चुनाव में क्यों गरीब हो जाते हैं नेताजी?
यह एक सवाल है जो बचपन में अक्सर मेरे दिमाग के नसों को ढ़ीला करने में लगा रहता था। जब बच्चा था तो चुनाव मेरे लिए या फिर मेरे जैसे और भी मेरे साथी बच्चों के लिए एक पर्व सरीखा था। यह पर्व केवल शाब्दिक नहीं था, पर्व वाली भावनाएं भी थीं। तब मैं नहीं जानता था कि यह लोकतंत्र का सबसे बड़ा पर्व है, अब जानता हूं। लेकिन पहले का न जानना ही अच्छा था, अब जानकर भी पर्व का अनुभव नहीं कर पाता। तब मैं अक्सर यह सवाल सोचा करता था कि आखिर इस पर्व में नेताजी इतने गरीब क्यों हो जाते हैं? बहुत सोचा, पर कभी समझ नहीं सका था। बचपन के सवाल का जवाब अब जवानी में जाकर पा सका हूं। यह जवाब भी पूर्ण नहीं है, संदेहास्पद है। जवाब तो तब पूर्ण मिले जब मेरा सवाल पूरी तरह सही हो। दरअसल, अपना सवाल भी मैं अब जाकर समझ सका हूं। वस्तुत: यह तो कोई सवाल ही नहीं है कि नेताजी गरीब क्यों हो जाते हैं? नेताजी भला गरीब होते ही कब हैं? वे तो मात्र दिखावा करते हैं- अब जाकर समझ में आयी है यह बात। एक तरह से देखा जाए तो मेरे बचपन का यह सवाल भी मेरी अन्य नादानियों की तरह ही है! पर सवाल कैसे भी हों, कभी के भी हों, जवाब तो उन्हें चाहिए ही। मुझे अपूर्ण ही सही, मेरे सवालों का जवाब मिल गया है।
अभी मैं बिहार के छपरा में हूं। विधानसभा चुनाव सिर पर है और प्रशासन के साथ ही साथ हमें भी खबरों संबंधी रोज कुछेक मेल मिल रहे हैं। जिले में इस समय नेताओं की बाढ़-सी आ गयी है। हालांकि, सचमुच का बाढ़ भी आने की संभावना बनी हुयी है। सारण के पानापुर स्थित सारण तटबंध पर घाघरा के पानी का दबाव है तो गोपालगंज में बतरदेह बांध पर गंडक के पानी का जबरदस्त दबाव उसे तोड़ने पर आमादा है। जिला प्रशासन जिले को बाढ़ के खतरे से बचाने के लिए तमाम कार्रवाईयों में जुटा है। लेकिन, इस बाढ़ से नेताओं की बाढ़ अभी अलग चल रही है। यह सब आदर्श आचार संहिता का असर है। वरना, पानी की बाढ़ और नेताओं की बाढ़ एक साथ देखने को मिलती। अभी संभावित बाढ़ से प्रभावित गांवों में नेता पहुंच चुके होते और राहत सामग्रियां भी बंटवा दी गयी होती। लेकिन, अभी उन्हें प्राथमिकी का डर सता रहा है- लिहाजा, ऐसी करतूतों से बचने का प्रयास कर रहे हैं। पर, इस समय सभी नेताओं का एक दायित्व अवश्य पूर्ण हो रहा है, जो अक्सर चुनाव में ही होता है। सभी नेता अपने कार्य क्षेत्र-चुनाव क्षेत्र में विद्यमान हैं। ऐसा बहुत कम होता है। यदि चुनाव न हो तो ये नेता या तो पटना दिखते हैं या फिर दिल्ली। इससे भी मन भर गया तो वे कुल्लू-मनाली में सैर कर रहे होते हैं। लेकिन अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों का दु:ख-दर्द बांटने में अपना समय कतई जाया नहीं करते। उस समय नहीं करते, क्योंकि उस समय क्षेत्र में समय देना उनके लिए समय जाया करने जैसा होता है। इस समय वे अपना समय दे रहे हैं, क्योंकि इस समय अपने क्षेत्र में समय देना उनके लिए एक इन्वेस्टमेंट सरीखा है।
खैर, मैं अपने विषय से भटक रहा हूं। मुद़दे पर आते हैं। चुनाव जीतने के बाद लक्जरी गाडि़यों के काफिले के साथ आने वाले नेताजी अभी बोलेरो से चलना अधिक पसंद कर रहे हैं। अपनी स्कार्पियो शायद भाड़े पर चला रहे होंगे। या फिर किसी से अदला-बदली कर ली होगी। बोलेरो थोड़ी गरीब टाइप गाड़ी लगती है, जनता का ध्यान जल्दी आकृष्ट करेगी। नेताजी के साथ रायफल लेकर चलने वाले उनके भतीजे-भांजे भी नजर नहीं आ रहे। यदि कभी-कभी उनके साथ दिख भी गए तो कुछ अधिक ही शरीफ दिखते हैं। नेताजी तो बिल्कुल ही बदल गए हैं। लकदक कुर्ता-पाजामा पहने वाले नेताजी अब बस हमेशा एक ही कुर्ते-पाजामे में नजर आ रहे हैं। कुर्ता की सिलाई बांह के पास से छूट गयी है। उनकी गाड़ी के पीछे चलने वाली गाडि़यां गायब हो गई हैं। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह है कि हमेशा गाड़ी से संजय दत्त स्टाइल में उतरने और चलने वाले नेताजी अब ऐसे दिखते हैं जैसे सुदामा कृष्ण से मिलने जा रहे हों। शक्ल से निहायत ही शरीफ दिख रहे नेताजी गाड़ी से उतरने से पहले ही हाथ जोड़ लेते हैं। हाथ जोड़े ही गाड़ी से उतरते हैं और जब तक गाड़ी लोगों की नजर से ओझल नहीं हो जाती, हाथ जोड़े बैठे रहते हैं। अजीब परिवर्तन है इस पर्व में, इन नेताओं में। कभी-कभी तो इनकी अदाकारी देखकर मुझे लगता है कि ये नेता चुनाव में अभिनेता बन गए हैं, इनके सलाहकार निर्देशक की भूमिका में है और कोई एक्सपर्ट इनकी फिल्म का संपादन कर रहा है। नेताजी तो बस वही कर रहे हैं जो उन्हें रोल मिला है। छपरा जिले में ही एक गांव है- सड़कें काफी बेकार हैं। इस गांव में प्रवेश करते यहां के एक स्थानीय नेताजी अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ा लिया करते थे। अब हालांकि सड़क की स्थिति पहले से अच्छी हो गयी है लेकिन बारिश होने के कारण सड़क कीचड़ से सन गयी है। पर, वही नेताजी जिन्हें इस सड़क की धूल परेशान करती थी, आज कीचड़ से भी नहीं डरते। दूर चौराहे पर ही गाड़ी खड़ी कर देते हैं और वहां से पैदल हाथ जोड़े घर-घर घूम रहे हैं। यह नजारा मुछे कभी-कभी काफी आनंदित कर देता है, यह सोचकर कि यह लोकतंत्र में ही संभव है। लेकिन जैसे ही चुनाव बाद की नेताजी की भूमिका की कल्पना करता हूं, इस लोकतंत्र की इस खासियत को इसकी कमी मानने लग जाता हूं। जिले में इस समय जितने भी टिकट के दावेदार नेता हैं, सब एक ही भूमिका में नजर आ रहे हैं। चुनाव के बाद या चुनाव के पहले इनमें से कई रंगदार सरीखे दिखते थे तो कई की गिनती दबंग में होती थी। कुछेक अपने क्षेत्र में जब भी आते तो वे किसी नई गाड़ी में होते थे। पर अब न रंगदार रहे, न दबंग, न धनी- न गरीब, सब एक रंग में रंग गए हैं। सभी याचक हैं। और याचक तो दया के पात्र होते हैं, हमें भी इनपर अभी दया आ रही है। बाद में जैसा आचरण करेंगे, उस अनुसार इनके प्रति मेरी भी सोच बदलेगी। लेकिन, अभी तो ये लोकतंत्र के सबसे अच्छी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं, अपनी जनता से उनके घर जाकर मिल रहे हैं। ऐसे में इन पर फिलवक्त ज्यादा टीका-टिप्पणी करनी की मेरी इच्छा नहीं हो रही। यद्यपि जानता हूं कि नेताजी की यह भूमिका स्थायी नहीं है तथापि उनकी वर्तमान शैली मुझे लुभा रही है और मैं सम्मोहित-सा उनपर कुछ कटाक्ष नहीं कर पा रहा हूं। जितना कह दिया, वह इसलिए कि कुछ पुरानी यादें भी ताजा हो गई थीं। अब वर्तमान में लौट आया हूं, इसलिए अब बस।
अभी मैं बिहार के छपरा में हूं। विधानसभा चुनाव सिर पर है और प्रशासन के साथ ही साथ हमें भी खबरों संबंधी रोज कुछेक मेल मिल रहे हैं। जिले में इस समय नेताओं की बाढ़-सी आ गयी है। हालांकि, सचमुच का बाढ़ भी आने की संभावना बनी हुयी है। सारण के पानापुर स्थित सारण तटबंध पर घाघरा के पानी का दबाव है तो गोपालगंज में बतरदेह बांध पर गंडक के पानी का जबरदस्त दबाव उसे तोड़ने पर आमादा है। जिला प्रशासन जिले को बाढ़ के खतरे से बचाने के लिए तमाम कार्रवाईयों में जुटा है। लेकिन, इस बाढ़ से नेताओं की बाढ़ अभी अलग चल रही है। यह सब आदर्श आचार संहिता का असर है। वरना, पानी की बाढ़ और नेताओं की बाढ़ एक साथ देखने को मिलती। अभी संभावित बाढ़ से प्रभावित गांवों में नेता पहुंच चुके होते और राहत सामग्रियां भी बंटवा दी गयी होती। लेकिन, अभी उन्हें प्राथमिकी का डर सता रहा है- लिहाजा, ऐसी करतूतों से बचने का प्रयास कर रहे हैं। पर, इस समय सभी नेताओं का एक दायित्व अवश्य पूर्ण हो रहा है, जो अक्सर चुनाव में ही होता है। सभी नेता अपने कार्य क्षेत्र-चुनाव क्षेत्र में विद्यमान हैं। ऐसा बहुत कम होता है। यदि चुनाव न हो तो ये नेता या तो पटना दिखते हैं या फिर दिल्ली। इससे भी मन भर गया तो वे कुल्लू-मनाली में सैर कर रहे होते हैं। लेकिन अपने चुनाव क्षेत्र के लोगों का दु:ख-दर्द बांटने में अपना समय कतई जाया नहीं करते। उस समय नहीं करते, क्योंकि उस समय क्षेत्र में समय देना उनके लिए समय जाया करने जैसा होता है। इस समय वे अपना समय दे रहे हैं, क्योंकि इस समय अपने क्षेत्र में समय देना उनके लिए एक इन्वेस्टमेंट सरीखा है।
खैर, मैं अपने विषय से भटक रहा हूं। मुद़दे पर आते हैं। चुनाव जीतने के बाद लक्जरी गाडि़यों के काफिले के साथ आने वाले नेताजी अभी बोलेरो से चलना अधिक पसंद कर रहे हैं। अपनी स्कार्पियो शायद भाड़े पर चला रहे होंगे। या फिर किसी से अदला-बदली कर ली होगी। बोलेरो थोड़ी गरीब टाइप गाड़ी लगती है, जनता का ध्यान जल्दी आकृष्ट करेगी। नेताजी के साथ रायफल लेकर चलने वाले उनके भतीजे-भांजे भी नजर नहीं आ रहे। यदि कभी-कभी उनके साथ दिख भी गए तो कुछ अधिक ही शरीफ दिखते हैं। नेताजी तो बिल्कुल ही बदल गए हैं। लकदक कुर्ता-पाजामा पहने वाले नेताजी अब बस हमेशा एक ही कुर्ते-पाजामे में नजर आ रहे हैं। कुर्ता की सिलाई बांह के पास से छूट गयी है। उनकी गाड़ी के पीछे चलने वाली गाडि़यां गायब हो गई हैं। सबसे बड़ा परिवर्तन तो यह है कि हमेशा गाड़ी से संजय दत्त स्टाइल में उतरने और चलने वाले नेताजी अब ऐसे दिखते हैं जैसे सुदामा कृष्ण से मिलने जा रहे हों। शक्ल से निहायत ही शरीफ दिख रहे नेताजी गाड़ी से उतरने से पहले ही हाथ जोड़ लेते हैं। हाथ जोड़े ही गाड़ी से उतरते हैं और जब तक गाड़ी लोगों की नजर से ओझल नहीं हो जाती, हाथ जोड़े बैठे रहते हैं। अजीब परिवर्तन है इस पर्व में, इन नेताओं में। कभी-कभी तो इनकी अदाकारी देखकर मुझे लगता है कि ये नेता चुनाव में अभिनेता बन गए हैं, इनके सलाहकार निर्देशक की भूमिका में है और कोई एक्सपर्ट इनकी फिल्म का संपादन कर रहा है। नेताजी तो बस वही कर रहे हैं जो उन्हें रोल मिला है। छपरा जिले में ही एक गांव है- सड़कें काफी बेकार हैं। इस गांव में प्रवेश करते यहां के एक स्थानीय नेताजी अपनी गाड़ी के शीशे चढ़ा लिया करते थे। अब हालांकि सड़क की स्थिति पहले से अच्छी हो गयी है लेकिन बारिश होने के कारण सड़क कीचड़ से सन गयी है। पर, वही नेताजी जिन्हें इस सड़क की धूल परेशान करती थी, आज कीचड़ से भी नहीं डरते। दूर चौराहे पर ही गाड़ी खड़ी कर देते हैं और वहां से पैदल हाथ जोड़े घर-घर घूम रहे हैं। यह नजारा मुछे कभी-कभी काफी आनंदित कर देता है, यह सोचकर कि यह लोकतंत्र में ही संभव है। लेकिन जैसे ही चुनाव बाद की नेताजी की भूमिका की कल्पना करता हूं, इस लोकतंत्र की इस खासियत को इसकी कमी मानने लग जाता हूं। जिले में इस समय जितने भी टिकट के दावेदार नेता हैं, सब एक ही भूमिका में नजर आ रहे हैं। चुनाव के बाद या चुनाव के पहले इनमें से कई रंगदार सरीखे दिखते थे तो कई की गिनती दबंग में होती थी। कुछेक अपने क्षेत्र में जब भी आते तो वे किसी नई गाड़ी में होते थे। पर अब न रंगदार रहे, न दबंग, न धनी- न गरीब, सब एक रंग में रंग गए हैं। सभी याचक हैं। और याचक तो दया के पात्र होते हैं, हमें भी इनपर अभी दया आ रही है। बाद में जैसा आचरण करेंगे, उस अनुसार इनके प्रति मेरी भी सोच बदलेगी। लेकिन, अभी तो ये लोकतंत्र के सबसे अच्छी भूमिका का निर्वहन कर रहे हैं, अपनी जनता से उनके घर जाकर मिल रहे हैं। ऐसे में इन पर फिलवक्त ज्यादा टीका-टिप्पणी करनी की मेरी इच्छा नहीं हो रही। यद्यपि जानता हूं कि नेताजी की यह भूमिका स्थायी नहीं है तथापि उनकी वर्तमान शैली मुझे लुभा रही है और मैं सम्मोहित-सा उनपर कुछ कटाक्ष नहीं कर पा रहा हूं। जितना कह दिया, वह इसलिए कि कुछ पुरानी यादें भी ताजा हो गई थीं। अब वर्तमान में लौट आया हूं, इसलिए अब बस।
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