ऊपर वाला सब देख रहा है ...


कहते हैं मानवता की सेवा ही सबसे बड़ी सेवा है लेकिन शायद यह बात सरकारी सेवा में शामिल मुलाजिमों को कभी समझ में आई ही नहीं। हां इनमें कुछ अच्छे भी हैं लेकिन अधिकतर बुरे हैं, इस बाढ़ की तस्वीर देखने के बाद यह कहने में अब जरा भी संकोच नहीं है हमें। इस विभीषिका में जब सबसे अधिक जिम्मेदारी शासन-प्रशासन की है, तब ड्यूटी आम आदमी करता नजर आ रहा है। बाकी सब तमाशाई बने हैं। हां, सेना के जवान देवदूत बनकर आए हैं जो बाढ़ पीड़ितों का दर्द अपने हिस्से ले लिए हैं लेकिन, यदि लोकल पुलिस, लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी, प्रधान, विधायक, सांसद से लेकर तमाम अधिकारी और जन प्रतिनिधियों की बात करें तो वे इस भीषण आपदा में भी अपने उसी रवैये के साथ हैं। नेता नेतागिरी कर रहे हैं तो अधिकारी-कर्मचारी 'नौकरी' (कुछ ही अपवाद हैं)। पुलिस-पब्लिक फ्रेंडशिप पर हजारों सेमिनार, लाखों रुपए बहाए जाने के बाद भी वह अपने उसी मिजाज में नजर आ रही है, जिसके लिए वह बदनाम है। हालत यह है कि पुलिस वाले मदद तो दूर, सीधे मुंह पीड़ितों से बात तक नहीं कर रहे। सेना के वे जवान, जो कि इन लोगों के बीच कभी नहीं रहे, वे जान लड़ाकर इन लोगों की जान बचा रहे हैं लेकिन इन्हीं लोगों के बीच रहने वाली पुलिस उनकी दुश्मन हो जैसे। सेना के जवान भीे पीड़ितों की मदद ठीक से नहीं कर पा रहे क्योंकि उन्हें भौगोलिक जानकारी नहीं है और उन्हें राह दिखाने की जिन्हें ड्यूटी करनी चाहिए वह पुलिस, लेखपाल, ग्राम विकास अधिकारी आदि राहत शिविरों में बैठकर पान मसाला चबा रहे हैं, जहां हैं वहीं बेफिक्र हैं। यह हालत देखकर ऐसा लगता है मानो उन्हें कोई फर्क ही न पड़ता हो। कहना पड़ रहा है कि सिस्टम ही नहीं सड़ा है, अब तो इसमें शामिल हर शख्स सड़ चुका है। उसमें किसी के लिए संवेदना तो जैसे रही ही नहीं। वे अधिकारी-कर्मचारी जिनकी ड्यूटी बाढ़ में लगी है, वे बस दिन काट रहे हैं अपना और वेतन बना रहे हैं। उन्हें तो शायद इसी बात का अफसोस हो कि उनकी 'ऊपरी आमदनी' बंद हो गई है।

     .... लेकिन तस्वीरें और भी हैं। मानवता की जीती जागती तस्वीरें। उस आम आदमी की तस्वीरें जो आज आम आदमी के साथ खड़ा है बिना यह कहे कि अपने तो अपने होते हैं। यूनिवर्सिटी-कॉलेज के छात्र हों, व्यापारी हों, स्कूल वाले हों या फिर मजदूरी करने वाला ही कोई शख्स क्यों न हो, सभी इस दुख की घड़ी में मानवता के पुजारी बन गए हैं। आम दिनों में शोषण करने वाले निजी विद्यालय भी इस समय अर्थ का मोह त्यागकर धर्म कर रहे हैं, दुआएं बटोर रहे हैं। कम कमाने वाला आदमी भी अपने एक दिन की कमाई स्वेच्छा से दान कर दे रहा है। अपने दोस्तों पर कभी खर्च न करने वाले लड़के अपनी जेब खाली करते नहीं सोच रहे। कुछ युवा लोगों के घरों से खाना इकट्ठा कर पीड़ितों तक पहुंचा रहे हैं। गोरखपुर विश्वविद्यालय के छात्र नेताओं का क्या? उन्हें विधायक बनने का चुनाव नहीं लड़ना लेकिन वे इस समय कैम्पस छोड़कर पीड़ितों के लिए पानी मे उतर गए हैं। हां, वे नजर नहीं आ रहे जिन्हें विधायक बनना है और वे भी जिन्हें गोरखपुर ने विधायक बनाया है। बनिया की प्रकृति किसे नहीं पता? जो एक माचिस भी उधार न दे, ऐसे व्यापारी पिकअप में सामान लादकर पीड़ितों के बीच में हैं। पत्नी के बीमार पड़ने पर जिस पति ने बाहर खा लिया हो लेकिन खाना न बनाया हो, ऐसे कई व्यक्ति पीड़ितों के लिए पुड़ी बेल रहे हैं, पका रहे हैं और उन तक भोजन पहुंचा भी रहे हैं। कम वेतन का सबसे अधिक रोना रोने वाले पत्रकार तक दरियादिल बन गए हैं। समाजसेवा के नाम पर अक्सर कमाने वाली स्वयंसेवी संस्थाओं का ज़मीर भी जिंदा है और वे बढ़ चढ़कर पीड़ितों की सेवा करती नजर आ रही हैं। बस जमीर नहीं जगा है तो सिस्टम का, उसमें शामिल लोगों का जो कि इस त्रासदी के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार हैं।

     एक तरफ बाढ़ में मानवता की सेवा करते लोग हैं तो दूसरी तरफ अपनी ड्यूटी भी ठीक से नहीं करने वाले। सिस्टम को शायद यह सब नजर नहीं आए, वैसे भी वह खुद की गलती कैसे देख पाएगा? लेकिन, ईश्वर सभी को देख रहा है और कहते हैं उसकी लाठी में आवाज भी नहीं होती। बिन आवाज फैसले का इंतजार कीजिए। बाढ़ पीड़ितों को रुलाने वालों एक बाढ़ तुम्हारे हिस्से भी आएगी जिससे शायद तुम कभी न उबर पाओ। ले लो पीड़ितों की बद्दुआ, कम पड़े तो मेरी भी। पीड़ितों को तो हमारी दुआएं बचा लेंगी, उनकी बद्दुआएं लगीं तो तुम न बच पाओगे। देख लेना!

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