जियहु हो मोरे भइया, जिय भइया


साफ-सुथरी धरती, गोबर से लिपी हुई। गोबर से ही घेरकर निर्मित मंडप। इस मंडप के अंदर गोबर के बने गोव‌र्द्धन। किशोरियां, युवतियां व सुहागिनें हाथों में मूसल लिए उन्हें जगा (कूट) रही हैं-
'उठहु देव.. सुतल भइले छह मास, रउरा बिनु ए देव बाड़ी ना बिइही, बिअहल सासु ना जाए..।'
(हे देव उठो! आपके सोए हुए छह माह बीत गए। आपके आशीर्वाद के बिना बेटी बिन ब्याही है, और ब्याहता बूढ़ी हो रही है, गवना नहीं हो रहा..।)
गोधन (गोव‌र्द्धन) कूट (जगा) रही अस्मिता कहती हैं, इससे वह जल्दी ही परिणय-सूत्र में बंध जाएगी। उसे उसकी अम्मा ने ऐसा बताया है। नवविवाहिता सुहाना भी उसके साथ है। हंसकर बोली- 'गोधन बाबा उठेंगे तो गवना जल्दी होगा।'
छपरा शहर के दहियावां टोले में एक परिसर में बने शुक्रवार की सुबह 'गोव‌र्द्धन पर्वत' पर जमा बहनें कांट छूकर अपने भाईयों को शाप दे रही हैं- 'भैया मर जास भउजी रांड हो जास..।' हम आश्चर्यचकित हैं उनकी शाप-शब्द सुनकर! तभी, वे जैसे हमें खारिज करती हैं, बहनें कांटे से जीभ सटाते हुए अपना शाप तो टालती ही हैं, भाईयों के लिए मंगल कामना करती हैं- 'जेके जेके शरपनी वोके-वोके मिले हनुमंते के बल..'। युवतियां अपने भाई के लिए श्रीहनुमान जैसा बल मांग रही हैं। और भी आशीष- 'भईया के बाढ़े सिर पगिया भउजी के माथे बाढ़े सेनुर हो ना..', 'गोधन भईया चलले अहेरिया..', 'जियहु हो मोरे भईया, जिय भईया लाख बरिस हो ना..।'
श्वेता बताती है, प्रसाद के रूप में बजड़ी ले जाकर भाई को खिलाएंगी, इससे वे बज्जर (बज्र के समान) होंगे। किशोर, युवा यहां लगे बरियार का झुंड उखाड़कर अपना बल आजमाते हैं।
इस तरह भैया दूज व गोव‌र्द्धन पूजा एक-दूसरे में समाहित हो जाता है और अपने लिए मंगल-परिणय व भाईयों के लिए बल लेकर घर की युवतियां, महिलाएं वापस होती हैं।
इधर, लेखनी के देवता चित्रगुप्त भगवान के प्रति भी आस्था का ज्वार फूट रहा है। शहर सहित ग्रामीण क्षेत्रों में जगह-जगह लेखनी के देवता पूजित हो रहे हैं। खासकर, कायस्थ समाज द्वारा इस पूजा को भव्य समारोह का रूप दिया गया है। शहर से लेकर गांव तक भैया दूज, गोव‌र्द्धन व चित्रगुप्त पूजा की त्रिवेणी बह रही है और श्रद्धालु इसमें डूब-उतरा रहे हैं।
इस संबंध में पं. डा. सुभाष पांडेय कहते हैं कि कार्तिक शुक्ल द्वितीय को यह तीनों पर्व मनाए जाते हैं। वे भैया दूज की मान्यता का वर्णन करते हैं, इस दिन यमराज अपनी बहन यमुना के घर गए तो उन्होंने उनका खूब स्वागत किया और गदगद यमराज ने कुछ मांगने को कहा। यमुना ने कहा कि ऐसा हो जाए कि जो भी व्यक्ति मेरे पुण्य जल में स्नान करे वह आपके लोक न जाए। यमराज चिंता में पड़ गए और बीच का रास्ता निकालते हुए आशीर्वाद दिया कि जो भाई इस दिन अपनी बहन के घर का अन्न खाएंगे उनकी उम्र बढ़ जाएगी। बस, तभी से बहनें अपने भाईयों को बजड़ी खिलाती हैं और उनकी आयु व बल की कामना करती हैं।
गोव‌र्द्धन पूजा की मान्यता का बखान करते हुए पं. श्री पांडेय कहते हैं, सर्व सर्वेश्वर भगवान श्रीकृष्ण ने इन्द्र का मान भंग कर गोव‌र्द्धन को अंगुली पर धारण किया। भगवान ने ग्वालों को बताया कि गोव‌र्द्धन पर्वत ही हमारे लिए भगवान है क्योंकि उनसे हमें फल और हमारी गायों को चारा मिलता है। श्रीकृष्ण ने सभी वस्तुओं में ईश्वर की उपस्थिति का ज्ञान गोव‌र्द्धन के माध्यम से कराया।
चित्रगुप्त पूजा की कहानी कुछ यूं बताई, भगवान चित्रगुप्त की मुख्य भूमिका कर्मो के संकलन तथा फलों के निष्पादन की ही है। ब्रह्माजी के काया से प्रकट भगवान चित्रगुप्त की पूजा करने वाला कभी दरिद्र नहीं होता। कलम ही भगवान चित्रगुप्त का हथियार है। जीवन में प्रतिदिन होने वाले आय-व्यय और बचत का ब्यौरा जब हम भगवान चित्रगुप्त के पास समर्पित करते हैं तब हम उनकी कृपा का अधिकारी बन जाते हैं। प्राचीन परंपरा के अनुसार यह कायस्थ जाति की विशेष पूजा पद्धति रही है।
(आज यानी 29 अक्‍टूबर 2011 को पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण्‍ा के छपरा संस्‍करण में पृष्‍ठ संख्‍या 3 की यह लीड खबर है। )

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