कहीं बुझ न जाए दीया की ये बाती
'सूबे में शिक्षा का अधिकार कानून आरटीइ कड़ाई से लागू है और इसके तहत निजी तौर पर संचालित विद्यालयों के पंजीकरण को सख्ती भी। कानून से लाभ सर्वविदित है, लेकिन इस कानून की गाज कुछ ऐसे स्कूलों पर गिरी है जो सेवा भाव से गठित हैं और प्रतिभाएं तो गढ़ते हैं मगर सरकारी रजिस्ट्रेशन लेने में असमर्थ हैं। ऐसी कितनी ही कक्षाएं, मंदिरों, मसजिदों, घरों, दलित बस्तियों में चल रही हैं, जो किसी शिक्षा प्रेमी की शारीरिक-मानसिक-आर्थिक मेहनत की बदौलत हैं और ऐसे गरीब बच्चों को छात्र कहलाने का समान दे रही हैं जिन्हें सरकारी योजनाएं यह अधिकार नहीं दे पाईं।'
'तपोवन' में शिक्षा का दीया वर्ष 1998 से ही जल रहा है। दीये की बाती और तेल की व्यवस्था 'परमात्मा' करते हैं। इसकी रोशनी से डेढ़ सौ से अधिक घरों में उजाला है। किंतु, अब 'परमात्मा' के इस अदम्य धैर्य, हौसले और सेवाभाव की अग्निपरीक्षा है। सरकारी एक्ट ने जाने-अनजाने, तपोवन में जल रहे शिक्षा के दीप को चुनौती दिया है और एक दशक से भी अधिक समय से जल रहा दीप अपना प्रकाश समेटने को विवश नजर आ रहा है।
'तपोवन' को छपरा में सभी जानते हैं और, इसी तरह श्रीपति परमात्मा भी सबकी जुबान पर हैं। 1930 तक पटना विश्वविद्यालय के कुलसचिव रह चुके महेश्र्वर प्रसाद के सुपौत्र एस. परमात्मा के पिता, शहर के स्वनामधन्य विद्वान और राजेन्द्र कालेज के संस्थापक प्राचार्य भुवनेश्वर प्रसाद ने कवि कुलगुरु कालिदास के मेघदूतम समेत अन्य ग्रंथों का भोजपुरी में अनुवाद किया व कई अन्य ग्रंथ भी लिखे थे। मां सुरेश्वरी देवी ने 1948 में बापू कन्या विद्यालय के सहारे क्षेत्र की बालिकाओं को ज्ञानदीप दिया। कुल के संस्कार और विरासत में मिले ज्ञानदान के दायित्व को 1998 में एस. परमात्मा ने संभाला। 1997 में वे सिंदरी खाद कारखाने (झारखंड) से सेवानिवृत्त होकर शहर के नबीगंज मुहल्ले स्थित अपने पैतृक आवास 'तपोवन' में आए थे और अपने आसपास शिक्षा की बुझी, बुझ रही लौ को अपनी सेवा, समर्पण की शक्ति देने का निर्णय लिया।
उन्हीं की जुबानी सुनिए, मैं हैरान था स्कूल में रहने वाले बच्चों को सड़कों पर देखकर। जिमेदारी का अहसास भी हुआ, इन्हें स्कूल में ही होना चाहिए। प्रेम कुमार, प्रभुनाथ गुप्ता व बाबूलालजी के सहयोग से 'सेवा' (पंजीकरण नहीं) बनी। गलीमुहल्लों के अभिभावकों को शिक्षा की उपयोगिता बता बच्चों को तपोवन में भेजने का अनुरोध हुआ। बेमन से भेजे गए बच्चे एक बार यहां आकर फिर वापस नहीं हुए। आर्थिक समस्या भी थी। निशुल्क शिक्षा में संसाधन की भी जरूरत थी। सबने मिलकर इसके लिए भी प्रयास किया। बच्चों को उनकी अतिआवश्यक चीजें देकर पढ़ाया जाने लगा। लेकिन, संकटों का अंत नहीं था। बाबूलालजी नहीं रहे, प्रभुनाथ गुप्ता सूरत में इन्कम टैस अधिकारी बनकर चले गए, प्रेम कुमारजी ने आर्थिक कारणों से असमर्थता जता दी और पारिवारिक जरूरतों के लिए ट्यूशन पढ़ाने लगे। अकेला बच गया तपोवन में। लेकिन, बच्चों ने कभी साथ नहीं छोड़ा बल्कि संख्या बढ़ती ही गयी। हर सुबह पहली से लेकर दसवी तक के 30 से अधिक बच्चे आते हैं। पढ़ाई में आ रही हर समस्या के निदान की कोशिश होती है। खुशी होती है जब तपोवन के सफल छात्रों को देखता हूं, वे पैर छूते हैं और कहते हैं आपके आशीर्वाद से सब संभव है..। फेरी लगाने वाले पिता का बेटा राजन नसीर आईटीआई मढ़ौरा में है, दर्जी की बेटी आयशा खातून दिल्ली में फैशन टेक्नोलाजी कर रही है, साई प्रकाश बीआईटी मेसरा में है...।
अब एस. परमात्मा के हौसले के टूटने की बारी है। कहते हैं, सरकार ने सभी को पंजीकरण करने का दबाव दिया है। क्या निष्ठा का पंजीकरण संभव है? चेहरे पर दर्द का भाव है, आक्रोशपूर्ण लहजा- अब इस अवस्था में दबाव नहीं सहूंगा। यदि अधिक दबाव हुआ तो तपोवन की 'सेवा' बंद कर दूंगा।
शहर के दहियावां टोला में अपने घर में रोज 50 से अधिक गरीब दलित बच्चों को कापी, पेन, कपड़े आदि देकर शिक्षादान करने वाली भावना प्रियदर्शिनी कहती हैं कि हमें सरकारी शर्तें मंजूर नहीं। शिक्षा की ज्योति जलाने वाले शिक्षाप्रेमियों की लंबी सूची है, सबकी राय है कि वे अपनी सेवा भावना का रजिस्ट्रेशन नहीं करा सकते। सरकार को सोचना होगा।
शहर के दहियावां टोला में अपने घर में रोज 50 से अधिक गरीब दलित बच्चों को कापी, पेन, कपड़े आदि देकर शिक्षादान करने वाली भावना प्रियदर्शिनी कहती हैं कि हमें सरकारी शर्तें मंजूर नहीं। शिक्षा की ज्योति जलाने वाले शिक्षाप्रेमियों की लंबी सूची है, सबकी राय है कि वे अपनी सेवा भावना का रजिस्ट्रेशन नहीं करा सकते। सरकार को सोचना होगा।
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| तपोवन में बच्चों को नि:शुल्क शिक्षा देते एस. परमात्मा |
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| सरकारी एक्ट के प्रति आक्रोशपूर्ण मुद्रा में श्रीपति परमात्मा |
(मेरी यह रिपोर्ट दैनिक जागरण के आज के अंक में भी पढ़ी जा सकती है।)


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