समान नागरिक संहिता का वादा भी झूठ था...?
भारत के संविधान की धारा 44 में समान नागरिक संहिता राज्य नीति के निर्देशक सिद्धांतों के रूप में दर्ज की गई है। भाजपा का मानना है कि जब तक भारत में समान नागरिक संहिता को अपनाया नहीं जाता है, तब तक लैंगिक समानता कायम नहीं हो सकती है। समान नागरिक संहिता सभी महिलाओं के अधिकारों की रक्षा करती है। भाजपा सर्वश्रेष्ठ परंपराओं से प्रेरित समान नागरिक संहिता बनाने को कटिबद्ध है जिसमें उन परंपराओं को आधुनिक समय की जरूरतों के मुताबिक ढाला जाएगा।"
- (भाजपा चुनाव घोषणा पत्र 2014)
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2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा के तमाम बड़े लोक लुभावने वादों में से यह भी एक था— समान नागरिक संहिता। सत्ता मिलने के बाद इसके लिए कोई प्रयास नहीं किया। हां, इस दौरान कानून कई बनाए। ऐसे कानून जो समान नागरिक संहिता की संभावनाओं को और दूर कर सकें। और कुछ ऐसे कानून भी जिससे भाजपा समेत तमाम राजनीतिक दलों को मनमानी की खुली छूट मिल जाए। यह दल हर निगरानी, हर जांच से परे हो जाएं...।
भाजपा शासनकाल से पहले एक कानून हुआ करता था— विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010। यह कानून विदेशी कंपनियों को राजनीतिक दलों को चंदा देने से रोकता था यानी कि राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने पर रोक लगाता था। दूसरे शब्दों में कहें तो अब तक पाक, चीन या कहीं से भी दलों के खाते में कोई राशि आने पर वह जांच के दायरे में होती थी लेकिन अब कोई जांच—वांच नहीं होगी। इसी मार्च में लोकसभा ने विपक्षी दलों के विरोध के बीच वित्त विधेयक 2018 में 21 संशोधनों को मंजूरी दी थी जिसमें एक संशोधन विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010 से संबंधित भी था। भाजपा सरकार ने वित्त विधेयक 2016 के जरिए विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेना आसान कर दिया लेकिन इतने से जी नहीं भरा। इसमें और अधिक संशोधन कर यह व्यवस्था सुनिश्चित की गई कि अभी से नहीं, बल्कि 1976 से राजनीतिक दलों को मिले चंदे की कोई जांच न हो। इसके लिए तारीखें तक बदल दी गईं। लोकसभा वेबसाइट के ही अनुसार, वित्त अधिनियम, 2016 की धारा 236 के पहले पैराग्राफ में 26 सितंबर 2010 के शब्दों और आंकड़ों के स्थान पर पांच अगस्त 1976 शब्द और आंकड़े पढ़े जाएंगे। पूर्व की तिथि से किए गए इस संशोधन से भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों दलों को एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया।
कुल मिलाकर, अब आर्थिक चंदे के जरिये विदेशी कंपनियों और देशों को भारतीय चुनाव को प्रभावित करने की पूरी छूट होगी। जाहिर सी बात है, जो विदेशी कंपनियां लाखों—करोड़ों रुपये दान में देंगी, उनके कुछ एजेंडे भी होंगे लेकिन इन दलों को वह राशि बताने की कोई मजबूरी नहीं होगी, न कोई जांच की जा सकेगी।
... तो बताइए, इसी कानून को मान लें ना समान नागरिक संहिता? भाजपा आई थी सत्ता में नागरिकों के लिए कानून बनाने के वादे कर, और सत्ता मिलते ही अपने हित के कानून बनाने लगी। कानून भी कैसे? जिसके जरिए देश के चुनाव में विदेशी अपनी पूंजी के बलबूते हस्तक्षेप कर सकें? अब इस कानून से तो भाजपा की देशभक्ति और पारदर्शिता दोनों ही साबित हो जाती है ना? अच्छा तरीका है... हर तरह के भ्रष्टाचार को संविधान में संशोधन कर कानून बना देना ताकि न कोई जांच हो, न कोई सवाल उठे। करने वाला पाक—साफ बना रहे।
अरे हां, कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रभावशाली लोकपाल के गठन का भी वादा किया था। वह वादा तो पूरा किया नहीं, ऐसी व्यवस्था जरूर कर दी कि अपने साथ—साथ कांग्रेस को भी 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचा लिया जिसमें इन दोनों दलों को ही एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया था।
वाकई, अंतर तो है...। भाजपा, भाजपा है...। कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन को भुनाकर भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर सरकार बनाती है और सत्ता हाथ में आते ही कानून की नाव पर सवार होकर खुद ही भ्रष्टाचार का सागर पार नहीं करती, अपने साथ उस कांग्रेस को भी वैतरणी पार करा देती है...। कितनी दरियादिल है ना...। वाकई, अंतर तो है...।
भाजपा शासनकाल से पहले एक कानून हुआ करता था— विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010। यह कानून विदेशी कंपनियों को राजनीतिक दलों को चंदा देने से रोकता था यानी कि राजनीतिक दलों को विदेशी चंदा लेने पर रोक लगाता था। दूसरे शब्दों में कहें तो अब तक पाक, चीन या कहीं से भी दलों के खाते में कोई राशि आने पर वह जांच के दायरे में होती थी लेकिन अब कोई जांच—वांच नहीं होगी। इसी मार्च में लोकसभा ने विपक्षी दलों के विरोध के बीच वित्त विधेयक 2018 में 21 संशोधनों को मंजूरी दी थी जिसमें एक संशोधन विदेशी चंदा नियमन कानून, 2010 से संबंधित भी था। भाजपा सरकार ने वित्त विधेयक 2016 के जरिए विदेशी चंदा नियमन कानून (एफसीआरए) में संशोधन कर राजनीतिक दलों के लिए विदेशी चंदा लेना आसान कर दिया लेकिन इतने से जी नहीं भरा। इसमें और अधिक संशोधन कर यह व्यवस्था सुनिश्चित की गई कि अभी से नहीं, बल्कि 1976 से राजनीतिक दलों को मिले चंदे की कोई जांच न हो। इसके लिए तारीखें तक बदल दी गईं। लोकसभा वेबसाइट के ही अनुसार, वित्त अधिनियम, 2016 की धारा 236 के पहले पैराग्राफ में 26 सितंबर 2010 के शब्दों और आंकड़ों के स्थान पर पांच अगस्त 1976 शब्द और आंकड़े पढ़े जाएंगे। पूर्व की तिथि से किए गए इस संशोधन से भाजपा और कांग्रेस दोनों को ही 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचने में मदद मिलेगी जिसमें दोनों दलों को एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया।
कुल मिलाकर, अब आर्थिक चंदे के जरिये विदेशी कंपनियों और देशों को भारतीय चुनाव को प्रभावित करने की पूरी छूट होगी। जाहिर सी बात है, जो विदेशी कंपनियां लाखों—करोड़ों रुपये दान में देंगी, उनके कुछ एजेंडे भी होंगे लेकिन इन दलों को वह राशि बताने की कोई मजबूरी नहीं होगी, न कोई जांच की जा सकेगी।
... तो बताइए, इसी कानून को मान लें ना समान नागरिक संहिता? भाजपा आई थी सत्ता में नागरिकों के लिए कानून बनाने के वादे कर, और सत्ता मिलते ही अपने हित के कानून बनाने लगी। कानून भी कैसे? जिसके जरिए देश के चुनाव में विदेशी अपनी पूंजी के बलबूते हस्तक्षेप कर सकें? अब इस कानून से तो भाजपा की देशभक्ति और पारदर्शिता दोनों ही साबित हो जाती है ना? अच्छा तरीका है... हर तरह के भ्रष्टाचार को संविधान में संशोधन कर कानून बना देना ताकि न कोई जांच हो, न कोई सवाल उठे। करने वाला पाक—साफ बना रहे।
अरे हां, कांग्रेस के खिलाफ भ्रष्टाचार को मुख्य चुनावी मुद्दा बनाने वाली भाजपा ने अपने चुनावी घोषणापत्र में प्रभावशाली लोकपाल के गठन का भी वादा किया था। वह वादा तो पूरा किया नहीं, ऐसी व्यवस्था जरूर कर दी कि अपने साथ—साथ कांग्रेस को भी 2014 के दिल्ली उच्च न्यायालय के उस फैसले से बचा लिया जिसमें इन दोनों दलों को ही एफसीआरए कानून के उल्लंघन का दोषी पाया गया था।
वाकई, अंतर तो है...। भाजपा, भाजपा है...। कांग्रेस के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनांदोलन को भुनाकर भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर सरकार बनाती है और सत्ता हाथ में आते ही कानून की नाव पर सवार होकर खुद ही भ्रष्टाचार का सागर पार नहीं करती, अपने साथ उस कांग्रेस को भी वैतरणी पार करा देती है...। कितनी दरियादिल है ना...। वाकई, अंतर तो है...।

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