जिंदों का कुछ तो ख्याल कीजिए, इन बूतों से खुद को आजाद कीजिए...
जिस देश की जनसँख्या इतनी अधिक हो गई हो कि जिंदा लोगों के रहने-चलने की जगह न बचे, वहां जगह-जगह प्रतिमाएं खड़ी कर राजनीति और फिर उन्हें तोड़कर बवाल करने की सियासत कब तक? जिंदा आदमी की कद्र नहीं, बूतपरस्ती क्यों?
मेरा मानना है कि देश में प्रतिमाएं सिर्फ उनकी लगाई जाए जिनका इस देश—समाज के लिए कोई योगदान हो। और प्रतिमा भी बस एक लगे- जन्मस्थल पर। यदि शहादत दी है तो दूसरी प्रतिमा लगे- शहादत स्थल पर और यदि इससे भी अधिक सम्मान-श्रद्धांजलि देनी है तो एक अंतिम प्रतिमा लगे देश की राजधानी में स्थित राष्ट्रीय स्मारक में।
यह तय हो जाए तो किसी भी दल की सरकार होगी, ना तो वह किसी महापुरुष की प्रतिमा तोड़ सकेगा और न ही अपनी मनमर्जी किसी की भी, कहीं भी प्रतिमा खड़ी कर सकेगा। यह क्या मजाक चल रहा है...? कांग्रेस ने देश की अधिकतर जगह गांधी-नेहरू को दे दी है, मायावती ने अम्बेडकर को, वामपंथी सरकारों ने लेनिन को और अब भाजपा दीनदयाल के लिए दयालु हुई जा रही है। हम यह नहीं कहते कि इन्हें सम्मान नहीं मिलना चाहिए, लेकिन इनके नाम पर राजनीति बंद होनी चाहिए।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में एक राष्ट्रीय स्मारक बने। उसमें सभी महापुरुषों को ससम्मान जगह दी जाए और हर शहर, संस्थान, चौक-चौराहों से सभी की प्रतिमाएं समेट ली जाएं...। एक बार यह करके देखिए, खास नामों और प्रतिमाओं पर होने वाली सियासत बंद हो जाएगी। इनको लेकर होने वाला बवाल भी थम जाएगा। इन पर होने वाला अपव्यय रुक जाएगा। चौक-चौराहों पर जगह होगी और वे सांस ले पाएंगे। एक ही जगह पर सभी महापुरुषों के दर्शन हो सकेंगे। प्रतिमाएं सुरक्षित भी रहेंगी और उनकी देखरेख भी हो सकेगी।

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणियों का स्वागत है लेकिन फूहड़ शब्द निषेध हैं।