भाग्यविधात्री देवी व ग्रहराजा को प्रणाम!
मन में स्थापित आस्था जब बाहर निकल, वातावरण में घुलती-मिलती है तो बाहरी वातावरण भी अंतर्मन के भक्तिभाव के संपर्क में आ, परम आनंद को प्राप्त करता है और इस धार्मिक माहौल में व्यक्ति तन-मन-धन के साथ स्वतः ही शामिल हो जाता है। परम आनंदित करने वाला वह वातावरण बन चुका है, माहौल में धार्मिक गीतों के माध्यम से भारतीय संस्कृति लयबद्ध हो रही है। मनुष्य के अंदर और बाहरी वातावरण में आस्था की ऐसी धारा बहाने का सामर्थ्य तो किसी धार्मिक अनुष्ठान में ही है। हां, यह लोकआस्था का महान पर्व छठ ही तो है। शुक्ल पक्ष चतुर्थी, रविवार से नहाय-खाय के रूप में इसका शुभारंभ हो चुका है।
बही धर्म की सरिता
आज से बिहार के सबसे बड़े सूर्यषष्ठी पर्व का शुभारंभ होते ही धर्म की सरिता बह चली है। अहले सुबह सरयू, गंडक, गंगा आदि नदियों के पवित्र जल में व्रतियों ने स्नान किया। इसके बाद अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सजी के रूप में प्रसाद तैयार हुआ। भारत की ग्रामीण सभ्यता-संस्कृति की पहचान कराने वाले इस महापर्व का यह प्रसाद व्रतियों ने मिट्टी के बने चूल्हे पर आम की लकड़ी से बनाया। इसके बाद व्रतियों ने परिजनों के साथ प्रसाद ग्रहण किया।
आज से बिहार के सबसे बड़े सूर्यषष्ठी पर्व का शुभारंभ होते ही धर्म की सरिता बह चली है। अहले सुबह सरयू, गंडक, गंगा आदि नदियों के पवित्र जल में व्रतियों ने स्नान किया। इसके बाद अरवा चावल, चने की दाल और कद्दू की सजी के रूप में प्रसाद तैयार हुआ। भारत की ग्रामीण सभ्यता-संस्कृति की पहचान कराने वाले इस महापर्व का यह प्रसाद व्रतियों ने मिट्टी के बने चूल्हे पर आम की लकड़ी से बनाया। इसके बाद व्रतियों ने परिजनों के साथ प्रसाद ग्रहण किया।
खरना सोम व प्रथम अर्घ्य मंगलवार को
सोमवार शुल पक्ष पंचमी से व्रतियों का महानिर्जला व्रत आरंभ होगा। व्रत, अर्थात संकल्प। सुबह में स्नान-पूजन के बाद सायंकाल में मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से रोटी व गुड़ से खीर बनेगी। जिसे षष्ठी पूजन के बाद व्रती ग्रहण करेंगी।
मंगलवार, शुक्ल पक्ष, षष्ठी को गुड़ से पकवान बना, ऋतु फलों को एकत्र कर बांस के कलसूप में लेकर व्रती तदी, तालाब तट पर पहुंचेंगे। यहां शाम में अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
बुधवार, शुक्ल पक्ष, सप्तमी। प्रातः पहर में उदीयमान सूर्य को व्रती अर्घ्य अर्पित करेंगे। इसके बाद कथाश्रवण व प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही इस महानुष्ठान का समापन होगा। इस बीच जो श्रद्धालु 'कोसी' को संकल्पित हैं, वे इस पुण्य कार्य को भी पूरा करेंगे।
सोमवार शुल पक्ष पंचमी से व्रतियों का महानिर्जला व्रत आरंभ होगा। व्रत, अर्थात संकल्प। सुबह में स्नान-पूजन के बाद सायंकाल में मिट्टी के चूल्हे पर आम की लकड़ी से रोटी व गुड़ से खीर बनेगी। जिसे षष्ठी पूजन के बाद व्रती ग्रहण करेंगी।
मंगलवार, शुक्ल पक्ष, षष्ठी को गुड़ से पकवान बना, ऋतु फलों को एकत्र कर बांस के कलसूप में लेकर व्रती तदी, तालाब तट पर पहुंचेंगे। यहां शाम में अस्ताचलगामी सूर्य को अर्घ्य दिया जाएगा।
बुधवार, शुक्ल पक्ष, सप्तमी। प्रातः पहर में उदीयमान सूर्य को व्रती अर्घ्य अर्पित करेंगे। इसके बाद कथाश्रवण व प्रसाद ग्रहण करने के साथ ही इस महानुष्ठान का समापन होगा। इस बीच जो श्रद्धालु 'कोसी' को संकल्पित हैं, वे इस पुण्य कार्य को भी पूरा करेंगे।
आइए, सूर्य को दें अर्घ्य
कर्मकांडी व ज्योतिर्विद पं. संजय पाठक उर्फ बुलाकी बाबा ने कहाकि गाय के दूध, गंगा जल से प्रकाशपुंज भगवान सूर्य को व्रती अर्घ्य अर्पित करें। शुल पक्ष की षष्ठी तिथि की सायं 5.27 बजे प्रथम अर्घ्य का मंगल समय शुरू होगा। जबकि, सप्तमी तिथि को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने का निश्चित समय है 6.21 बजे। निम्न मंत्र के साथ जीवन रक्षक भगवान सूर्य को अर्घ्य दें
'ऊं एहि सूर्य सहस्त्रांसो
तेजो राशि जगतपते
अनुकपयः माम् भत्या
गृहाण अर्घ्यम दीवाकरः॥'
अर्थात
'सहस्त्र अंश में अपनी पुण्य किरणों को धरती पर बिखेरने वाले हे सूर्य देव! मेरी भक्ति को देखते हुए मुझ पर अपनी कृपा करें और मेरे अर्घ्य को ग्रहण करें।'
कर्मकांडी व ज्योतिर्विद पं. संजय पाठक उर्फ बुलाकी बाबा ने कहाकि गाय के दूध, गंगा जल से प्रकाशपुंज भगवान सूर्य को व्रती अर्घ्य अर्पित करें। शुल पक्ष की षष्ठी तिथि की सायं 5.27 बजे प्रथम अर्घ्य का मंगल समय शुरू होगा। जबकि, सप्तमी तिथि को उदीयमान सूर्य को अर्घ्य देने का निश्चित समय है 6.21 बजे। निम्न मंत्र के साथ जीवन रक्षक भगवान सूर्य को अर्घ्य दें
'ऊं एहि सूर्य सहस्त्रांसो
तेजो राशि जगतपते
अनुकपयः माम् भत्या
गृहाण अर्घ्यम दीवाकरः॥'
अर्थात
'सहस्त्र अंश में अपनी पुण्य किरणों को धरती पर बिखेरने वाले हे सूर्य देव! मेरी भक्ति को देखते हुए मुझ पर अपनी कृपा करें और मेरे अर्घ्य को ग्रहण करें।'
मिलता स्वास्थ्य, झलकता संस्कार
छठ व्रत करने से स्वास्थ्य, सौभाग्य, आयु आदि की वृद्धि होती है, हर कामना पूरी होती है तो इस त्योहार की पद्धति से भारतीय संस्कार भी सार्वजनिक होता है। अभी शरद ऋतु की शुरूआत होने लगी है। सूर्य की तीक्ष्णता कम हो गई है और शीतल मंद हवाएं मनोहारी लग रही है। लेकिन, ऋतु बदलाव का समय व्याधियों के आमंत्रण का भी वक्त होता है। ऐसे में, ऋतु परिवर्तन के समय व्रत, सेहत के लिए अच्छा है। व्रती षष्ठी के दौरान बगैर नमक भोजन करती हैं। व्रत के बाद नमक युक्त भोजन से आतों और पाचन तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ता है। बिना नमक, यानी स्वादरहित भोजन इन्द्रिय संयम का भी प्रतीक है। वहीं, उगते सूर्य के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य देना, हमारे संस्कार को दर्शाता है। यह हमारे पूर्वजों, ढलती उम्र के लोगों व विरासत के प्रति हमारी श्रद्धा का प्रतीक है।
छठ व्रत करने से स्वास्थ्य, सौभाग्य, आयु आदि की वृद्धि होती है, हर कामना पूरी होती है तो इस त्योहार की पद्धति से भारतीय संस्कार भी सार्वजनिक होता है। अभी शरद ऋतु की शुरूआत होने लगी है। सूर्य की तीक्ष्णता कम हो गई है और शीतल मंद हवाएं मनोहारी लग रही है। लेकिन, ऋतु बदलाव का समय व्याधियों के आमंत्रण का भी वक्त होता है। ऐसे में, ऋतु परिवर्तन के समय व्रत, सेहत के लिए अच्छा है। व्रती षष्ठी के दौरान बगैर नमक भोजन करती हैं। व्रत के बाद नमक युक्त भोजन से आतों और पाचन तंत्र पर प्रतिकूल असर पड़ता है। बिना नमक, यानी स्वादरहित भोजन इन्द्रिय संयम का भी प्रतीक है। वहीं, उगते सूर्य के साथ डूबते सूर्य को अर्घ्य देना, हमारे संस्कार को दर्शाता है। यह हमारे पूर्वजों, ढलती उम्र के लोगों व विरासत के प्रति हमारी श्रद्धा का प्रतीक है।
कुंती को सूर्य ने दिया पुत्र रत्न
सूर्यषष्ठी व्रत के संबंध में ऐसी धार्मिक मान्यता है कि यह परंपरा महाभारत काल से ही चली आ रही है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को कुंती ने सूर्य की आराधना की थी और उन्हें कर्ण के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसके अलावा, और भी माहात्य पुराणों में वर्णित है। यह पर्व स्त्रियों को पूरा महत्व देता है। स्त्री शक्ति का प्रतीक है। स्त्रियां मां षष्ठी से मांगती हैं कि वे परिवार व समाज में बेहतर भूमिका निभा सकें। इस लिहाज से यह ब्रहम और शक्ति की उपासना का भी पर्व है।
सूर्यषष्ठी व्रत के संबंध में ऐसी धार्मिक मान्यता है कि यह परंपरा महाभारत काल से ही चली आ रही है। कार्तिक शुक्ल पक्ष की षष्ठी तिथि को कुंती ने सूर्य की आराधना की थी और उन्हें कर्ण के रूप में पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। इसके अलावा, और भी माहात्य पुराणों में वर्णित है। यह पर्व स्त्रियों को पूरा महत्व देता है। स्त्री शक्ति का प्रतीक है। स्त्रियां मां षष्ठी से मांगती हैं कि वे परिवार व समाज में बेहतर भूमिका निभा सकें। इस लिहाज से यह ब्रहम और शक्ति की उपासना का भी पर्व है।
शास्त्रीय मान्यता
पं. सुभाष पांडेय कहते बताते हैं, मां षष्ठी भाग्य विधात्री देवी है, अर्थात वे भाग्य गढ़ती हैं। शिशु के जन्म के छठे दिन हमारे यहां छठियार की परंपरा है। जिस दौरान मां षष्ठी की ही पूजा होती है। ऐसी शास्त्रीय मान्यता है कि जन्म के छठे दिन भाग्य लिखा जाता है। भाग्य निर्धारण में ग्रहों की भूमिका सर्वविदित है। सूर्य ग्रह मंडल का स्वामी है। सूर्य षष्ठी व्रत पर, भाग्य विधात्री देवी षष्ठी व भाग्य निर्माणकर्ता सूर्य का संयुक्त पूजन करने से जीवन पर्यत्न भाग्योदय होता है और उन्नति होती है।
(मेरी यह खबर आप पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण के आज के अंक में भी पढ़ सकते हैं।)
पं. सुभाष पांडेय कहते बताते हैं, मां षष्ठी भाग्य विधात्री देवी है, अर्थात वे भाग्य गढ़ती हैं। शिशु के जन्म के छठे दिन हमारे यहां छठियार की परंपरा है। जिस दौरान मां षष्ठी की ही पूजा होती है। ऐसी शास्त्रीय मान्यता है कि जन्म के छठे दिन भाग्य लिखा जाता है। भाग्य निर्धारण में ग्रहों की भूमिका सर्वविदित है। सूर्य ग्रह मंडल का स्वामी है। सूर्य षष्ठी व्रत पर, भाग्य विधात्री देवी षष्ठी व भाग्य निर्माणकर्ता सूर्य का संयुक्त पूजन करने से जीवन पर्यत्न भाग्योदय होता है और उन्नति होती है।
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