भोजपुरी, बटोहिया और रघुवीर नारायण!
'भोजपुरी', 'बटोहिया' व 'रघुवीर नारायण'- ये तीनों नाम क्रमशः एक ऐसी भाषा, रचना और रचनाकार के हैं, जो अपेक्षाओं के सुनहरे स्वप्न व उपेक्षाओं की कड़वी हकीकत के बीच अपनी उम्र बीता रहे हैं। ऐसे में आश्चर्य नहीं कि, बढ़ती अपेक्षाओं के बावजूद, उपेक्षाओं से जूझते हुए 'बटोहिया' ने अपनी उम्र के १०० साल देख लिए। यह उल्लेखनीय है कि 'बटोहिया' भोजपुरी में लिखी गयी रचना है।
भोजपुरी- एक ऐसी भाषा, जो अपनी बढ़ती उम्र के साथ प्रचारित हुई, प्रसारित हुई और प्रांतों की सीमा तोड़ सागर पार तक तो पहुंच गई, किन्तु अपने इन बढ़ते कदमों के बाद भी 'बोली' की पहचान से आगे निकल 'भाषा' के लक्ष्य तक नहीं पहुंच सकी। (भोजपुरी को अभी तक संविधान की आठवीं अनुसूची में स्थान नहीं मिला है और यह बोलचाल में ही भाषा के रूप में व्यवहृत है, आधिकारिक रूप से नहीं।)
बटोहिया- एक ऐसी रचना, जो १९११ में रचित होकर एक ही वर्ष १९१२ ई. तक कलकत्ता (बंग्ला भाषाई क्षेत्र) जैसे महानगरों में प्रसिद्ध हुई और प्रसिद्ध इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने रघुवीर नारायण को पत्रा लिखा- 'I can not remember about you without your BATOHIA.' ऐसी रचना, जिसकी कीर्ति प्रांत की सीमा से आगे बढ़ मॉरीशस, फिजी, ट्रिनीडाड, गायना तक तो फैली लेकिन, अपने ही भाषाई इलाकों में पहचान की मोहताज बन गई। तब का यह 'अमर गीत' अपने ही क्षेत्र में अब 'शहीद' हो रहा है।
बटोहिया- एक ऐसी रचना, जो १९११ में रचित होकर एक ही वर्ष १९१२ ई. तक कलकत्ता (बंग्ला भाषाई क्षेत्र) जैसे महानगरों में प्रसिद्ध हुई और प्रसिद्ध इतिहासकार सर यदुनाथ सरकार ने रघुवीर नारायण को पत्रा लिखा- 'I can not remember about you without your BATOHIA.' ऐसी रचना, जिसकी कीर्ति प्रांत की सीमा से आगे बढ़ मॉरीशस, फिजी, ट्रिनीडाड, गायना तक तो फैली लेकिन, अपने ही भाषाई इलाकों में पहचान की मोहताज बन गई। तब का यह 'अमर गीत' अपने ही क्षेत्र में अब 'शहीद' हो रहा है।
रघुवीर नारायण - अंग्रेजी के सशक्त रचनाकार लेकिन भोजपुरी की रचना 'बटोहिया' ने अमर गीतकार की श्रेणी में स्थान दिलायी। ३० अक्टूबर १८८४ को बिहार के छपरा शहर में अवतरित होने वाले इस महान गीतकार ने अपने प्रांत को ख्याति दिलाने के लिए 'A tale of Bihar' लिखा, और अब खुद इसी बिहार में गुमनाम बन गए हैं।
बेहद ही गौर करने वाली बात है कि 'बटोहिया' एक ऐसी 'भाषा' में लिखी रचना है, जिसके नाम के आगे 'भाषा' लिखने के लिए स्वीकृति की दरकार पड़ी है। यह भी काबिले गौर है कि इस अमर गीत के रचयिता बाबू रघुवीर नारायण भोजपुरी क्षेत्र से आते हैं। भोजपुरी क्षेत्र- एक ऐसा भाषाई क्षेत्र, जहां भोजपुरी बोलचाल में तो पहले स्थान पर है, पर लिपिकीय रूप में हिंदी व अन्य भाषाओं की तूती है। जहां, अन्य भाषाओं में लिखी रचनाओं के रचनाकारों का दंभ तो है, परंतु भोजपुरी के रचनाकार काल के चक्र में घूम रहे हैं। जहां, भोजपुरी मातृभाषा तो है, किन्तु इसकी डिग्री (विश्वविद्यालयों में इस भाषा की पढ़ाई) बेकार मानी जाती है। जहां, 'बटोहिया' राष्ट्रगीत के रूप में याद तो किया जाता है, लेकिन गाया नहीं जाता। क्या, मेरा यह प्रश्न आपके मन में भी नहीं कौंधता कि इस अपनी भाषा (भोजपुरी), अपनी रचना (बटोहिया) और हमारे अपने रचनाकार (रघुवीर नारायण), अपने ही क्षेत्र में, अपनों के अपनापन के मोहताज क्यों हो गए हैं? अवश्य कौंधता होगा। किंतु इस सवाल के जवाब को भला प्रयत्न क्यों? और गर जवाब मिल भी जाए तो, इस पर अमल क्यों? इतनी ही रूचि थी तो यह हश्र ही न होना था।
बेहद ही गौर करने वाली बात है कि 'बटोहिया' एक ऐसी 'भाषा' में लिखी रचना है, जिसके नाम के आगे 'भाषा' लिखने के लिए स्वीकृति की दरकार पड़ी है। यह भी काबिले गौर है कि इस अमर गीत के रचयिता बाबू रघुवीर नारायण भोजपुरी क्षेत्र से आते हैं। भोजपुरी क्षेत्र- एक ऐसा भाषाई क्षेत्र, जहां भोजपुरी बोलचाल में तो पहले स्थान पर है, पर लिपिकीय रूप में हिंदी व अन्य भाषाओं की तूती है। जहां, अन्य भाषाओं में लिखी रचनाओं के रचनाकारों का दंभ तो है, परंतु भोजपुरी के रचनाकार काल के चक्र में घूम रहे हैं। जहां, भोजपुरी मातृभाषा तो है, किन्तु इसकी डिग्री (विश्वविद्यालयों में इस भाषा की पढ़ाई) बेकार मानी जाती है। जहां, 'बटोहिया' राष्ट्रगीत के रूप में याद तो किया जाता है, लेकिन गाया नहीं जाता। क्या, मेरा यह प्रश्न आपके मन में भी नहीं कौंधता कि इस अपनी भाषा (भोजपुरी), अपनी रचना (बटोहिया) और हमारे अपने रचनाकार (रघुवीर नारायण), अपने ही क्षेत्र में, अपनों के अपनापन के मोहताज क्यों हो गए हैं? अवश्य कौंधता होगा। किंतु इस सवाल के जवाब को भला प्रयत्न क्यों? और गर जवाब मिल भी जाए तो, इस पर अमल क्यों? इतनी ही रूचि थी तो यह हश्र ही न होना था।
किसी भी वस्तु, व्यक्ति, स्थान या फिर चाहे कोई रचना ही क्यों न हो, उससे सबका परिचय कोई उसका अपना ही कराता है। यह बात हमारी भाषा भोजपुरी, इस भाषा में रचित राष्ट्रीय गीत बटोहिया और इसके रचनाकार रघुवीर नारायण पर भी अक्षरशः लागू होती है। भाषा हमारी है तो उससे दुनिया का परिचय कौन कराएगा? इसे इसका हक कौन दिलाएगा? इस भाषाई मिट्टी में हम पले-बढ़े हैं, तो इस मिट्टी की रचना (बटोहिया) से लोगों का साक्षात्कार कौन कराएगा? और, बाबू रघुवीर हमारे बीच के हैं, तो उनके बारे में दूसरों को कौन बताएगा? इन सभी सवालों के जवाब के रूप में हम स्वयं खड़े हैं। हम, यानी भोजपुरी-हिंदी भाषी लोग। स्वाभाविक है, इन सबके लिए प्रयत्न तो हमें ही करना था, करना है और करना पड़ेगा भी। पूर्व में हमने वह अपना प्रयत्न (जो कि हमारा कर्तव्य भी बनता है) नहीं किया, परंतु गलतियां कभी भी इतनी बड़ी नहीं होती कि उसे सुधारी न जा सके या फिर वक्त कभी भी इतना आगे नहीं भागता कि उन गलतियों को सुधरने का हमें मौका ही न मिले। 'हमें प्रयत्न करना था'- यह वाक्य बीतते समय के साथ हमारी भूल बन गया, परंतु 'प्रयत्न करना है'- यह वाक्य अब भी हमारे सामने वर्तमान बनकर हमारी उन गलतियों को सुधारने के मौके लिए खड़ा है। अब तो वक्त भी है, अवसर भी है और शायद हम ऐसा करने की सामर्थ्य भी रखते हैं, तो फिर क्यों न हम सभी मिलकर हवा में अपनी बंद मुट्ठी लहरायें, संकल्पित हों और अपनी उन गलतियों को आने वाले दिनों में भूत के गर्त में मिला दें!
हमारे इस प्रयत्न में यह बहुत ही बड़ी बात होगी कि भोजपुरी, बटोहिया और रघुवीर नारायण में से किसी एक के लिए भी प्रयत्न करें तो वह सबको फल दे जाता है। मसलन, यदि भोजपुरी विकसित होती है तो इसमें रचित रचना का भी मान बढ़ेगा। यदि, बटोहिया को सम्मान मिलता है तो भोजपुरी गौरवान्वित होगी और इसी तरह यदि, भोजपुरी व इसके राष्ट्रगीत को उसका लक्ष्य दिलाने में हम कामयाब हो जाते हैं तो, हम स्वतः ही इस गीत के अमर रचयिता रघुवीर नारायण को भी श्रद्धांजलि दे पाएंगे। आवश्यकता है अपनी इच्छा और कथनी को करनी में बदलने की! हासिल, सबको, सबका हक, खुद ही हो जाएगा।
(मेरा यह आलेख, "बटोहिया : एक राष्ट्रगीत का शताब्दी वर्ष" नामक स्मारिका पुस्तक में भी पढ़ा जा सकता है। 11 अक्टूबर 2011 को जन चेतना यात्रा की रवानगी से पूर्व छपरा में आयोजित सभा में इसका लोकार्पण पूर्व उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज, राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष अरूण जेटली, भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता रविशंकर, राजीव प्रताप रूड़ी, बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी आदि नेताओं द्वारा किया गया।)

टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें
आपकी टिप्पणियों का स्वागत है लेकिन फूहड़ शब्द निषेध हैं।