कैडर... जिनपर भाजपा को नाज है...
भाजपा ने इन चार सालों में इतने काम कर दिए हैं कि कैडर वोटरों के पास अब अपने आस-पास के लोगों के सवालों के जवाब नहीं हैं। इस तरह भाजपा ने अपने कैडर वोटर तो नहीं खोए हैं लेकिन निःस्वार्थ लाखों 'प्रचारक' खो दिए हैं।
हर आदमी न तो सरकार से सवाल करता और न ही हर आदमी के सवाल का जवाब सरकार देती है। चौक-चौराहों पर चाय पीते हुए, सड़क पर चलते हुए, ऑफिस में काम के बीच में जो सवाल निकलते हैं और उनके जवाब वहीं नहीं मिलते हैं तो आदमी को खटकने लगता है। न सरकार, न दल, न नेता, न कार्यकर्ता... यह कैडर वोटर ही होते हैं जो दूसरे वोटरों के सवालों का तत्क्षण मौके पर ही जवाब देकर उनका मुंह ही बंद नहीं कराते बल्कि उनपर उस दल, नेता, और उस विचारधारा का प्रभाव भी छोड़ जाते हैं लेकिन अब कैडर वोटर ही बाकी वोटरों से बचकर निकलने लगे हैं...।
यह कैडर वोटर बिल्कुल जमीन पर होते हैं और उनसे विचार-विमर्श, बहस करने वाले भी इसलिए इनके सवाल भी जमीन से जुड़े होते हैं और कैडर के जवाब भी। दुर्भाग्य है कि इन 4 वर्षों में भाजपा ने कुछ काम भी किए हैं तो जमीन पर रहकर नहीं, हवा में उड़ते हुए। इस कारण जमीन पर न कोई काम दिखता है, न कैडर वोटर को जमीन से जुड़े सवालों का जवाब सूझता है। वह भाजपा के प्रति समर्पित है जी-जान से... उसका दिल साफ है... वह पार्टी को दिल से चाहता है... उसे किसी पद, वेतन, सत्ता की इच्छा नहीं लेकिन वह नहीं चाहता कि वह जिसे चाहता है उसके बारे में कोई बुरा कहे। इसलिए वह किसी से भी लड़ पड़ता है लेकिन अब वह खुद से लड़ने लगा है। वह किसी नरेंद्र मोदी जैसे नाम से भी अधिक समर्पित है इस दल के लिए लेकिन वह वोटर है, नेता नहीं। वह जमीन से जुड़े अपने भाइयों के सवालों के जवाब थेथरई से नहीं दे सकता और जवाब है नहीं, इसलिए जो कैडर भाजपा को कुछ बोलते ही बरस पड़ता था, अब वह चुप रहने लगा है, वह कैडर जिसके पास सबके सवालों के जवाब थे, वह अब निरुत्तर होने लगा है... वह जो भाजपा और उसके नेता के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता था, वह अब उनको दी जा रही गाली भी सहन करने लगा है...।
हाँ, यह कैडर वोटर अब भी भाजपा के साथ है लेकिन अब वह अपने आस-पास के लोगों से अपने साथ चलने के लिए नहीं कह रहा। वह जो हर पल चहकता था, अब अकेले गुमशुम रहने लगा है...। वह जिसे कारवां पसंद था, अब अकेले चलने लगा है...। वह जिसकी जुबान पर सबके सवालों के जवाब होते थे, अब वह मन ही मन खुद से सवाल करने लगा है... मैं रुक क्यों नहीं रहा? मैं क्यों चल रहा हूँ? कैडर रुका नहीं है, थका नहीं है, अब भी चल रहा है लेकिन अब उसके पास अपने ही सवाल का जवाब नहीं है...।
यह कैडर वोटर बिल्कुल जमीन पर होते हैं और उनसे विचार-विमर्श, बहस करने वाले भी इसलिए इनके सवाल भी जमीन से जुड़े होते हैं और कैडर के जवाब भी। दुर्भाग्य है कि इन 4 वर्षों में भाजपा ने कुछ काम भी किए हैं तो जमीन पर रहकर नहीं, हवा में उड़ते हुए। इस कारण जमीन पर न कोई काम दिखता है, न कैडर वोटर को जमीन से जुड़े सवालों का जवाब सूझता है। वह भाजपा के प्रति समर्पित है जी-जान से... उसका दिल साफ है... वह पार्टी को दिल से चाहता है... उसे किसी पद, वेतन, सत्ता की इच्छा नहीं लेकिन वह नहीं चाहता कि वह जिसे चाहता है उसके बारे में कोई बुरा कहे। इसलिए वह किसी से भी लड़ पड़ता है लेकिन अब वह खुद से लड़ने लगा है। वह किसी नरेंद्र मोदी जैसे नाम से भी अधिक समर्पित है इस दल के लिए लेकिन वह वोटर है, नेता नहीं। वह जमीन से जुड़े अपने भाइयों के सवालों के जवाब थेथरई से नहीं दे सकता और जवाब है नहीं, इसलिए जो कैडर भाजपा को कुछ बोलते ही बरस पड़ता था, अब वह चुप रहने लगा है, वह कैडर जिसके पास सबके सवालों के जवाब थे, वह अब निरुत्तर होने लगा है... वह जो भाजपा और उसके नेता के खिलाफ एक शब्द नहीं सुन सकता था, वह अब उनको दी जा रही गाली भी सहन करने लगा है...।
हाँ, यह कैडर वोटर अब भी भाजपा के साथ है लेकिन अब वह अपने आस-पास के लोगों से अपने साथ चलने के लिए नहीं कह रहा। वह जो हर पल चहकता था, अब अकेले गुमशुम रहने लगा है...। वह जिसे कारवां पसंद था, अब अकेले चलने लगा है...। वह जिसकी जुबान पर सबके सवालों के जवाब होते थे, अब वह मन ही मन खुद से सवाल करने लगा है... मैं रुक क्यों नहीं रहा? मैं क्यों चल रहा हूँ? कैडर रुका नहीं है, थका नहीं है, अब भी चल रहा है लेकिन अब उसके पास अपने ही सवाल का जवाब नहीं है...।

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