मैं आजकल मुम्बई और दिल्ली से अधिक तरक्की बिहार की सूनता हूं। बड़ा आश्चर्य होता है। हो भी क्यों नहीं, मैं बिहार में पिछले छह सालों से हूं लेकिन यह अनुभूति मुझे उतनी तेजी से नहीं हो रही जितनी तेजी से इस प्रदेश से बाहर रह रहे लोगों को हो रही है। जब भी अपने गृह प्रदेश- उत्तर प्रदेश स्थित अपने गृह जिले कुशीनगर के अपने छोटे से गांव- नरहवॉडीह में प्रवेश करता हूं, पहुंचते-पहुंचते बिहार की प्रशंसा सुनने को मिलती है। कोई कहता है कि आजकल तो उधर रोजगार की बाढ़ है, शिक्षक नियोजन में लाखों लोगों को शिक्षक के रूप में रोजगार मिल गया है। किसी की जुबान होती है कि बिहार अब उत्तर प्रदेश से भी अच्छा हो गया है। इस तरह की अनेक प्रशंसा जो मेरे दिल पर चोट करती प्रतीत होती हैं। इस चोट की वजह यह है कि बिहार के जिस हिस्से में मैं अभी हूं, वह बिहार के सर्वाधिक पुराने जिलों में से एक है। छपरा कई मायनों में बिहार का बेहतर जिला माना जाता है। यह देश का कितना पुराना जिला है, यह मात्र इसी बात से समझा जा सकता है कि अब तक इस बारे में खुद सरकार भी नहीं जानती। बताते हैं कि छपरा बंगाल, बिहार आदि राज्य एक साथ थे तब भी छपरा (सारण) जिला हुआ करता था। सारण का गजेटियर भी इसकी स्थापना का काल नहीं बता पाता। इस जिले के बारे में यह बेहद आश्चर्यजनक तथ्य है कि जिला प्रशासन इसलिए इसका स्थापना दिवस नहीं मना पाता क्योंकि उसे पता ही नहीं कि सारण जिले की स्थापना कब हुई। दूसरी खास बात छपरा के बारे में यह है कि यह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री व पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद का संसदीय क्षेत्र है। अभी भी श्री प्रसाद ही इस क्षेत्र के सांसद है। छपरा को ख्याति देने वाले और भी कई कारण हैं। यानी कि कुल मिलाकर बिहार में छपरा अपना विशेष स्थान रखता है लेकिन यहां की जो हालत है उसे देखकर मैं यकीन नहीं कर सकता कि बिहार वाकई बदल गया है। मैं तो यह भी बड़ी मुश्किल से यकीन कर पाता हूं कि बिहार बदल रहा है। लोग तो पूरी तरह बदल जाने की बात करते हैं मैं इस बदलाव की प्रक्रियागत होने की बात से भी पूरी तरह सहमत नहीं हो पाता। हां, रोज अखबारों और टीवी पर आ रही खबरें जरूरत मेरी सोच को थोड़ी देर के लिए भटकने पर विवश करती हैं। बिहार के बारे में कुछ कड़वी सच्चाईयां बताना चाहता हूं। जिस शिक्षक नियोजन के चलते बिहार की ख्याति बढ़ गयी है और सरकार शिक्षकों को रोजगार देकर वाहवाही लूट रही है उसकी सच्चाई यह है कि एक-एक अभ्यर्थी से इस पद के लिए 80-80 हजार रुपये तक लिए गए हैं। इस बाबत मैंने एक खबर भी लिखी थी। छपरा जिले के रिविलगंज प्रखंड के सिताबदियारा पंचायत में एक ऐसी महिला अथ्यर्थी को शिक्षक बना दिया गया जिसका नाम मेधा सूची में कई अभ्यर्थियों से नीचे था। जिन अभ्यर्थियों का नाम मेधा सूची में ऊपर दिया गया था, उनका नियोजन मात्र इसलिए नहीं किया गया था क्योंकि उन्हें रिश्वत का चढ़ावा नहीं दिया था। और मेधा सूची में सबसे नीचे नाम होने के बावजूद मात्र इसलिए उस महिला अभ्यर्थी का नियोजन कर लिया क्योंकि उसने नियोजन में लगे अधिकारियों की जेब गर्म कर दी थी। हालांकि, खबर प्रकाशित होने के बाद उस महिला शिक्षक ने खुद ही अपनी गलती स्वीकार करते हुए इस्तीफा दे दिया था। यह तो बिहार में हो रही शिक्षक नियोजन में भ्रष्टाचार का एक नमूना मात्र है। मैं सिर्फ एक ही उदाहरण इसलिए प्रस्तुत कर पा रहा हूं कि इसका साक्ष्य अखबार के रूप में मेरे पास है। लेकिन जितना मैं जानता हूं, यदि उस आधार पर कहूं तो एक भी ऐसा अभ्यर्थी नहीं जिसने बिना चढ़ावा दिये नौकरी पा ली हो। इस चढ़ावा का ही असर था कि दक्षता परीक्षा में कुछ ही शिक्षक फेल हो पाए थे। यह संभवत: ऐसा पहला मामला होगा जिसमें शिक्षक जैसे महत्वपूर्ण पद की बहाली के लिए साक्षात्कार नहीं लिया गया। सभी जानते हैं कि बिहार की शिक्षा व्यवस्था कैसी है और यहां उत्तीर्णता की सच्चाई क्या है! वैसे बिहार में मार्क्स को आधार बनाकर लोगों को शिक्षक बना दिया गया? खैर, भ्रष्टाचार के अनेक उदाहरण हैं। एसी-डीसी बिल के मार्फत हाईकोर्ट भी सरकार को लताड़ चुकी है, ऐसे में मुझे अधिक कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है। अब आता हूं सरकार के उस काम पर, जिसका जिक्र कर वह बार-बार वाहवाही लूट रहा है। सड़कों को बिहार के विकास का पैमाना बताया जा रहा है। मुख्य मार्गों को ठीक कर सरकार अपनी पीठ खुद ही थपथपा रही है। बाहर से आने वाले लोग भी इन्हीं मार्गों तक सिमट कर रह जाते हैं और समझते हैं कि बिहार की सारी सड़कें बन गयी हैं। बाहर के लोगों को हुयी गलतफहमी का भी एक उदाहरण देना चाहूंगा। एनडीटीवी के एक पत्रकार जो कि ब्लॉग लेखन में काफी चर्चित हैं, उन्होंने इस पखबारे में अपनी बिहार यात्रा की फोटो ब्लॉग पर डाली है। इन तस्वीरों के माध्यम से उन्हें दिखाया है कि बिहार कितना बदल गया है। कई कमेंट़स भी आए हैं जिनमें लोग बिहार के इस विकास पर वाह-वाह करते दिखे हैं। लेकिन, उक्त महोदय की इन तस्वीरों में पटना जैसे महानगर की तस्वीरें शामिल हैं, किसी गांव की कोई तस्वीर नजर नहीं आयी। जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में हुआ विकास ही पैमाना माना जाएगा, शहर की सड़कें पहले भी बहुत खराब नहीं थी। वह चाहे लालू प्रसाद का शासन काल रहा हो, या फिर राबड़ी का या जगन्नाथ मिश्र या फिर किसी भी और का- पटना की सड़कें कभी भी इतनी खराब नहीं थी जिसके लिए बिहार की निंदा की जाए। हां, जलजमाव वहां की समस्या रही है, लेकिन यह अब भी है। जिन सड़कों को चमकाकर नीतीश कुमार अपनी राजनीति चमका रहे हैं उनकी सच्चाई से भी मैं रूबरू कराना चाहूंगा। बिहार के कई जिले इस समय सूखाग्रस्त घोषित हैं। इसमें से एक छपरा जिला भी शामिल है। लेकिन पिछले दो दिनों तक हुयी बारिश की कुछ बूंदों ने छपरा की तस्वीर बदल कर रख दी है। जिन सड़कों की प्रशंसा करते सरकार अघा नहीं रही है उन पर घुटने-घुटने भर पानी लगा है। सिर्फ सडकें ही नहीं, विभागीय कार्यालयों की स्थिति भी नहीं सुधरी है। कार्यशैली कितनी सुधरी है, फिर कभी बात करेंगे लेकिन विभागों की बाहरी स्थिति में भी कोई बदलाव मुझे नजर नहीं आया है। जब छह साल पूर्व यहां आया था तब भी जीर्ण-शीर्ण भवनों में विभागीय कार्यालय चल रहे थे, आज भी चल रहे हैं। इन्द्र भगवान ने नीतीश सरकार की कार्यशैली की पोल खोलने में थोड़ी मदद की है। जिले के सबसे बड़े कार्यालय यानी समाहरणालय के परिसर में घुटने भर पानी भरा है। व्यवहार न्यायालय में लबालब पानी है तो बच्चों के जिले की योजनाओं को मूर्त रूप देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका अदा करने वाले कार्यालय- जिला परिषद का परिसर भी जलजमाव से ग्रस्त है। कार्यालयों से कर्मचारी पानी से जैसे-तैसे बचते हुए फाइले इधर-उधर लेकर भाग रहे थे। शहर का सबसे प्रमुख नाला- खनुआ नाला की सफाई कई वर्षों से नहीं हुयी है। जब भी बारिश होती है नाले का पानी सड़क पर फैल जाता है। मैं यह नहीं कह रहा कि जलजमाव हो ही नहीं सकता लेकिन हल्की बारिश में ही यह हाल होना व्यवस्था की सच्चाई बयां करने के लिए काफी है। छोटे बच्चे सड़कों पर लगे पानी में डूबकर-पारकर स्कूल पहुंच रहे हैं और लौट रहे हैं। कुछ तस्वीरें प्रस्तुत हैं-
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| जिला परिषद कैम्पस में लबालब भरा पानी |
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| समाहरणालय परिसर में भरे पानी के बीच गुजरते लोग |
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| कोर्ट के पीछे सरकारी कार्यालयों के सामने लगा जलजमाव |
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| पानी से होकर विभागीय फाइलें ले जाने की जद़दोजहद |
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| सड़क पर फैले नाले व बरसात के पानी से होकर गुजरते विद्यालय के छोटे-छोटे बच्चे |
मैं नीतीश सरकार का कोई विरोधी नहीं, बस यही बताना चाहता हूं कि बिहार के विकास के बारे में जितना ढिंढोरा पीटा जा रहा है, वस्तुत: उतना विकास हुआ नहीं है। इसे आप सब भी समझ जाएं। यही बात गांव जाने पर अपने दोस्तों को मैं अक्सर समझाता हूं। एक पिछड़े राज्य के बारे में हम सभी एक बड़े भ्रम की स्थिति में हैं।
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