बीबी हो तो ऐसी
आपने यह फिल्म अवश्य देखी होगी। अपने जमाने की हिट फिल्म है। रेखा ने अपनी बेजोड़ अदाकारी की बदौलत इस चरित्र को ऐसा जिया कि फिल्म का नाम लेते ही रेखा की अदाकारी की याद स्वत: हो आती है। लेकिन हम यहां न तो इस फिल्म की बात करने जा रहे हैं और न ही फिल्म की नायिका रेखा की। हम रील नहीं रियल लाइफ में घटित एक घटना का जिक्र करने जा रहे हैं। इस घटना को जिसने भी सुना, एक बार चुटकी ले ही ली- बीबी हो तो ऐसी। दरअसल, सभी पति चाहते हैं कि उनकी पत्नी उन्हें थोड़ी स्वतंत्रता दे। कुछ पति यह भी चाहते हैं कि वे दूसरी लड़कियों या दूसरों की बीबीयों को जी भर कर देखें भी और जब वे ऐसा कर रहे हों तो उनकी पत्नी उन्हें टोके भी नहीं। पर, ऐसा होता नहीं। ऐसे नजारे देखना तो दूर, सुनकर भी किसी की पत्नी का पारा हाई हो जाता है और पति से उलझ पड़ती है। बहुत सारी ऐसी खबरें पढ़ने को मिलती रहती हैं कि किसी मर्द को दूसरे की बीबी या किसी अन्य लड़की के साथ इश्क लड़ाते देख उसकी पत्नी ने उसे पीट डाला, थाने पहुंचा दिया। उदाहरण के तौर पर हम बिहार के एक बहुत ही चर्चित और सनसनीखेज घटना का जिक्र करना चाहेंगे। हिंदी के प्रोफेसर मटुक नाथ अपनी ही स्टूडेंट जुली को दिल दे बैठे और दोनों ने ऐसा इश्क फरमाया कि मीडिया ने उन्हें प्रेमियों के आदर्श के रूप में उछाल दिया। कालेज गोइंग लडकों ने तो उन्हें अपना आदर्श ही मानना शुरू कर दिया, इश्क के मामले में। लेकिन जब पूरी दुनियां इन दोनों के प्रेम पर चुटकी ले रही थी, मजे ले रही थी, तब एक औरत थी जिसने इसका पूरा विरोध किया। वह मटुक जी की पत्नी थीं। उन्होंने जूली के साथ जब प्रोफेसर को पकड़ा तो दोनों की जमकर पिटाई की और फिर जूली को थाने लेकर चली गयीं। अलग बात है कि पति का स्वार्थी प्यार झुका नहीं और बीबी को ही हार माननी पड़ी। प्रोफेसर साहब अपने स्टूडेंट के साथ रह रहे हैं और बीबी अलग। लेकिन, इन आम घटनाओं से अलग हम जिस घटना का जिक्र आपसे करने जा रहे हैं उसमें पत्नी ने अपने पति की इश्कबाजी का विरोध नहीं किया, बल्कि उसे इश्क करने का लाइसेंस ही दे डाला। यह अंदर की बात है कि ऐसा करना उसकी मजबूरी थी, या इसके पीछे पति से उसका बेइंतहा प्यार था। दरअसल, पत्नी को जब पति के इश्क की खबर मिली तो पहले तो उसने समझाया लेकिन जब इश्क में अंधे पति ने उसकी बात नहीं मानी तो फिर उसने पति की इच्छा पूरी ही कर दी। जिस लड़की से उसके पति का इश्क चल रहा था वह भी कोई और नहीं उसकी ही अपनी छोटी बहन थी। उसने ऐसा उपाय किया कि दोनों मिलते ही नहीं रहे बल्कि हमेशा के लिए मिल गए, कभी जुदा न होने के लिए। एक-दूसरे का हमसफर बन गए। जी हां, उसने उन दोनों की शादी ही करा दी। अब तो आप कहेंगे ना कि बीबी हो तो ऐसी...।
बिहार प्रदेश के सारण जिले के नगरा पंचायत के रसूलपुर गांव के कालिका साह ने 2003 में अपनी पुत्री सबिता की शादी इसी जनपद के गड़खा थाना के सत्यहा गांव के वैद्यनाथ साह के 30 वर्षीय पुत्र अशोक साह से की थी। जिसे तीन बच्चे भी हुए। पहले बच्चे के जन्म के समय सबिता अपनी 23 वर्षीय बहन सरिता कुमारी को देखभाल के लिये बुलाई थी। उसी समय उसके पति का दिल अपनी साली पर आ गया। धीरे-धीरे एकतरफा प्रेम दोतरफा में बदल गया और फिर जीजा-साली प्रेमी-प्रेमिका की भूमिका में आ गए। अंतत: इस प्रेम कहानी की खबर पत्नी सबिता को भी हुयी और उसने अपनी बहन व पति को काफी समझाया लेकिन दोनों नहीं माने। इधर कुछ दिनों से पति अशोक सरिता से शादी के लिए सबिता पर दबाव बनाने लगा। यहां तक कि उसने यह भी धमकी दी कि यदि उनकी शादी नहीं हुयी तो वे दोनों ही खुदकुशी कर लेंगे। पत्नी को गंभीर होना पड़ा। उसने सोचा यदि उसने दोनों के प्रेम को स्वीकार नहीं किया तो फिर बहन भी मरेगी और पति भी। बच्चे अनाथ हो जाएंगे। जबकि यदि उसने दोनों की बातें मान ली तो फिर उसे कष्ट तो अवश्य होगा लेकिन उसका पति व बहन दोनों खुशी-खुशी रह सकेंगे। अपने स्वार्थ के लिए उनकी खुशी क्यों बर्बाद की जाए। सबिता ने दोनों की शादी कराने की बात मान ली। गांव स्थित ही एक मंदिर में पत्नी ने दोनों की शादी करा दी। गांव वालों ने इसका काफी विरोध किया लेकिन जब पत्नी ही पति के पक्ष में खड़ी हो तो फिर कोई क्या कर सकता है। सबको अंतत: झुकना ही पड़ा।
कालिका का शादी के बाद प्रेम करना, दूसरी शादी करना ठीक है या नहीं, यह अलग विषय है लेकिन उसकी पत्नी के इस त्याग ने यह साबित कर दिया है कि प्रेम में हमेशा अपनों की खुशी देखी जाती है, अपनी नहीं। सही अर्थों में कहें, तो हम कह सकते हैं कि सबिता का प्रेम उच्च स्तर का है जबकि सरिता और कालिका का प्रेम स्वार्थ की बुनियाद पर है। सरिता और कालिका के प्रेम की बुनियाद हवस है, जबकि पत्नी सबिता का त्याग उसके आंतरिक व अगाध प्रेम का प्रतीक है। यदि कालिका सरिता से भी प्रेम करता तो वह निश्चित ही सबिता के भी प्रेम को समझ सकता था। और एक प्रेम करने वाला व्यक्ति दूसरे प्रेम करने वाली स्त्री को दुख देने वाला कार्य कभी नहीं करता। इसी तरह यदि सरिता भी कालिका से सच्चा प्रेम करती तो वह समझ सकती थी कि ऐसा ही प्रेम उसकी दीदी सबिता भी करती होगी और उसके प्रेम पर डाका डालना प्रेम का अपमान है। पत्नी सबिता का प्रेम ही वास्तविक है जिसने अपनों की खुशी के लिए अपनी खुशी की बलि दे दी। हम गर्व कर सकते हैं अपने पति को इतना अधिक प्रेम करने वाली एक स्त्री पर, लेकिन हमें शर्म है अपनी पत्नी की खुशी छीन लेने वाले पति पर और अपनी बहन का पति छीनने वाली सौतन पर। प्यार सिर्फ सबिता का ही सच्चा है, जीजा-साली का एक-दूसरे से प्यार करना प्यार नहीं, दैहिक भूख मिटाने का माध्यम भर है। ऐसे प्रेमी-प्रेमिकाओं का समाज में विरोध उचित है। गांव वालों की भूमिका इसमें सही रही। हां, जब पत्नी ने ही दोनों को मिलाने की ठान ली हो तो फिर गांव वालों का विरोधी स्वर रूक जाना भी ठीक ही था। एक बात और, कई लोग यह तर्क दे सकते हैं कि सबिता को झुकना नहीं चाहिए था, उसे ऐसे पति से तलाक ले लेनी चाहिए थी। लेकिन उन लोगों के लिए हमारा जवाब यह है कि शादी में भले ही तलाक हो जाए, प्रेम में तलाक नहीं होता। सबिता ने अपने पति से सच्चा प्यार किया, वह न तो उसे तलाक दे सकती थी और न ही उसे दुख देने वाला आचरण कर सकती थी। फिर एक मां के तौर पर बेटों का भविष्य भी तो सोचना था उसे। उसने जो भी किया सही किया, इस पर गर्व किया जाना चाहिए, लेकिन दोनों प्रेमियों ने जो किया वह सरासर गलत है, शर्म करने वाली बात है।
बिहार प्रदेश के सारण जिले के नगरा पंचायत के रसूलपुर गांव के कालिका साह ने 2003 में अपनी पुत्री सबिता की शादी इसी जनपद के गड़खा थाना के सत्यहा गांव के वैद्यनाथ साह के 30 वर्षीय पुत्र अशोक साह से की थी। जिसे तीन बच्चे भी हुए। पहले बच्चे के जन्म के समय सबिता अपनी 23 वर्षीय बहन सरिता कुमारी को देखभाल के लिये बुलाई थी। उसी समय उसके पति का दिल अपनी साली पर आ गया। धीरे-धीरे एकतरफा प्रेम दोतरफा में बदल गया और फिर जीजा-साली प्रेमी-प्रेमिका की भूमिका में आ गए। अंतत: इस प्रेम कहानी की खबर पत्नी सबिता को भी हुयी और उसने अपनी बहन व पति को काफी समझाया लेकिन दोनों नहीं माने। इधर कुछ दिनों से पति अशोक सरिता से शादी के लिए सबिता पर दबाव बनाने लगा। यहां तक कि उसने यह भी धमकी दी कि यदि उनकी शादी नहीं हुयी तो वे दोनों ही खुदकुशी कर लेंगे। पत्नी को गंभीर होना पड़ा। उसने सोचा यदि उसने दोनों के प्रेम को स्वीकार नहीं किया तो फिर बहन भी मरेगी और पति भी। बच्चे अनाथ हो जाएंगे। जबकि यदि उसने दोनों की बातें मान ली तो फिर उसे कष्ट तो अवश्य होगा लेकिन उसका पति व बहन दोनों खुशी-खुशी रह सकेंगे। अपने स्वार्थ के लिए उनकी खुशी क्यों बर्बाद की जाए। सबिता ने दोनों की शादी कराने की बात मान ली। गांव स्थित ही एक मंदिर में पत्नी ने दोनों की शादी करा दी। गांव वालों ने इसका काफी विरोध किया लेकिन जब पत्नी ही पति के पक्ष में खड़ी हो तो फिर कोई क्या कर सकता है। सबको अंतत: झुकना ही पड़ा।
कालिका का शादी के बाद प्रेम करना, दूसरी शादी करना ठीक है या नहीं, यह अलग विषय है लेकिन उसकी पत्नी के इस त्याग ने यह साबित कर दिया है कि प्रेम में हमेशा अपनों की खुशी देखी जाती है, अपनी नहीं। सही अर्थों में कहें, तो हम कह सकते हैं कि सबिता का प्रेम उच्च स्तर का है जबकि सरिता और कालिका का प्रेम स्वार्थ की बुनियाद पर है। सरिता और कालिका के प्रेम की बुनियाद हवस है, जबकि पत्नी सबिता का त्याग उसके आंतरिक व अगाध प्रेम का प्रतीक है। यदि कालिका सरिता से भी प्रेम करता तो वह निश्चित ही सबिता के भी प्रेम को समझ सकता था। और एक प्रेम करने वाला व्यक्ति दूसरे प्रेम करने वाली स्त्री को दुख देने वाला कार्य कभी नहीं करता। इसी तरह यदि सरिता भी कालिका से सच्चा प्रेम करती तो वह समझ सकती थी कि ऐसा ही प्रेम उसकी दीदी सबिता भी करती होगी और उसके प्रेम पर डाका डालना प्रेम का अपमान है। पत्नी सबिता का प्रेम ही वास्तविक है जिसने अपनों की खुशी के लिए अपनी खुशी की बलि दे दी। हम गर्व कर सकते हैं अपने पति को इतना अधिक प्रेम करने वाली एक स्त्री पर, लेकिन हमें शर्म है अपनी पत्नी की खुशी छीन लेने वाले पति पर और अपनी बहन का पति छीनने वाली सौतन पर। प्यार सिर्फ सबिता का ही सच्चा है, जीजा-साली का एक-दूसरे से प्यार करना प्यार नहीं, दैहिक भूख मिटाने का माध्यम भर है। ऐसे प्रेमी-प्रेमिकाओं का समाज में विरोध उचित है। गांव वालों की भूमिका इसमें सही रही। हां, जब पत्नी ने ही दोनों को मिलाने की ठान ली हो तो फिर गांव वालों का विरोधी स्वर रूक जाना भी ठीक ही था। एक बात और, कई लोग यह तर्क दे सकते हैं कि सबिता को झुकना नहीं चाहिए था, उसे ऐसे पति से तलाक ले लेनी चाहिए थी। लेकिन उन लोगों के लिए हमारा जवाब यह है कि शादी में भले ही तलाक हो जाए, प्रेम में तलाक नहीं होता। सबिता ने अपने पति से सच्चा प्यार किया, वह न तो उसे तलाक दे सकती थी और न ही उसे दुख देने वाला आचरण कर सकती थी। फिर एक मां के तौर पर बेटों का भविष्य भी तो सोचना था उसे। उसने जो भी किया सही किया, इस पर गर्व किया जाना चाहिए, लेकिन दोनों प्रेमियों ने जो किया वह सरासर गलत है, शर्म करने वाली बात है।
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