यह रघुवीर नारायण कौन है ?
आज यानी 30 अक्टूबर, बिहार के प्रथम भोजपुरी राष्ट्रगीत का दर्जा पा चुकी कविता बटोहिया के अमर रचयिता रघुवीर नारायण की 127वीं जयंती है, और इस साल उनकी इस रचना की 100वीं सालगिरह भी। एक दिन पूर्व रघुवीर नारायण के गृह जिले छपरा में लोगों से यह प्रश्न पूछने पर कि रघुवीर नारायण कौन हैं? जवाबी प्रश्न होता है- कौन रघुवीर नारायण? आश्चर्य, दुख से भरे मन के साथ जिलेवासियों की इस स्वार्थप्रेरित समृति पर तरस खाने को जी चाहता है। पढ़े-लिखे कहे जाने वाले लोगों से दूसरा सवाल जब अमर कृति बटोहिया के बारे में किया तो ज्यादातर जवाब रहे- बटोहिया, विदेशिया, भिखारी ठाकुर आला नू?
बटोहिया : अर्श से फर्श
1970 तक बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक कमेटी द्वारा कक्षा 10 एवं 11 वीं की प्रकाशित हिंदी पद्य संग्रह के आवरण पृष्ठ पर बटोहिया का मुद्रण अनवरत किया जाता रहा था। गीत की कीर्ति सरहद पार मारीशस, फिजी, ट्रिनिदाद, गुयाना तक थी। लेकिन, दुर्भाग्यवश अपनी बढ़ती उम्र के साथ बटोहिया की वह लोकप्रियता बढ़ने के बजाय छिनती चली गयी। भोजपुरी क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं, व्यक्तियों ने भी इस गीत को लोक कंठ में उतारने के लिए प्रयास किया। छपरा में कुमार प्रिंटर के प्रो. कुमार विनय मोहन सिंह स्मृतियों से टटोलते हैं- "1984 से 91 तक शिक्षक रामजी सिंह मुझसे इस गीत को जिल्द पर अंकित करवाते थे। अब वे नहीं हैं...।" धीरे-धीरे बटोहिया के लिए, उसी की माटी के लोगों के यह प्रयास बंद हो गए, या प्रयास करने वाले लोग नहीं रहे, फलत: इस गीत के बारे में सवाल हो रहे हैं' कौन बटोहिया ?' कौन रघुवीर?
1970 तक बिहार स्टेट टेक्स्ट बुक कमेटी द्वारा कक्षा 10 एवं 11 वीं की प्रकाशित हिंदी पद्य संग्रह के आवरण पृष्ठ पर बटोहिया का मुद्रण अनवरत किया जाता रहा था। गीत की कीर्ति सरहद पार मारीशस, फिजी, ट्रिनिदाद, गुयाना तक थी। लेकिन, दुर्भाग्यवश अपनी बढ़ती उम्र के साथ बटोहिया की वह लोकप्रियता बढ़ने के बजाय छिनती चली गयी। भोजपुरी क्षेत्र से जुड़ी संस्थाओं, व्यक्तियों ने भी इस गीत को लोक कंठ में उतारने के लिए प्रयास किया। छपरा में कुमार प्रिंटर के प्रो. कुमार विनय मोहन सिंह स्मृतियों से टटोलते हैं- "1984 से 91 तक शिक्षक रामजी सिंह मुझसे इस गीत को जिल्द पर अंकित करवाते थे। अब वे नहीं हैं...।" धीरे-धीरे बटोहिया के लिए, उसी की माटी के लोगों के यह प्रयास बंद हो गए, या प्रयास करने वाले लोग नहीं रहे, फलत: इस गीत के बारे में सवाल हो रहे हैं' कौन बटोहिया ?' कौन रघुवीर?
सुंदर सुभूमि भैया
"सुंदर सुभूमि भैया भारत के देसवा से, मोरे प्रान बसे हिम खोह रे बटोहिया...।" 1857 की क्रांति के असफल होने के बाद भारतीयों की स्वतंत्रताप्राप्ति की उम्मीद धूमिल होने लगी तो राष्ट्रकवियों ने अपनी लेखनी को हथियार बनाया। डा. राजेन्द्र प्रसाद की प्रेरणा से, अंग्रेजी कविताओं की रचना में माहिर रघुवीर नारायण के हाथों ने लेखनी उठाई और मातृभाषा भोजपुरी में अमर कृति "बटोहिया" की रचना की। राष्ट्र प्रेम और भक्ति से ओत-प्रोत कर देने वाली इस रचना की ख्याति एक ही वर्ष में 1912 में बंगलाभाषाई क्षेत्र कोलकाता की गलियों में फैल गयी। सर यदुनाथ सरकार ने रघुवीर बाबू को लिखा- "I can not think of you without remembering your BATOHIA." स्वतंत्रता संग्राम के समय यह गीत स्वतंत्रता सेनानियों का कंठहार बन चुका था। इसकी तुलना बंकिमचंद्र के "वंदेमातरम" तथा इकबाल के "सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा" से हुई। बिहार प्रवास के दौरान कई कंठों से बटोहिया का सस्वर पाठ सुन राष्ट्रपिता महात्मा गांधी बोल पड़े थे- "अरे, यह तो भोजपुरी का वंदे मातरम है!"
और अमर कवि बन गए रघुवीर
अंग्रेजी में तमाम कविताएं लिखने वाले रघुवीर नारायण भोजपुरी की एक ही कविता "बटोहिया" से अमर कवियों में शुमार हो गए। इस गीत की प्रशंसा पंडित रामावतार शर्मा, डा. राजेन्द्र प्रसाद, सर यदुनाथ सरकार, पं. ईश्वरी प्रसाद शर्मा, भवानी दयाल संयासी, आचार्य शिवपूजन सहाय, डा. उदय नारायण तिवारी सहित तत्कालीन सभी राष्ट्रकवियों ने की। सन 1905 में रघुवीर बाबू ने "A tale of Bihar" की रचना की। इंग्लैंड के राष्ट्रकवि अल्फ्रेड आस्टीन ने सन 1906 में पत्र लिखा और उनकी तुलना अंग्रेजी कवियों से की।
पत्रिका लक्ष्मी के अगस्त 1916 के अंक में महनीय कवि शिवपूजन सहाय ने लिखा था- "बटोहिया कविता का प्रचार बिहार के घर-घर में है। शहर और देहात के अनपढ़ लड़के इसे गली-गली में गाते फिरते हैं, पढ़े-लिखों का कहना ही क्या है। यदि एक ही गीत लिखकर बाबू रघुवीर नारायण अपनी प्रतिभाशालिनी लेखनी को रख देते तो भी उनका नाम अजर और अमर बना रहता।"
"भारत भवानी" ने भी दिलाई ख्याति
रघुवीर बाबू की दूसरी सबसे चर्चित कविता "भारत भवानी" है। यह 16 सितंबर 1917 ई. को पाटलिपुत्र पत्र में छपी थी। हालांकि इसकी रचना सन 1912 ई. में ही हो चुकी थी और उस वर्ष अखिल भारतीय कांग्रेस समिति के पटना अधिवेशन में वंदेमातरम की जगह भारत भवानी का ही पाठ हुआ था। बाबू रघुवीर नारायण के नाम तथा कृतियों का उल्लेख आचार्य नलिन विलोचन शर्मा ने "प्रोग्रेस आफ बिहार भ्रू द एजेज" में किया है। इसके पूर्व बंगला साहित्येतिहास में नरेन्द्र नाथ सोम ने अपनी पुस्तक "मधुस्मृति" में उनकी कृतियों का मूल्यांकन कर बिहारवासियों को चौंका दिया था।
राष्ट्रकवि रघुवीर नारायण
जन्म- 30 अक्टूबर 1884
जन्मस्थान- दहियावां, छपरा
पिता- जगदेव नारायण
व्यक्तित्व- सिर पर गोल टोपी, आंखों पर निक्कल फ्रेम का चश्मा, उन्नत ललाट पर उभरी रेखाएं, मुखमंडल से फूटता तेज, घुटनों के नीचे पहुंची धोती या कभी चूड़ीदार पायजामा भी। प्रतिभाशाली, मृदुभाषी, राष्ट्रवादी।
शिक्षा- विद्यालयी शिक्षा जिला स्कूल छपरा, पटना कालेज से अंग्रेजी प्रतिष्ठा के साथ स्नातक।
1940 के बाद पूर्ण संयासी जीवन
मृत्यु- 1 जनवरी 1955
हिंदी में रचित पुस्तकें- रघुवीर पत्र-पुष्प तथा रघुवीर रसरंग। रंभा खंडकाव्य अप्रकाशित।
सम्मान- बिहार राष्ट्रभाषा परिषद द्वारा सम्मानित
(आज, पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण के छपरा संस्करण में यह आलेख पृष्ठ 4 पर लीड है।)

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