दिस इज बिहार पुलिस
देश में तेज-तर्रार पुलिस के तौर पर या तो मुम्बई की मिशाल दी जाती है या फिर देश की राजधानी दिल्ली की। लेकिन यदि सबसे बेकार पुलिस की कार्यशैली देखनी हो तो आप कहां जाएंगे? ज्यादा सोचने की क्या जरूरत है, अरे साहब, बिहार चले आइए। हम भी आपको यही मिल जाएंगे। आजकल इसी निकम्मी पुलिस की सुरक्षा में मेरा भी आशियाना है। सुरक्षित है या नहीं, यह तो वे ही बताएंगे। फिलहाल हम आपको इनकी कारस्तानी बताते हैं। दरअसल बात छोटी होती तो हम भी टाल देते। भला अपने देश की पुलिस की शिकायत कौन करना चाहेगा और बिहार तो हमारी कर्मभूमि है। ऐसे में बिहारी पुलिस की शिकायत करते समय थोड़ी असमंजस की स्थिति तो अवश्य है लेकिन पानी सिर से उपर जा चुका है। मामला चोरी, डकैती रोकने का होता तो पचा जाते लेकिन यहां तो पूरा का पूरा आतंकवाद से जुड़ा मामला है, यानी इंटरनेशनल है। बात तो बतानी ही होगी, चर्चा भी करनी होगी और इसी बहाने हमारी बिहार पुलिस की कार्यशैली की समीक्षा भी हो जाएगी। बिहार के यदि सबसे शांत जिलों का नाम लें, तो एक नाम छपरा का भी है। बस यही बात छपरा के लिए घातक हो गयी। दरअसल, हैदराबाद में हुए सीरियल बम ब्लास्ट के बाद पूरे देश की पुलिस चौकन्नी हो गयी थी। देश का खूफिया तंत्र किसी कुत्ते की मानिंद इन आतंकवादियों के ठिकाने सूंघ रहा था। ऐसे में इससे जुड़े आतंकवादियों को किसी सुरक्षित ठिकाने की तलाश थी और बिहार से सुरक्षित जगह और क्या हो सकती है। जहां की जनता तो जागती है लेकिन पुलिस आराम से सोती है। बम ब्लास्ट में इन्वाल्व एक आतंकवादी फरखंद जमाल भी इसी बिहार के सबसे शांत और मुफीद जगह छपरा में आ छुपा। सूबे की राजधानी पटना के फुलवारी थाना क्षेत्र में उसका घर है लेकिन बिहार में होने के साथ ही पटना राजधानी सिटी है, ऐसे में यहां की पुलिस थोड़ी सी सतर्क तो है ही? उसने ऐसी जगह रहना ठीक समझा जहां की पुलिस एक पल के लिए भी सतर्क नहीं होती, यानी हर पल नींद में होती है, नौकरी करती है, वेतन पाती है लेकिन डयूटी नहीं करती। छपरा में फरखंद के बहन की शादी हुयी है और वह यहां रह चुका था, यहां की पुलिसिया कार्यशैली से भी परिचित था। उसका बहनोई यहां के एसपी आफिस में बिहार पुलिस में कार्यरत है और इस नाते वह यहां की पुलिस की अंदर की कार्यशैली भी जानता था। फरखंद पहले भी कई बार छपरा आ चुका था और अक्सर यहां रहा भी था। आस-पास के कुछ लोगों के अनुसार बीच-बीच में वह लंबे समय के लिए गायब हो जाया करता और जब भी आता तो उसके साथ कुछ नए चेहरे होते थे जिनका परिचय वह अपने दोस्तों के रूप में दिया करता था। फरखंद की छपरा में इतनी पैठ बन चुकी थी कि वह यहां के सरकारी विभागों में बतौर संवेदक निर्माण कार्य करा चुका था। और तो और, जेल जैसे संवेदनशील जगह पर उसने निर्माण कार्य कराया था और समाहरणालय का भी टेंडर उसने प्राप्त किया था। ऐसे में इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसके बहाने उसने जेल की गतिविधियों पर भी पूरी नजर रखी हो। खैर, फरखंद अपनी सुरक्षा के लिए एक बार फिर छपरा में था। यहां रहते हुए जब उसे यह भान हो गया कि यहां की निकम्मी पुलिस उसका कुछ नहीं बिगाड़ सकती उसने बम ब्लास्ट के मास्टर माइंड को भी अपने यहां संरक्षण दिया। मास्टर माइंड तौकीर करीब दो माह तक छपरा में रहा और न तो यहां की पुलिस, और न ही यहां की सुरक्षा एजेंसी को इसकी जानकारी हुई। इन आतंकियों की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि ये जहां भी जाते सबसे पहले अपने किसी नजदीकी के माध्यम से नौकरी प्राप्त करते और फिर वहीं रहने लगते। इस प्रकार किसी को शक नहीं हो पाता। अपनी इसी नीति के तहत स्लीपर सेल का सदस्य फरखंद जमाल भी यहां ठेकेदारी का काम किया करता था और जब तौकीर यहां आया तो उसको भी उसने यहां के एक कम्प्यूटर इंस्टीच्यूट में काम दिला दिया। बाद में तौकीर की गतिविधियों से कम्प्यूटर संचालक को कुछ शक हुआ और उसने उसे नौकरी से निकाल दिया। यह जैसे तौकीर के लिए वरदान ही था। उसे लग गया कि अब उसका भांडा कभी भी फूट सकता है और वह यहां के गुप्तचरों की नजर में आ सकता है। लिहाजा उसने छपरा को अलविदा कह दिया। लेकिन इसी बीच, हैदराबाद बम ब्लास्ट के एक आरोपी की गिरफ़तारी गुजरात पुलिस करने में सफल हो गयी और साथ ही उसके साथियों का नाम उगलवाने में भी उसे सफलता हाथ लग गयी। गिरफ़तार आतंकी ने फरखंद का नाम लिया और उसका पटना स्थित ठिकाना भी पुलिस को बता दिया। फरखंद की टोह में इंटेलीजेन्स ब्यूरो के खिलाड़ी पटना में आ जमे। तहकीकात के बाद उसके फुलवारी स्थित ठिकाने का पता चला लेकिन वह वहां नहीं मिला। इसके बाद उन्होंने उसके छपरा में रहने का पता खोज निकाला और आईबी की टीम छपरा में आ जमी। लेकिन इसके पहले ही तौकीर यहां से जा चुका था। लेकिन एक आतंकी फरखंद जमाल अब भी छपरा में ही था। आईबी के गुप्तचर उसकी गतिविधियों पर नजर रखने लगे। करीब पांच दिनों बाद आईबी वालों को लगा कि अब यदि फरखंद को गिरफ़तार नहीं किया गया तो वह भी हाथ से निकल सकता था। इतने दिनों तक आईबी वालों को इंतजार था कि फरखंद के बहाने कोई बड़ी मछली भी उनके हाथ में आ जाए। लेकिन तौकीर पहले ही जा चुका था लिहाजा उसके हाथ आने का सवाल ही नहीं था। लोकल पुलिस की कार्यशैली से शायद आईबी वाले भी परिचित थे, इसलिए न तो आईबी के यहां आने का पता यहां की पुलिस को था और न ही शिकार फरखंद को। हो सकता था कि यदि इसकी जानकारी पहले यहां की पुलिस को होती तो शायद फरखंद गिरफ़तार ही ना होता क्योंकि एसपी आफिस में ही उसका साला काम करता है। आईबी ने फरखंद की गिरफ़तारी के लिए सही समय देखते हुए मुख्यालय को सूचना दे दी। जिसके बाद स्पेशल टीम रातोरात छपरा पहुंच गयी। बगैर स्थानीय पुलिस के सहयोग के फरखंद को गिरफ़तार किया। यहां की पुलिस को तो तब पता चला जब फरखंद को ट्रांजिट रिमांड पर लेने के लिए उसकी पेशी मजिस्ट्रेट के यहां हुयी। बाद में पता चला कि फरखंद कोई छोटा-मोटा प्यादा नहीं बल्कि इंडियन मुजाहिदीन का महासचिव है और बिहार समेत नेपाल के इलाकों में तबाही का इंतजाम करने की जिम्मेवारी उस पर है। खैर, आईबी की टीम फरखंद को लेकर यहां से चली गयी और छपरा की पुलिस लकीर पीट रही है। आम आदमी से अधिक यहां की पुलिस को भी कुछ पता नहीं। वह भी किसी अजनबी की तरह मीडियाकर्मियों व अन्य लोगों से सवाल करती फिर रही है- कैसे हुआ यह सब? यानी पुलिस की नाक के नीचे वह रहता रहा और आईबी ले भी गयी लेकिन वाह रे यहां की पुलिस, कुछ भी न कर सकी। आईबी वालों का सहयोग भी नहीं। छपरा की पुलिस ने बिहार पुलिस का चेहरा दिखाया है लोगों के सामने। यहां के लोग यह सोचकर ही दहल जाते हैं कि यदि आईबी की टीम यहां नहीं आती तो यहां की पुलिस के भरोसे न तो फरखंद कभी गिरफतार होता और न ही वे सुरक्षित रह पाते। कभी न कभी तो फरखंद को अपने रूप में आना ही था और उस दिन छपरा में कोई आतंकी घटना होती, पुलिस मूकदर्शक बनी रहती। हम छपरा के लोगों की तरफ से आईबी के उन जाबांज सदस्यों के शुक्रगुजार हैं जिसने इस आतंक को इस जिले के लोगों के बीच से निकाल ले गयी वरना इस पुलिस के भरोसे तो...।
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