तथाकथित जनसेवकों! अब बस भी करो




तालों का लटकना, रैली की बहार
बस को आग लगाना, मारपीट का समाचार
रेल को रोकना, आम लोगों पर प्रहार
मुबारक हो आपको भारत बंद का त्‍योहार...।
5 जुलाई की सुबह-सुबह हमें अपने एक मित्र का यह एसएमएस मिला। पहले तो हम समझ नहीं पाये, फिर याद आया कि आज एनडीए व वाम दलों का संयुक्‍त भारत बंद है। इस एसएमएस के माध्‍यम से सेंडर ने अपनी पीड़ा व्‍यक्‍त करने की कोशिश की थी। पुन: 6-7 जुलाई माकपा का चक्‍का जाम तो आज 10 जुलाई को जदयू-लोजपा का बिहार बंद। महंगाई को रोकने के बहाने हो रहे इस बंद के कारण महंगाई कितनी कम हो जाएगी यह तो हम नहीं जानते, लेकिन इतना अवश्‍य पता है कि केवल 5 जुलाई को भारत बंद के कारण 20000 करोड़ का नुकसान हुआ। केवल बिहार में ही 226.18 करोड़ के नुकसान का अनुमान है। राजनीतिक पार्टियां बंद में कुछ इस तरह बढ़-चढ़कर भाग ले रही हैं जैसे वे महंगाई का विरोध नहीं उसका उत्‍सव मना रही हों। अब यह उत्‍सव नहीं तो और क्‍या? जो हजारों करोड़ की देश को आर्थिक क्षति हो रही है वह महंगाई बढ़ा रही है या घटा रही है? महंगाई के कारण सालों में व्‍यवसायी या फिर आम उपभोक्‍ता, ग्राहक उनके परेशान नहीं हुए जितना कि कुछ दिनों के बंदी कार्यक्रम में। यह सब क्‍या है? जनता को महंगाई से निजात दिलाने का तरीका या फिर जनता को महंगाई की आग में झोकने के लिए इस आग में घी डालने का प्रयास? अपने स्‍वार्थ के लिए पार्टियां लोगों को बेवकूफ बनाने के अलावा और कुछ नहीं कर रही है। यदि सरकार पर दबाव ही बनाना है तो वह संसद में भी हो सकता है, इसके अन्‍य माध्‍यम भी हो सकते हैं, चक्‍का जाम, रेल रोकना, सरकारी और निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाना, आम लोगों को परेशान करना, क्‍या यह महंगाई रोकने का हथियार है? बंदी को किसी त्‍योहार की तरह मनाकर राजनेता क्‍या साबित करना चाहते हैं ? यदि हड़ताल और बंद से ही महंगाई रूक जानी होती तो फिर तो भारत में कभी महंगाई आती ही नहीं। क्‍योंकि यहां होली, दीवाली तो वर्ष में एक बार आते हैं लेकिन हड़ताल और बंद का उत्‍सव तो हर महीने मनाया जाता है। फिर महंगाई क्‍यों बढ़ गयी? स्‍पष्‍ट है कि हड़ताल करने और बंद कराने से कभी महंगाई दूर नहीं हो सकती। इसके लिए ठोस प्रयास करने होंगे। विपक्ष को भी और पक्ष को भी। यदि सत्‍ता पक्ष महंगाई की आग में झोककर आम आदमी को झुलसा रहा है तो ऐसे कारनामें कर विपक्ष उनका एक तरह से साथ ही देर रहा है और झुलस रही जनता को सीधे जला देने पर आमादा है। यदि सब जानते हैं कि देश में बंदी अभियान चलाकर महंगाई नहीं रोकी जा सकती तो फिर ऐसे आयोजनों का क्‍या तात्‍पर्य है? राजनीतिक पार्टियां जानते हुए बेवकूफ बन रही हैं या आम जनता को बेवकूफ बना रही हैं, जो वह सदा से करती आ रही हैं?
5 जुलाई, 6-7 जुलाई और फिर 10 जुलाई... हड़ताल, बंद, चक्‍का जाम... इन सबके दौरान हम बिहार के छपरा जिले में थे और हमने देखा कि कैसे केवल और केवल आम जनता ही परेशान हुयी। जबकि बंदी के पीछे हवाला यह दिया जा रहा है कि आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए यह सरकार पर दबाव है। लेकिन हमने देखा कि पार्टियां सरकार को नहीं आम जनता को दबाव में ला रही हैं। किसी के घर चुल्‍हे नहीं जले तो कोई मरीज दवा के अभाव में तड़पता रहा। किसी रिक्‍शे वाले को खाने को नहीं थे तो बाहर में रहकर पढ़ाई और नौकरी करने वाले कई युवा पैसा होने के बाद भोजने के लिए भटकते रहे और अंतत: उन्‍हें भूखे पेट सोना पड़ा। हमें यह देखने को कहीं नहीं मिला कि कहीं कोई कार्यकर्ता या समर्थक किसी रोगी को हास्‍पीटल पहुंचाता दिखा हो, यह भी नहीं दिखा कि किसी कार्यकर्ता ने बोझ लेकर पैदल चल रही किसी वृद्ध की मदद की हो। हां, उन्‍होंने मदद अवश्‍य की है लेकिन सिर्फ और सिर्फ महंगाई बढ़ाने में। लोगों की परेशानियां बढ़ाने में। 5 जुलाई को हमने देखा कि एक कर्तव्‍यपरायण सिपाही साइकिल से अपनी ड़यूटी पर जा रहा था लेकिन उपद्रवी बंद समर्थकों ने उसके साइकिल की हवा खोल दी। यह सोचे बगैर कि उसे अब कितनी दूर पैदल जाना होगा, और इसमें उसे कितनी परेशानी होगी। क्‍या वह एक आम आदमी नहीं है? एक मरीज महिला दर्द से बेहाल थी। अस्‍पताल तक ले जाने के लिए वाहन मालिक तैयार नहीं हो रहे थे। एक ठेला वाले ने रिस्‍क लिया और परिजन ठेले पर लादकर महिला को अस्‍पताल ले गए। इस दौरान भी उन्‍हें कई जगहों पर इन तथाकथित महंगाई रोकने वालों से सामना हुआ जो एक मरीज को रोक रहे थे। हमने पिछले 5 सालों में ना तो कभी देखा और ना ही सुना कि किसी पार्टी के कार्यकर्ता ने कूड़े चुन रहे बच्‍चों को कॉपी-किताब देकर स्‍कूल में दाखिल कराया हो। हां, राजनीतिक फायदे के लिए थोक में ऐसे काम अवश्‍य होते रहे हैं। लेकिन हमने उस दिन यह अवश्‍य देखा कि किस तरह कूड़ा चुनने वाले बच्‍चों, गंदी बस्तियों के बच्‍चों को एकत्र कर उनके हाथ में पार्टी का झंडा, डंडा देकर सड़क पर उतार दिया गया था। बच्‍चे किसी को भी देखकर हल्‍ला करते, उसे दौड़ाते और कभी-कभी डंडा भी चला देते थे। यह उन्‍हें क्‍या सिखाया जा रहा था? छपरा के विभिन्‍न विद्यालयों में इग्‍नू की परीक्षा थी। पैदल ही परीक्षार्थी कोसों दूर से केन्‍द्रों पर आ रहे थे। शादी-विवाह के दिन हैं और बिटिया की शादी के लिए कई पिता पैदल ही चक्‍कर लगाते दिखे। एक बार को उस पिता की बेबसी सोच कर देखिये जिसकी बेटी की शादी 5 को ही थी, उसी दिन जिस दिन भारत बंद का आयोजन था। एक आम आदमी का मांगलिक आयोजन इन उपद्रवियों, तथाकथित जनसेवकों के बंद आयोजन के चलते फीका पड़ गया था। हम इस दौरान यह नहीं जान सके कि इन राजनीतिक पार्टियों के बंद से किसका भला हुआ है। लेकिन कितनों का अहित हुआ इसकी कल्‍पना भी नहीं की जा सकती।
बंद और हड़ताल के माध्‍यम से आम लोगों को बेवकूफ बना उन्‍हें छलने की यह नीति राजनेताओं को त्‍यागनी ही होगी। माना कि लोकतंत्र में बंद, हड़ताल, धरना-प्रदर्शन, नारेबाजी सबकुछ जायज है। लेकिन जबरिया तो नहीं? पार्टियां और उनके कार्यकर्ता, समर्थक दावा कर रहे हैं कि बंद, हड़ताल जनता के लिए किया जा रहा है लेकिन वे इसी दौरान उसी जनता का भी विरोध करते देखे जाते हैं। किसी की साइकिल की हवा खोल देना क्‍या उसका विरोध करना नहीं, क्‍या उसकी स्‍वतंत्रता छीनना नहीं है, या फिर यह एक अपराध नहीं है? सड़कों पर बैरिकेटिंग करने का तो जैसे लाइसेंस मिल गया है। रेल रोकना तो कार्यकर्ता अपनी बहादुरी का प्रतीक समझते हैं। यदि इतना ही शौक है बंदी का, हड़ताल का तो कुछ ऐसी व्‍यवस्‍था करें ये राजनेता कि उनके एक आग्रह पर भारत बंद हो जाए और एक अनुरोध पर भारत खुल जाये। ऐसी लोकप्रियता, जनता का ऐसा विश्‍वास तो वे जीतने में सफल नहीं हो पा रहे तो अपने गुंडों, तथाकथित समर्थकों की बदौलत जनता को जबरिया अपने पक्ष में करने में लगे हैं। दुकानदारों को पीटकर दुकानें बंद करा दी जाती हैं, वाहन चालकों को पीटा जाता है और फिर शाम में पार्टी का मालिक दावा करता है कि उसका बंद सफल रहा। एक भी दुकान नहीं खुली, एक भी वाहन नहीं चला। यदि यह सब लोगों की इच्‍छा से हुआ हो तब तो? यह सब हुआ जरूर लेकिन यह तो नेताओं व उनके गुर्गों की गुंडई की बदौलत न कि उनके जनाधार के कारण। नेताओं को अपनी दोरंगी नीति से बाज आनी चाहिए और जनता को बेवकूफ बनाने से भी।

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