समय अगुआ है। उपेंद्रदत्त शुक्ल भाजपा के अच्छे कार्यकर्ता हैं और सक्रिय भी लेकिन जनप्रतिनिधि के रूप में उनकी कोई पहचान नहीं है। संगठन में तो उन्हें हर कोई जानता है लेकिन ब्राह्मण समाज में उनकी वह ख्याति नहीं है। कई लोगों ने तो पहली बार गणेशदत्त का नाम सुना। इस बात को योगी भी समझते हैं इसलिए उन्होंने 16 चुनावी रैलियां कीं जबकि अखिलेश यादव ने केवल एक रैली की और बाजी पलट दी। गणेशदत्त जमीनी स्तर पर ही नहीं, सोशल मीडिया पर भी बहुत प्रभावी नाम नहीं है इसलिए युवाओं में उनकी लोकप्रियता बहुत कम है। वर्षों गोरखपुर में रहने, सोशल मीडिया पर सक्रिय होने के बाद भी हम खुद उनके बारे में बहुत नहीं जानते थे, ब्राह्मण चेहरा के रूप में तो कतई नहीं। जब प्रत्याशी के रूप में उनके नाम की घोषणा हुई तो हमने सबसे पहले उन्हें सोशल मीडिया पर ढूंढा था। एक पेज मिला था—
https://m.facebook.com/upendrabjpofficial/ लेकिन इस पर भी बहुत कम गतिविधियां दिखीं। गोरखपुर से भाजपा के लोकसभा प्रत्याशी उपेंद्रदत्त के पेज पर आज भी मात्र 13872 लाइक्स हैं। हां, लाइक्स वोट नहीं होते लेकिन हुए तो? भाजपा की आईटी सेल कहां है? इस पेज पर अंतिम पोस्ट 9 मार्च को है। चुनाव के बाद जो मत मिले, उसके लिए भी जनता का आभार नहीं जताया...। जाहिर है कि जो वोट मिले भी, वह योगी के नाम पर वरना उपेंद्रदत्त गोरखपुर में आज भी कोई बड़ा राजनीतिक चेहरा नहीं हैं। इस हकीकत को जानने के बाद भी इस नाम का चयन आ बैल मुझे मार जैसा ही था लेकिन जैसा कि योगी ने हार का कारण अति आत्मविश्वास को बताया; तब तक चर्चा यह थी कि जिसके सिर पर महाराजजी हाथ रख दें वह गोरखपुर का सांसद हो जाएगा और इसलिए यह नाम भी एक पल के लिए लोगों को मुफीद ही लगा लेकिन परिणाम उसके लिए मुफीद बना जिसने सारे समीकरण समझे और पूरी तैयारी से अपनी जीत के लिए संघर्ष किया।
5. सत्ता का लोभ और घमंड...
योगी ने कहा कि अति आत्मविश्वास इस हार का कारण बना, वह इसे घमंड नहीं बोल पाए क्योंकि यह उनका खुद का घमंड था... कैसे बोलते? लगातार जीत के बाद घमंड किसी को भी हो सकता है लेकिन यदि योगी को हो जाए तो खुद गोरक्षपीठ उस घमंड को तोड़ने वाले को अपना आशीर्वाद दे देता है। योगी ने तो सत्ता का लोभ भी कर लिया और उसके मद में चूर भी हो गए। सजा मिलनी ही थी...। जब योगी मुख्यमंत्री बने थे तब हम गोरखपुर में ही थे। गोरखपुर में कुछ साथियों ने हमसे कहा था कि योगी ने यह ठीक नहीं किया। बड़े महाराजजी यानी ब्रह्मलीन महंत अवेद्यनाथ ने उनसे एक बार कहा था कि गोरखपुर गोरक्षपीठ की जिम्मेदारी है। वे राजनीति में कोई दूसरा बड़ा पद न लें जिससे गोरखपुर को छोड़ना पड़े। वह महंत के रूप में गोरक्षपीठ और सांसद के रूप में गोरखपुर के लोगों की सेवा करते रहें लेकिन योगी नहीं माने। गोरक्षपीठ में श्रद्धा रखने वाले कुछ लोगों का मानना है कि जब महाराजजी पीठ की गद्दी से अधिक सियासत के सिंहासन पर बैठने लगेंगे तो उनकी ख्याति कम होती जाएगी और उनका तेज यानी प्रभाव खत्म होता जाएगा...। हो सकता है कि यह बात कइयों को न पचे। शायद महाराजजी को भी नहीं इसलिए सत्तालोभ में उन्होंने अपने गुरु की बात को भी नजरअंदाज किया और सांसद से मुख्यमंत्री बन गए। सत्तालोभ के बाद मिली राजनीतिक जीत की सफलता से सत्ता का घमंड भी होना ही था। इस घमंड में चूर योगीजी को कोई फर्क नहीं पड़ता था कि गोरखपुर में उनके समर्थित प्रत्याशी के सामने कौन खड़ा है। इसलिए वह तो सपा—बसपा गठबंधन को भी सांप—छछूंदर ही समझे जबकि खुद उनकी पार्टी सत्ता के लिए कहीं भी, किसी भी दल के साथ हो जाती है और किसी भी दल के किसी भी व्यक्ति को अपने दल में शामिल कर लेती है। महाराजजी अपने घमंड में भूल गए कि वे उन निषादों को नजरअंदाज कर रहे हैं, जो उनके भक्त रहे हैं और उनकी जीत में बड़े सहायक। वह यह भी भूल गए इन कुछ सालों में निषादों ने संजय निषाद के रूप में अपना प्रतिनिधि चुन लिया है और उनका बेटा प्रवीण निषाद सिर्फ सपा—बसपा का ही नहीं, उस समाज का भी प्रत्याशी है। महाराजजी चाटुकारिता प्रेम से भी वंचित नहीं रह पाए और कुछ विशेष लोगों से घिर गए। इससे सभी का उन तक पहुंचना मुश्किल हो गया जिससे वह असली फीडबैक से वंचित रह गए और चापलूस उन्हें ले डूबे।
6. कार्यकर्ताओं की उपेक्षा...
किसी भी चुनाव में शीर्ष नेतृत्व प्रत्याशी ही चयन करता है लेकिन उसकी जीत—हार तो स्थानीय कार्यकर्ता ही तय करते हैं। यूं तो गोरखपुर में शुरू से ही हिंदू युवा वाहिनी के आगे भाजपा कार्यकर्ता पानी भरते थे लेकिन जबसे महाराजजी लखनउ बैठने लगे तबसे वाहिनी के कार्यकर्ता ही सबकुछ हो गए और भाजपा कार्यकर्ता हाशिए पर। मंदिर में कोई भाजपा कार्यकर्ता उतनी आसानी से कभी नहीं जा सकता है, जितनी आसानी से वाहिनी का दूत। इस तरह धीरे—धीरे भाजपा कार्यकर्ता उदासीन होते चले गए। इस चुनाव में उनकी उदासीनता काफी हद तक दिखी। अपनों से अपने अपमान का बदला लेने की हद तक...। योगी ने ताबड़तोड़ रैलियां जरूर कीं, लेकिन जनसंपर्क नहीं हो सका। जो समर्पित कार्यकर्ता घर—घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाते थे, उनमें से अधिकतर अपने ही घर से अपना ही वोट देने नहीं निकले। कई बूथ पर तो कार्यकर्ता नजर ही नहीं आए। जबकि दोपहर तक बूथों पर निगरानी होती है और स्थानीय वोटरों के नहीं पहुंचने पर उन्हें ढूंढकर बूथों तक पहुंचाया जाता है। यह काम सपा—बसपा ने तो किया लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं ने नहीं। योगी के क्षेत्र में महज 47.45 फीसदी वोटिंग का यह बड़ा कारण रहा। कई लोग सिर्फ इसलिए वोट करने नहीं गए क्योंकि उनसे किसी ने कहा ही नहीं। भाजपा के वोटरों ने कहीं और वोट नहीं किया, लेकिन भाजपा को भी नहीं दिया। कार्यकर्ताओं की उदासीनता से बूथ मैनेजमेंट निष्प्रभावी हो गया और हार प्रभावी...। दूसरी तरफ वोटरलिस्ट में खामियों ने भी बड़ी भूमिका निभाई। कई वास्तविक वोटरों के नाम कट गए और क्रिकेटर विराट कोहली जैसों तक के फर्जी नाम जुड़ गए। वास्तविक वोटरों के घर पर्ची नहीं पहुंची तो कई बूथ पर जाकर लौट आए। उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था...। यदि कार्यकर्ता सक्रिय और सजग रहते तो समय रहते मतदाता सूची में अपनों के नाम न छूटते और हर वोटर बूथ तक पहुंचता... मत प्रतिशत ठीक रहता और तब हार होती भी तो इतनी शर्मनाक न होती...।
किसी भी चुनाव में शीर्ष नेतृत्व प्रत्याशी ही चयन करता है लेकिन उसकी जीत—हार तो स्थानीय कार्यकर्ता ही तय करते हैं। यूं तो गोरखपुर में शुरू से ही हिंदू युवा वाहिनी के आगे भाजपा कार्यकर्ता पानी भरते थे लेकिन जबसे महाराजजी लखनउ बैठने लगे तबसे वाहिनी के कार्यकर्ता ही सबकुछ हो गए और भाजपा कार्यकर्ता हाशिए पर। मंदिर में कोई भाजपा कार्यकर्ता उतनी आसानी से कभी नहीं जा सकता है, जितनी आसानी से वाहिनी का दूत। इस तरह धीरे—धीरे भाजपा कार्यकर्ता उदासीन होते चले गए। इस चुनाव में उनकी उदासीनता काफी हद तक दिखी। अपनों से अपने अपमान का बदला लेने की हद तक...। योगी ने ताबड़तोड़ रैलियां जरूर कीं, लेकिन जनसंपर्क नहीं हो सका। जो समर्पित कार्यकर्ता घर—घर पहुंचकर दरवाजा खटखटाते थे, उनमें से अधिकतर अपने ही घर से अपना ही वोट देने नहीं निकले। कई बूथ पर तो कार्यकर्ता नजर ही नहीं आए। जबकि दोपहर तक बूथों पर निगरानी होती है और स्थानीय वोटरों के नहीं पहुंचने पर उन्हें ढूंढकर बूथों तक पहुंचाया जाता है। यह काम सपा—बसपा ने तो किया लेकिन भाजपा के कार्यकर्ताओं ने नहीं। योगी के क्षेत्र में महज 47.45 फीसदी वोटिंग का यह बड़ा कारण रहा। कई लोग सिर्फ इसलिए वोट करने नहीं गए क्योंकि उनसे किसी ने कहा ही नहीं। भाजपा के वोटरों ने कहीं और वोट नहीं किया, लेकिन भाजपा को भी नहीं दिया। कार्यकर्ताओं की उदासीनता से बूथ मैनेजमेंट निष्प्रभावी हो गया और हार प्रभावी...। दूसरी तरफ वोटरलिस्ट में खामियों ने भी बड़ी भूमिका निभाई। कई वास्तविक वोटरों के नाम कट गए और क्रिकेटर विराट कोहली जैसों तक के फर्जी नाम जुड़ गए। वास्तविक वोटरों के घर पर्ची नहीं पहुंची तो कई बूथ पर जाकर लौट आए। उनकी मदद करने वाला कोई नहीं था...। यदि कार्यकर्ता सक्रिय और सजग रहते तो समय रहते मतदाता सूची में अपनों के नाम न छूटते और हर वोटर बूथ तक पहुंचता... मत प्रतिशत ठीक रहता और तब हार होती भी तो इतनी शर्मनाक न होती...।
अब आगे...
जो लोग यह समझते हैं कि यह प्रवीण निषाद सिर्फ कुछ दिनों के लिए सांसद बने हैं, और यह हार महज योगी की असावधानी का नतीजा है तो वे जरा सावधान हो जाएं। प्रवीण की जीत भाजपा और योगी के घमंड, उनकी अधूरी तैयारी, असावधानी से थोड़ी आसान जरूर हो गई लेकिन यह इसलिए हुई क्योंकि सपा-बसपा ने ही नहीं, निषाद समाज ने भी अपनी तरफ से जीत के लिए पूरी तैयारी की थी...। इसलिए इसे महज संयोग न समझिए। गोरखपुर में संख्याबल में बहुत अधिक नहीं होने के बाद भी हमेशा ब्राह्मण, ठाकुरों का वर्चस्व रहा है जो पहली बार टूटा है। हमेशा इन दो जातियों की ही चर्चा होती है, पहली बार किसी अन्य जाति की चर्चा हो रही है...जिसके लिए ही निषाद समाज संघर्ष कर रहा था। इस उपलब्धि के लिए यह समाज वर्षों से खुद को एकजुट कर बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा करने में लगा था। हाल के दिनों में इस समाज की एकता ऐसी हो चली है कि कभी आरक्षण तो कभी किसी छोटी—मोटी मांग के लिए भी हजारों की तादाद में लोग एकत्र हो जाते हैं और सत्तासीन ब्राह्मणों—ठाकुरों में आपसी वैमनस्य व फूट इतनी है कि वे अपने ही प्रत्याशी के लिए पूरी तरह एकमत नहीं हो पाए। लोकतंत्र के लिए यह सुकून देने वाला पल है कि पहली बार किसी उपेक्षित समाज से इस तरह कोई अगुआ सामने आया है। पढ़ा—लिखा, युवा और बेदाग छवि वाला...। जिसे दोबारा चुनने की कई वजहें हैं, न चुनने की एक भी नहीं। निषाद समाज समेत पिछड़ी जातियों के लिए प्रवीण सिर्फ नेता नहीं, गर्व का विषय हैं इसलिए आगामी चुनावों में निषादों का वोट तो दूसरे दल और जातियों के प्रत्याशी भूल ही जाएं। जो सोचते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव बड़ी सहजता से जीता जा सकेगा, वे बड़े मूर्ख हैं। जब कोई योगी को हराने की नहीं सोच सकता था, तब निषादों ने अपनी एकजुटता से करारी शिकस्त दी है... ऐसे में अब तो वे विजयी हैं, आगे उन्हें हराना और कठिन होगा। निषाद किसी भी मुद्दे पर नहीं रिझेंगे, विकास के मुद्दे पर भी नहीं— क्योंकि उन्हें पहली बार अपने समाज पर गर्व करने की वजह मिली है। हम यह सब यूहीं नहीं कह रहे। हमने निषाद पार्टी की वेबसाइट और फेसबुक पेज दोनों का अध्ययन किया और यह पाया कि यह दल ब्राह्मणवाद—मनुवाद से नफरत करता है। इसलिए इस जीत में वह सिर्फ अपने समाज की राजनीतिक जीत ही नहीं देख रहा है, बल्कि सामंती, मनुवादी ब्राह्मण—ठाकुरों और अन्य सवर्ण जातियों की हार भी देख रहा है। यह जीत इस समाज के लिए बहुत बड़ी है... राजनीतिक जीत से बहुत आगे... और इसीलिए इस जीत ने सभी पिछड़ी जातियों को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एकजुट कर दिया है, लेकिन हमें पता है कि यह हार भी ठाकुरों—ब्राह्मणों व अन्य सवर्ण जातियों को एकजुट नहीं कर पाएगी... और चूंकि आगामी चुनाव में भी जाति ही अधिक प्रभावी रहेगी क्योंकि विकास सिर्फ भाषणों में हुआ है तो दोबारा यह सीट भाजपा के खाते में बड़ी आसानी से चली जाएगी... यह मुगालता न ही पालिए!
जो लोग यह समझते हैं कि यह प्रवीण निषाद सिर्फ कुछ दिनों के लिए सांसद बने हैं, और यह हार महज योगी की असावधानी का नतीजा है तो वे जरा सावधान हो जाएं। प्रवीण की जीत भाजपा और योगी के घमंड, उनकी अधूरी तैयारी, असावधानी से थोड़ी आसान जरूर हो गई लेकिन यह इसलिए हुई क्योंकि सपा-बसपा ने ही नहीं, निषाद समाज ने भी अपनी तरफ से जीत के लिए पूरी तैयारी की थी...। इसलिए इसे महज संयोग न समझिए। गोरखपुर में संख्याबल में बहुत अधिक नहीं होने के बाद भी हमेशा ब्राह्मण, ठाकुरों का वर्चस्व रहा है जो पहली बार टूटा है। हमेशा इन दो जातियों की ही चर्चा होती है, पहली बार किसी अन्य जाति की चर्चा हो रही है...जिसके लिए ही निषाद समाज संघर्ष कर रहा था। इस उपलब्धि के लिए यह समाज वर्षों से खुद को एकजुट कर बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में खड़ा करने में लगा था। हाल के दिनों में इस समाज की एकता ऐसी हो चली है कि कभी आरक्षण तो कभी किसी छोटी—मोटी मांग के लिए भी हजारों की तादाद में लोग एकत्र हो जाते हैं और सत्तासीन ब्राह्मणों—ठाकुरों में आपसी वैमनस्य व फूट इतनी है कि वे अपने ही प्रत्याशी के लिए पूरी तरह एकमत नहीं हो पाए। लोकतंत्र के लिए यह सुकून देने वाला पल है कि पहली बार किसी उपेक्षित समाज से इस तरह कोई अगुआ सामने आया है। पढ़ा—लिखा, युवा और बेदाग छवि वाला...। जिसे दोबारा चुनने की कई वजहें हैं, न चुनने की एक भी नहीं। निषाद समाज समेत पिछड़ी जातियों के लिए प्रवीण सिर्फ नेता नहीं, गर्व का विषय हैं इसलिए आगामी चुनावों में निषादों का वोट तो दूसरे दल और जातियों के प्रत्याशी भूल ही जाएं। जो सोचते हैं कि आगामी लोकसभा चुनाव बड़ी सहजता से जीता जा सकेगा, वे बड़े मूर्ख हैं। जब कोई योगी को हराने की नहीं सोच सकता था, तब निषादों ने अपनी एकजुटता से करारी शिकस्त दी है... ऐसे में अब तो वे विजयी हैं, आगे उन्हें हराना और कठिन होगा। निषाद किसी भी मुद्दे पर नहीं रिझेंगे, विकास के मुद्दे पर भी नहीं— क्योंकि उन्हें पहली बार अपने समाज पर गर्व करने की वजह मिली है। हम यह सब यूहीं नहीं कह रहे। हमने निषाद पार्टी की वेबसाइट और फेसबुक पेज दोनों का अध्ययन किया और यह पाया कि यह दल ब्राह्मणवाद—मनुवाद से नफरत करता है। इसलिए इस जीत में वह सिर्फ अपने समाज की राजनीतिक जीत ही नहीं देख रहा है, बल्कि सामंती, मनुवादी ब्राह्मण—ठाकुरों और अन्य सवर्ण जातियों की हार भी देख रहा है। यह जीत इस समाज के लिए बहुत बड़ी है... राजनीतिक जीत से बहुत आगे... और इसीलिए इस जीत ने सभी पिछड़ी जातियों को आगामी लोकसभा चुनाव के लिए एकजुट कर दिया है, लेकिन हमें पता है कि यह हार भी ठाकुरों—ब्राह्मणों व अन्य सवर्ण जातियों को एकजुट नहीं कर पाएगी... और चूंकि आगामी चुनाव में भी जाति ही अधिक प्रभावी रहेगी क्योंकि विकास सिर्फ भाषणों में हुआ है तो दोबारा यह सीट भाजपा के खाते में बड़ी आसानी से चली जाएगी... यह मुगालता न ही पालिए!

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