ये आतंकी है, न पूछो इनकी जात क्या है?
बिहार के छपरा में एक आतंकवादी गिरफ़तार हुआ। नाम- फरखंद जमाल। एक और मुसलमान आतंकी के रूप में गिरफ़तार हुआ। कुछ कट़टर हिंदुओं में बहस सी चल पड़ी- मुसलमान आतंकवादी होते ही हैं, इसमें नई क्या बात है? सबसे बड़ी बात कि जैसे ही आतंकी के गिरफ़तार होने की सूचना मिली, लोगों ने उसका नाम जानना चाहा। जिसे नाम नहीं पता चलता, उसका एक ही सवाल होता- हिंदू है कि मुसलिम। ऐसा सवाल करते वक्त वे पहले ही सोच लिए होते कि वह मुसलमान ही रहा होगा। और जैसे ही पता चलता है कि गिरफ़तार आतंकी मुसलमान था। खुश ऐसे होते हैं गोया उनकी भविष्यवाणी सच हो गयी हो। लेकिन, ऐसे लोगों से जब एक सवाल किया गया कि क्या होता यदि वह हिंदू होता, तो फिर जैसे उनके अंदर का त्रिकालदर्शी जाग उठता है। कहते हैं,- हिंदू आतंकवादी हो ही नहीं सकता। मैं तो पहले ही जानता था कि वह मुसलमान ही होगा। हालांकि हमने देखा था कि उसकी जाति नहीं जानने के पहले, वह हिंदू है या मुसलमान का सवाल करते समय ऐसे लोग अंदर ही अंदर खौफजदा थे। उनमें इस बात का खौफ साफ दिख रहा था कि सामने वाला कही आतंकी को हिंदू न बता दे। लेकिन जैसे ही उसके मुसलिम होने का पता चलता ऐसे लोगों के सीने चौड़े हो जाते। हमसे भी कईयों ने फोन कर पूछा। वे पहले आश्चर्य से पूछते- सुना है छपरा में आतंकवादी गिरफ़तार हुआ है? जैसे ही हम उन्हें कहते कि हां, वह एक सिमी कार्यकर्ता है और आईबी की टीम उसे लेकर यहां से चली गयी, अगला सवाल हो जाता- कहां से धराया है? हम उन्हें बताते कि छपरा के गुदरी बाजार से, यह क्षेत्र भगवान बाजार थाना के अंतर्गत आता है। हालांकि कुछ लोग उसकी गिरफ़तारी नगर थाना क्षेत्र से होने की बात भी कह रहे हैं। तुरंत तीसरा सवाल किया जाता- मुसलमान है? हम उन्हें बताते कि हां, उसका नाम फरखंद जमाल है और वह यहां अपनी बहन के यहां रहता था। अब तक लगातार सवाल करने वाले यहां आकर अपनी राय देने लग जाते- ये मुसलमान देश को बर्बाद करके ही छोड़ेंगे। इन्हें समझ में ही नहीं आता कि इनका देश हिंदुस्तान है। ये यही के रहने वाले हैं और यही इनका राष्ट्र है।... बस बोलते ही चले जाते और हमें या तो मोबाइल डिसकनेक्ट करना पड़ता या फिर हम कहते कि थोड़ी देर बाद करते हैं, और फोन काट देते। कुछ जो कॉल आए उन्हें इस घटना के बारे हल्की जानकारी भी थी और उनका पहला ही सवाल था कि- गुदरी में जो आतंकवादी गिरफ़तार हुआ है वह मुसलमान ही है न? ऐसे लोग यह पहले ही मान चुके थे कि वह मुसलमान ही होगा, बस तसल्ली चाहते थे। हमने एक आतंकवादी को मुसलमान और मुसलमान को आतंकवादी घोषित करने की लोगों में अजीब बेचैनी देखी। यही नहीं, यह हाल केवल हिंदुओं का नहीं था, कुछ मुसलमान भी अपने को शर्मिंदा महसूस कर रहे थे। अरे, इसमें शर्मिंदगी वाली क्या बात है? उसे तो गिरफ़तार होना ही चाहिए था, वह एक आतंकवादी था। क्या आतंकियों की भी कोई जाति होती है? कोई धर्म होता है? यदि होता तो फिर वे ऐसे रास्ते क्यों चुनते। वे या तो हिंदू धर्म के अनुसार आचरण करते या फिर मुसलमान धर्म के अनुसार। लेकिन उनका आचरण तो दोनों में से किसी भी धर्म से इत्तेफाक नहीं रखता। ऐसे लोगों का तो धर्म आतंक फैलाना है और जाति आतंकवादी है। ऐसे लोगों के मुसलमान होने पर मुसलमानों को भला शर्मिंदगी क्यों हो? और यदि ऐसे आतंकवादी हिंदुओं में से भी निकल जाएं तो हिंदुओं को आश्चर्य क्यो हो? न तो सनातन धर्म कभी हिंसा की बात करता है और न ही मुसलमानों का पाक ग्रंथ कुरान शरीफ। और जो इस पाक ग्रंथ के अनुसार आचरण ही नहीं करता, उसे हम मुसलमान मानें ही क्यों? यदि वह मुसलमान होता तो क्या कुरान शरीफ नहीं पढ़ता और पढ़ता तो इसके अनुसार आचरण नहीं करता। यदि किया होता तो फिर वह आतंकी बनता ही नहीं। और जिसने अपने धर्मग्रंथ की बात ही नहीं मानी, वह उस धर्म का कैसे हो सकता है। वह तो उस धर्म के विरोध आचरण कर रहा है। ऐसे में वह न सिर्फ देश के लिए आतंकवादी है बल्कि वह उस धर्म के लिए भी विद्रोही है, जिस धर्म में वह पला-बढ़ा है। हमें तो ऐसा लगता है कि हिंदुओं से अधिक हमारे मुसलमान भाईयों ने इस बात को अधिक हवा दे दी है। अरे, फतवा क्या सिर्फ बुर्का नहीं पहनने पर जारी होता है? धर्म विरुद़ध आचरण करने वाले ऐसे लोगों पर फतवे जारी कर इन्हें धर्म व समाज से बहिष्कृत क्यों नहीं कर दिया जाता, ताकि अन्य इनसे सीख ले सके और साथ ही अन्य धर्म वालों को भी यह पता चल जाये कि मुसलमान सिर्फ मुसलमान है और कुछ नहीं। हम दाद देते हैं मुम्बई के उन मुसलमानों को जिन्होंने होटल ताज पर हमले में मारे गए आतंकवादियों को दफानाने के लिए अपने कब्रिस्तानों की किवाड़े बंद कर दी थी। हम ऐसे मुसलमान भाईयों की इरादों की कद्र करते हैं। यह उन तमाम भटके हुओं को एक सबक था। एक काम और किया जाना चाहिए, इन आतंकियों के लिए। धर्म बहिष्कृत का काम। मुसलमानों में से निकले कुछ ऐसे भ्रष्ट युवकों पर भी फतवे जारी होने चाहिए जो कि अपने धर्म को बदनाम कर रहे हैं। मुसलमान यानी मुसल्लह ईमान। फिर आतंक की बात सोची भी कैसे जा सकती। जहां ईमान की बात है वहां तो जो भी होगा, जिसका भी होगा भला ही होगा, बुरा तो किसी का हो ही नहीं सकता। हम और लोगों के विचारों से अधिक इत्तेफाक नहीं रखते, क्योंकि हम इस बात पर दृढ़ निश्चय हैं कि आतंकवादी सिर्फ आतंकवादी है और उसकी कोई जाति नहीं है। यदि है भी तो उसकी जाति भी आतंकवादी की ही है। ऐसे लोग न तो हिंदुओं में होने चाहिए और न ही मुसलमानों में। यदि हिंदुओं में हो तो हिंदू उन्हें अपने धर्म से बाहर कर दें और यदि मुसलमानों में से कोई ऐसा दरिंदा पैदा हो जाये तो फिर मुसलमान भी इन्हें अपने धर्म से बाहर निकाल फेंके। ऐसे लोग जलाशय में सड़ी किसी मछली की तरह होते हैं जो पूरे तालाब को ही गंदा, दूषित कर देते हैं। जैसे कि कुछ आतंकवादियों के कारण आज पूरा मुसलिम समुदाय कलंकित हो रहा है और कुछ भ्रष्ट भगवे धारियों के चलते पूरा सनातन धर्म। मुसलमानों में निकले कुछ आतंकी युवकों से कम खतरनाक ये हिंदू धर्म के भगवेधारी साधु भी नहीं, जो आये दिन पापियों से भी अधिक पापी बन जाते हैं। हम उदाहरण देकर एक बार फिर न तो हिंदुओं की भावना को आहत करना चाहते हैं और न ही ऐसे पापियों का नाम लेकर खुद को। और बात को अधिक लंबा खींचकर कोई विवाद भी नहीं चाहते। हम तो बस इतना ही चाहते हैं कि आगे से यदि कोई आतंकी गिरफ़तार हो और यदि आप हमारे पास सूचना के लिए फोन करें, तो कृपया ऐसे लोगों की जाति ना पूछें। आतंक फैलाने वालों की क्या जाति? एक और अनुरोध करना है। यदि हमारे इन विचारों से किसी भी धर्म के किसी समर्थक की भावना को ठेस पहुंची हो तो कृपया माफ करेंगे। यह हमारा अपना व्यक्तिगत विचार है। इन विचारों का किसी अन्य व्यक्ति, संस्थान या धर्म से कोई वास्ता नहीं।

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