कौन महाराज...? किसका महाराज...?
अभी तक के जीवन में मैंने इतना असंवेदनशील मुख्यमंन्त्री नहीं देखा। संत तो रह नहीं गए महाराज, नेता भी नहीं बन पाए। जिन 30 बच्चों की मौत पर देशभर से संवेदनाएं आ रही हैं, उनके लिए प्रदेश के मुख्यमंन्त्री की चुप्पी अखर ही जाती है। आज एक घण्टा पहले मुख्यमंन्त्री का गोरखपुर की घटना के बारे में पहला ट्वीट है जिसमें उन्होंने स्वास्थ्य मंत्री को दौरा कर कार्रवाई का निर्देश दिया है लेकिन उसके बाद फिर चुप्पी। संवेदना के दो शब्द नहीं फूटे मुख्यमंन्त्री के।
योगी आदित्यनाथ जब मुख्यमंन्त्री नहीं थे तब खुद अपना ट्विटर व अन्य सोशल अकाउंट देखते थे। वेबसाइट पर लिखते थे। प्रेस रिलीज तक खुद बनाते थे। कहने का मतलब उन्हें लिखना आता है, ट्वीट करना आता है और अब तो इस काम के लिए उनके पास पूरी टीम है। फिर भी यह चुप्पी क्यों? कल से लगातार उनको संबोधित कर ट्वीट हो रहे हैं। आम आदमी छोड़िए, पत्रकार रजत शर्मा से लेकर कितने ही बड़े पत्रकारों, लेखकों, नेताओं ने योगी को कोट करते हुए गोरखपुर मामले में कार्रवाई की मांग की लेकिन किसी को कोई जवाब नहीं। मासूमों की मौत के बाद गोरखपुर चीखों से दहल रहा था और मुख्यमंन्त्री के ट्विटर पर उनकी बैठकों की डिटेल पोस्ट की जाती रही...।
आज कांग्रेस के गुलाम नबी आजाद गोरखपुर मेडिकल कॉलेज पहुंचे हैं। कह सकते हैं कि वह राजनीति करने आए हैं लेकिन गोरखपुर के महाराज न तो कल परिजनों के आंसू पोंछने आए और न आज राजनीति करने के नाम पर ही आए। जिस गोरखपुर ने एक युवा को पहले पूजनीय बनाया, गोरक्षपीठाधीश्वर माना, महाराज के रूप में पूजा और फिर सरकार भी बना दिया, आज उसी गोरखपुर के आंसू पोंछने के लिए वह मौजूद नहीं। महाराज मुख्यमंन्त्री बनने के पहले तो ऐसे नहीं थे। महाराज जाने ही जाते थे सबके सुख दुख में शामिल होने के लिए। किसी को भी कोई दुख होता वह भागता हुआ गोरखपुर मंदिर के महाराज के पास पहुंच जाता। महाराज को खबर हुई कि कोई दर्द में है तो वह खुद उसतक पहुंच जाते लेकिन आज जब गोरखपुर को महाराज की सबसे अधिक जरूरत है तब महाराज सिंहासन से चिपके पड़े हैं। महाराज तब दिलों के महाराज थे, अब कुर्सी के महाराज हैं। यही हाल रहा तो कहीं ऐसा न हो कि गोरखपुर को महाराज के बिना जीने की आदत पड़ जाए और तब एक दिन लखनऊ से लौटे महाराज से पूछ बैठे गोरखपुर- कौन महाराज? किसका महाराज? हम किसी महाराज को नहीं जानते!

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