मोदीजी! याद कीजिए, एनपीए वाला वादा...


आप जानते हैं एनपीए किस बला का नाम है? अब जब यह बला आपके सिर पड़ी है तो जान ही रहे होंगे लेकिन अब भी निश्चिंत बैठे हैं तो जान लीजिए। एनपीए का फुल फॉर्म होता है— Non-performing asset। बैंक में एनपीए का सीधा मतलब वह लोन है जो बहुत बड़ा है लेकिन बैंक अब वसूल नहीं सकता। इस तरह के कर्ज अक्सर वे बड़े लोग लेते हैं जिन पर उनसे भी बड़े लोगों के हाथ होते हैं...। 
सोचकर देख लीजिए, यदि हम—आप जैसे लोग कोई लोन लेते है तो पहले तो मिलना आसान नहीं। मिल गया और चुका नहीं पाए तो उसकी वसूली के लिए बैंक संपत्ति छीन लेता है, घर गुंडे भेज देता है, वसूली के लिए खून पीने को तैयार बैठा रहता है। हिम्मत कहां हमारी कि ऋण लें और चुकाए नहीं? न चुकाने के बारे में तो छोड़िए, हम सब तो ऋण लेने से पहले ही हजार बार सोचते हैं। ... तो हम लोग जो ऋण लेते हैं, वह एनपीए नहीं हो पाते। लेकिन, बड़े लोगों की बड़ी बातें...। इसलिए वे बड़े लोन लेकर भी नहीं चुकाते। बैंक भी वसूली से हाथ खड़े कर देता है क्योंकि इन लोन लेने वालों के हाथ बहुत लंबे होते हैं, कई बार तो कानून से भी लंबे... तो इन पर हाथ कौन डालेगा? लालच या बड़े दबाव में बैंक इस तरह के लोन देता है और फिर लालच या दबाव में ही आकर लोन वसूल पाने में अक्षम हो जाता है तब इसे एनपीए की श्रेणी में डाल देता है। यानी यह एक पूंजी हो जाती है, जिसके हमारे पास सिर्फ आंकड़े होते हैं लेकिन इसका देश की अर्थव्यवस्था में कोई योगदान नहीं होता बल्कि नुकसान होता है...।
भारतीय अर्थव्यवस्था को जमीन पर ला पटकने वाले इस एनपीए का आंकड़ा भी बताते हैं लेकिन उसके पहले 2014 के चुनाव में भाजपा द्वारा इस बारे में की गई यह घोषणा तो पढ़ लीजिए—
""साल दर साल एनपीए की मात्रा बढ़ती जा रही है। पिछले कई वर्षों से ऐसा हो रहा है। भाजपा ऐसे कदम उठाएगी जिससे बैंकिंग क्षेत्र में एनपीए में कमी आए। भाजपा एक ऐसा मजबूत नियामक निकाय बनाएगी जो गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों से निवेशकों की रक्षा करेगी...।""
भाजपा के घोषणापत्र में एनपीए के जिक्र और इस संबंध में की गई इस घोषणा का मतलब है कि भाजपा को सत्ता में आने से पहले ही मालूम था कि एनपीए कितनी गंभीर समस्या है लेकिन सत्ता में आने के बाद सरकार न जाने किन कार्यों में व्यस्त हो गई कि अपनी सारी घोषणाओं की तरह यह घोषणा भी भूल गई। करना था सदाचार, बढ़ता गया भ्रष्टाचार...। जिन क्षेत्रों में विकास के दावे किए, उनमें तो हुए नहीं, लेकिन एनपीए का विकास खूब हुआ। एक ताजा आंकड़े के अनुसार, डूबे कर्ज के मामले में भारत इस समय दुनिया में तीसरे नंबर पर पहुंच गया है। अभी हाल ही में मध्य प्रदेश के नीमच निवासी चंद्रशेखर गौड़ ने सूचना के अधिकार के तहत जो जानकारी हासिल की है उसके अनुसार, देश का संपूर्ण एनपीए (जीएनपीए)7,76,067 करोड़ रुपये है। इसमें से 6,89,806 करोड़ रुपये सार्वजनिक बैंकों के हैं, तो 86,281 करोड़ रुपये निजी बैंकों के हैं. पौने आठ लाख करोड़ रुपए यूं ही कुछ लोग ले गए।
समझते हैं न कि पौने आठ लाख करोड़ में कितने शून्य लगेंगे? यह पैसा अब देश में नहीं है, न देश के किसी काम आएगा... फिर भी यह कोई घोटाला नहीं है। इस सरकार की तारीफ में आप सब सही कहते हैं, बाकी सरकारों और इस सरकार में अंतर तो है इसलिए तो इस सरकार में घोटाला करने और उसे ढ़कने के तरीके भी अलग तरह के हैं। सरकार भगोड़ों से रुपये तो वसूल नहीं पा रही तो एनपीए कम करने के लिए आपके—हमारे टैक्स से भरे रुपए इनके अब खाते में जमा कर रही है। यह हम यूं ही नहीं कर रहे। 'बिज़नेस स्टैंडर्ड' का आंकड़ा देख लीजिए। 38 विलफुल डिफॉल्टरों के 500 करोड़ रुपये का एनपीए write off कर दिया गया है। इसका मतलब समझते हैं? इसका मतलब यह हुआ कि बैंक ने अपने मुनाफे से एनपीए के खाते में पैसा डाला और इस कारण एनपीए के खाते में नुकसान कम दिखने लगा है। कुल छह बैंक ऐसे हैं, जिनमें 60,000 करोड़ से ज़्यादा रकम डाली गई है। यह 60 हजार करोड़ रुपये सरकार के हैं, यानी जनता के हैं। इसका मतलब यह कि लुटेरे देश का खजाना लूटकर गायब हो गए और देश की जनता से टैक्स वसूलकर भरे गए सरकारी खजाने से सरकार उसकी भरपाई कर रही है। यानी दोनों तरफ से लूट। वाकई, यह सरकार बेमिसाल है। अंतर तो है...।

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