चेतिए___ वरना कहीं कथाओं और फिल्मों तक ही न रह जाए बैलों के घुंघरू की आवाज


कथा सम्राट मुंशी प्रेम चंद की- दो बैलों की कथा, यदि आने वाली पीढि़यां पढे़गी तो उसे भारतीय परंपरा-संस्कृति और भारतीय ग्रामीण परिवेश की पूरी जानकारी स्वतः मिल जाएगी। इसी तरह यदि निर्माता-नायक मनोज कुमार की सुपर हिट फिल्म उपकार देखें तो भी हमें अपने पूर्वजों के बारे में, खेत-खलिहान की पुरानी व्यवस्था के बारे में जानकारी तो मिलेंगी ही, हमारे सामने पूरी ग्रामीण व्यवस्था जीवंत हो उठेगी! फिल्म का एक गाना- 
मेरे देश की धरती सोने उगले, उगले हीरे मोती,
मेरे देश की धरती
बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं..
..
भारतीय सभ्यता-संस्कृति की पूरी कहानी ही है। तभी तो 15 अगस्त और 26 जनवरी जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर इस गाने के बगैर इस मौके पर आयोजित सांस्कृतिक कार्यक्रम कभी पूरे नहीं हो पाते।
दरअसल, भारतीय किसानों के साथ-साथ उनके बैलों का जिक्र किए बगैर हमारी सभ्यता-संस्कृति पूरी ही नहीं हो सकती। यह बताता है कि बैल सिर्फ पशु नहीं, बल्कि हमारे दैनिक जीवन में, हमारी दैनिक क्रियाओं में हमारा साथ देने वाले हमारे साथी भी हैं!
लेकिन, भारतीय सभ्यता-संस्कृति की प्रायः पहचान बन चुके इन बैलों के घुंघरू की आवाज अब धीरे-धीरे लुप्त हो रही है। दिन-प्रतिदिन खेती में बढ़ते यंत्रों के प्रयोग के साथ ही, पीढि़यों से हमारी खेती-गृहस्थी का बोझ उठा रहे इन बैलों की अनदेखी होने लगी है और अब इन पर पशु तस्करों की नजर है। इस दिशा में प्रशासनिक आंखें बंद होने के चलते यह संकट अब धीरे-धीरे वृहद रूप लेता जा रहा है।
पिछले दिनों बिहार के सारण आधे दर्जन ट्रकों में ठूंस कर तस्करी के लिए ले जाए जा रहे बैलों को ग्रामीणों ने मुक्त कराया। इन ट्रकों में इन निरीह पशुओं के साथ ही इनकी जान के सौदागर तस्कर भी पकड़े गए। इन तस्करों की गिरफ्तारी के बाद इस सच से सबका सामना हुआ कि किस तरह प्रदेश-दर-प्रदेश की सीमाओं को लांघते हुए ये बैल अंततः बंग्लादेश तक पहुंच रहे हैं। सूत्र बताते हैं कि निरीह पशुओं की इस तस्करी में संबंधित प्रदेश की सीमा पुलिस तो शामिल है ही, बंग्लादेश तक पहुंचने के क्रम में संबंधित रूट पर पडने वाले हर थाने को बंधी-बंधाई रकम पहुंचती है। यह बात इससे भी साफ हो जाती है कि रोज दर्जनों ट्रक पशु सूबे से बाहर पहुंच रहे हैं लेकिन पुलिस इन ट्रकों को नहीं पकड़ पाती। सारण में भी जब गत महीने इन ट्रकों को जब्त किया गया तो इन्हें पकड़ने वाले आम ग्रामीण थे, न कि पुलिस। सूत्रों के अनुसार, इन निरीह पशुओं की तस्करी में एक बड़ा नेटवर्क काम कर रहा है। इसमें गांव के छोटे पशु दलालों से लेकर बड़ी पहुंच वाले दलाल तक शामिल हैं। राज्य के अलावा समीपवर्ती उत्तर-प्रदेश से ऐसे पशुओं की तस्करी काफी संख्या में हो रही है। तस्करी की यह कहानी शुरू होती है गांवों के ही दलालों से। सबसे पहले गांव के छोटे दलाल बीमार, कमजोर बैलों को खरीदते हैं। कभी-कभी गांव के किसानों के सामने जब आर्थिक संकट होता है, तो उन पर पैनी नजर गड़ाए दलाल उनके पास पहुंचते हैं और अच्छे बैलों की भी बोली लगा बैठते हैं। पशुपालक-किसान समझते हैं कि खरीददार उन बैलों से खेती का काम करेगा और वे उन्हें अपने बैलों को सौंप देते हैं। इसके बाद गांव के ये दलाल अपने क्षेत्र के बड़े दलाल से संपर्क साधते हैं। बैलों के मांस, वजन और स्वास्थ्य के अनुसार उनकी बोली लगती है और फिर एडवांस भुगतान हो जाता है। नियत समय पर ये छोटे दलाल इन बैलों को लेकर निर्धारित स्थान पहुंचते हैं और फिर इन्हें ट्रकों में लाद दिया जाता है। ऐसे ही प्रतिदिन कुछ गांवों के दलालों के सहयोग से दर्जनों ट्रक भरते हैं और फिर इन्हें बाजार तक पहुंचाया जाता है। बैलों को ट्रक पर लाद देने के बाद इन दलालों का काम समाप्त हो जाता है और फिर इन्हें बाजार तक पहुंचाने का काम तस्करों का दूसरा गिरोह संभालता है। सूत्र बताते हैं कि फिलवक्त उत्तर-प्रदेश के गाजियाबाद जनपद से पशुओं की सबसे अधिक तस्करी हो रही है। जैसे ही संबंधित क्षेत्र से ट्रक निकलता है, उस क्षेत्र के बड़े दलाल वहां की सीमा पुलिस चैकी पहुंच जाते हैं और उनकी मौजूदगी में उनके ट्रक गुजरते रहते हैं। सभी ट्रकों के गुजरने के बाद संबंधित थाने को उसकी फी दी जाती है और दलाल रूट के अगले दलाल को खबर कर देता है कि गाड़ी चल दी है। इसी तरह सीमा दर सीमा पुलिस को नौकरी के साथ धोखा करने की उसकी फी अदा होती रहती है और ट्रक एक जिला से दूसरे जिला, एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश की सीमाओं को लांघते हुए बार्डर तक पहुंच जाते हैं। कभी-कभी जब स्थानीय लोग चैकन्ने हो जाते हैं और तक्करी के दौरान ट्रकों के ग्रामीणों द्वारा पकड़े जाने का खतरा होता है तो रूट भी बदल दिए जाते हैं। बताते हैं कि ग्रामीणों द्वारा इन ट्रकों को पकड़ना भी उनके स्वार्थ का एक हिस्सा होता है, न कि मानवीय कर्म। गत दिनों जब पशुओं से भरे ट्रक ग्रामीणों द्वारा पकडे़ गए थे तब इनके पकड़े जाने से पहले चैक-चैराहों पर खडे़ कुछ लोगों से ट्रक में सवार पशु तस्करों की बहस हुई थी। सूत्र बताते हैं कि जब ट्रक ने यूपी की सीमा पार कर सारण जिले के मांझी थाना क्षेत्र में प्रवेश किया तो स्थानीय रंगदारों ने उसे रोका। कुछ लोगों ने इनसे पैसे की मांग की और जब तस्करों ने इनकार किया तो हल्ला कर ग्रामीणों को जमा कर स्वार्थी तत्वों ने इन ट्रकों को पकड़वा अनमने से अपने सामाजिक दायित्व का निर्वहन कर लिया। ग्रामीणों की पकड़ में भी तस्करी के ये ट्रक आमतौर पर तभी पकड़े जाते हैं जब इन तस्करों द्वारा उनकी मांग पूरी नहीं हो पाती। हालांकि बहुत कम ही होता है कि पशु तस्कर अपने कार्यों में असफल हों। इतना ही नहीं, यदि पुलिस मैनेजिंग में दलालों को कोई दिक्कत होती है तो उक्त सीमा के पहले ही सारे ट्रक रोक दिए जाते हैं और फिर वहां के कुछ प्रभाव वाले तस्करों, दलालों की मदद से सुनियोजित तरीके से पशु मेलाओं का आयोजन किया जाता है और इन बैलों को उनके ही लोग खरीदकर सीमा पार कराते हैं। हालांकि इसमें दलालों को अधिक आर्थिक कीमत चुकानी पड़ जाती हैं लेकिन उनका धंधा नहीं रूकता और वे पुनः सीमा से आगे बढ. बैलों को ट्रक में लाद निकल जाते हैं। सूत्रों के अनुसार बार्डर इलाके के आस-पास के गांवों में भी इन पशु तस्करों की अच्छी पकड़ है। बार्डर पर रहने वाले स्थानीय तस्करों, दलालों की मदद से ये पशु देश की सीमा लांघ बंग्लादेश की सीमा में प्रवेश करा दिए जाते हैं जहां उनका मनमाना उपयोग होता है। तस्करी के इस कारोबार में पुलिस के साथ-साथ अन्य विभागों की भी मिलीभगत होती है और इनके सहयोग से पशु क्रूरता अधिनियम की धज्जियां उड़ती हैं। वैसे तो एक ट्रक में ठूंसकर भी 5 बैल से अधिक नहीं आ सकते, लेकिन तस्करी के दौरान पकड़े गए ट्रकों से, हर एक ट्रक से दर्जनों बैल निकाले गए। आदमियत की सारी पहचान मिटाकर सामान की तरह ठूंस दिए गए बैलों में कई मर चुके थे। यह बताता है कि इससे जुड़े लोग किस हद तक स्वार्थी होते हैं और उनके इरादे व कृत्य किस हद तक अमानवीय होते हैं।
तस्करी की बढ़ती इन गतिविधियों पर अंकुश लगाने के लिए आवश्यक है कि किसान स्वयं चैकन्ने हों। अपने पशुओं की बिक्री के पूर्व क्रेता के बारे में पूरी जानकारी एकत्र कर लें और सही हाथों में ही अपने प्रिय पशुओं के लगाम सौंपें। कहीं ऐसा न हो कि आने वाले दिनों में बैलों के घूंघरू हमारे मन-मस्तिष्क में तो गूंजे, लेकिन उनकी आवाज हमारे कानों तक नहीं पहुंच पाए!

(यह आलेख, पटना से छपने वाली हिंदी मासिक पत्रिका "स्‍वत्‍व" के अक्‍टूबर अंक में प्रकाशित हुआ है।)

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