अयोध्या के बहाने...
राजनीति से बुरी कोई चीज नहीं होती। चाणक्य ने राजनीति की जो परिभाषा दी है वह अब पुरानी हो चली है। नई परिभाषा तो बस कुछ ऐसी है जैसे कि राजनीति कोई गाली हो। लोग बोलचाल की भाषा में बोल ही पड़ते हैं- अब राजनीति मत करने लगो। मतलब साफ है कि राजनीति से आशय लोग हमेशा बुरी चीज का ही लगाते हैं। लगाएं भी क्यों नहीं, यह राजनीति बुरी बला है ही। तभी तो न्याय प्रणाली में भी राजनीति अपनी दस्तक देने से नहीं चुकती, राजनेता अपनी चाल चलने से बाज नहीं आते। पिछले 60 सालों से एक मुकदमा चला आ रहा है। तारीखें दर तारीखें मुकदमा किसी तरह जब फैसले के नजदीक पहुंचा तो फिर राजनीति का शिकार हो गया। न्यायालय पर पहले से ही मुकदमों का बोझ है। इतना ही नहीं, लोग भी बेसब्री से फैसले के इंतजार में हैं। ऐसी घडी में फैसले को लटकाकर रखना कहां जायज है। लेकिन फैसले में देर करने के पीछे राजनीतिक मंशा साफ झलक जाती है।
जब पहली बार हाईकोर्ट अयोध्या मसले पर फैसला सुनाने जा रहा था तो उस समय इतनी तनाव की स्थिति नहीं थी। लोग आसानी से फैसले सुनने का इंतजार कर रहे थे। साथ ही हिंदू व मुसलमान दोनों ही न्याय पर भरोसा कर फैसला मानने के लिए मन बना चुके थे। लेकिन ऐन वक्त पर फैसले में रोड़ा लगाकर एक नया माहौल बनाने की कोशिश की गयी। शांत से इलाकों में फलैग मार्च कराये जाने लगे। पुलिस फोर्स की तैनाती कर दी गयी। उन लोगों से बेवजह शांति की अपील की जाने लगी, जो पहले से ही शांति के पक्ष में थे। यह सब कर एक तरह से लोगों को उकसाने की भरसक कोशिश की गयी। हुआ वही जो राजनेता चाहते थे। अब स्थिति पहले की अपेक्षा काफी तनावपूर्ण है। लोग रोज अखबारों के पन्ने पलट रहे हैं, ताबड़तोड़ न्यूज चैनल बदल रहे हैं। कहीं कोई नई खबर मिल जाये। हिंदू हो या मुसलमान, पूरी तरह सशंकित हो चले हैं। अभी बिहार में चुनाव का समय है लेकिन लोग चर्चा अयोध्या मसले पर अधिक कर रहे हैं। इन सबका क्या मतलब है। सोची-समझी रणनीति के तहत एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया गया कि इसे भुनाया जा सके। पहली बार जो तिथि निर्धारित हुयी थी, उसी तिथि को यदि फैसला सुना दिया जाता तो ऐसी स्थिति शायद नहीं बनती। लेकिन, फैसले में रोड़ा लगाकर इसे लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। बेवजह लोगों की शांति की अपीलें दुहरायी जा रही है। जैसे लोगों ने दंगा कर दिया हो और वे मान नहीं रहे हों। एक तरह से लगातार भड़काउ बयानों के माध्यम से राजनेताओं द्वारा एक बार फिर पिछले वाले अयोध्या का इतिहास दोहराने की यह नाकाम कोशिश की जा रही है। मीडिया वाले भी इस मुद़दे को काफी उछाल रहे हैं। रोज अखबारों के प्रथम पेज की प्रथम खबर अयोध्या फैसले से जुड़ी मिल रही है। जबकि चैनल वालों ने तो हद ही कर दी है। लेकिन, हम सलाम करते हैं देश के हिंदू मुसलमानों को जो राजनीति के इस कुचक्र में न पड़ शांति बनाए हुए हैं। वरना, राजनीति ने तो अपना हर रंग इस मसले में दिखाया है। एक खबर तो यह भी कहती है कि जिस रिटायर आईएएस ने हाईकोर्ट को फैसला टालने की अपील की, वह कांग्रेस का एक मोहरा था। भला कांग्रेस को फैसला टालने से क्या फायदा हो सकता है। हां, हो भी सकता है। यदि फैसला आने से भाजपा को कुछ फायदा हो सकता है तो फैसला टलने से कांग्रेस को फायदा क्यों नहीं हो सकता। फिलवक्त जनता को चाहिए कि इन भ्रमजाल में न पड़ अपनी चेतना से काम करे।
जब पहली बार हाईकोर्ट अयोध्या मसले पर फैसला सुनाने जा रहा था तो उस समय इतनी तनाव की स्थिति नहीं थी। लोग आसानी से फैसले सुनने का इंतजार कर रहे थे। साथ ही हिंदू व मुसलमान दोनों ही न्याय पर भरोसा कर फैसला मानने के लिए मन बना चुके थे। लेकिन ऐन वक्त पर फैसले में रोड़ा लगाकर एक नया माहौल बनाने की कोशिश की गयी। शांत से इलाकों में फलैग मार्च कराये जाने लगे। पुलिस फोर्स की तैनाती कर दी गयी। उन लोगों से बेवजह शांति की अपील की जाने लगी, जो पहले से ही शांति के पक्ष में थे। यह सब कर एक तरह से लोगों को उकसाने की भरसक कोशिश की गयी। हुआ वही जो राजनेता चाहते थे। अब स्थिति पहले की अपेक्षा काफी तनावपूर्ण है। लोग रोज अखबारों के पन्ने पलट रहे हैं, ताबड़तोड़ न्यूज चैनल बदल रहे हैं। कहीं कोई नई खबर मिल जाये। हिंदू हो या मुसलमान, पूरी तरह सशंकित हो चले हैं। अभी बिहार में चुनाव का समय है लेकिन लोग चर्चा अयोध्या मसले पर अधिक कर रहे हैं। इन सबका क्या मतलब है। सोची-समझी रणनीति के तहत एक ऐसा माहौल तैयार कर दिया गया कि इसे भुनाया जा सके। पहली बार जो तिथि निर्धारित हुयी थी, उसी तिथि को यदि फैसला सुना दिया जाता तो ऐसी स्थिति शायद नहीं बनती। लेकिन, फैसले में रोड़ा लगाकर इसे लगातार आगे बढ़ाया जा रहा है। बेवजह लोगों की शांति की अपीलें दुहरायी जा रही है। जैसे लोगों ने दंगा कर दिया हो और वे मान नहीं रहे हों। एक तरह से लगातार भड़काउ बयानों के माध्यम से राजनेताओं द्वारा एक बार फिर पिछले वाले अयोध्या का इतिहास दोहराने की यह नाकाम कोशिश की जा रही है। मीडिया वाले भी इस मुद़दे को काफी उछाल रहे हैं। रोज अखबारों के प्रथम पेज की प्रथम खबर अयोध्या फैसले से जुड़ी मिल रही है। जबकि चैनल वालों ने तो हद ही कर दी है। लेकिन, हम सलाम करते हैं देश के हिंदू मुसलमानों को जो राजनीति के इस कुचक्र में न पड़ शांति बनाए हुए हैं। वरना, राजनीति ने तो अपना हर रंग इस मसले में दिखाया है। एक खबर तो यह भी कहती है कि जिस रिटायर आईएएस ने हाईकोर्ट को फैसला टालने की अपील की, वह कांग्रेस का एक मोहरा था। भला कांग्रेस को फैसला टालने से क्या फायदा हो सकता है। हां, हो भी सकता है। यदि फैसला आने से भाजपा को कुछ फायदा हो सकता है तो फैसला टलने से कांग्रेस को फायदा क्यों नहीं हो सकता। फिलवक्त जनता को चाहिए कि इन भ्रमजाल में न पड़ अपनी चेतना से काम करे।
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