यतो धर्म: ततो जय

कहते हैं जहां धर्म है वही जीत है यानी, यतो धर्म: ततो जय। विज्ञान की विकृतियों और प्रकृति से छेड़छाड़ के नतीजों को भुगत रही दुनियां फिर से धर्म की तरफ लौट रही है, या कहें कि लौटने के लिए विवश हो गयी है। धर्म सिर्फ जीत ही नहीं दिलाता, यह हमें तटस्‍थ रहने का भी धैर्य और शक्ति प्रदान करता है। 26 जून की रात हम बिहार के छपरा स्थित चिरांद घाट पर मौजूद हैं। यहां हजारों की भीड़ धर्म की जय-जयकार करने के लिए उतावली हुयी जा रही है। जीवनदायिनी मां गंगा, श्‍यामिली सरयू और गंडक की धाराएं यहां से थोड़ी ही दूरी पर जब एक-दूसरे को काटती हैं, या कहें कि एक-दूसरे से मिलती हैं तो इस पुनीत दर्शन के बाद ऐसा लगता है जैसे जीवन में कुछ शेष ही नहीं रह गया। सबकुछ पा लिया हमने। ऐसी संतुष्टि, ऐसी शांति, ऐसा अहसास कभी हमें विज्ञान ने नहीं दिया, कभी दुनियां की किसी अविस्‍कारिक कृति से नहीं मिली, लेकिन यहां आकर तो ऐसा लगा जैसे हम यही के होकर रह जाएं। नदी घाट के किनारे पर दूर-दूर तक नावें नजर आ रही हैं। रात के अंधेरे में इन नावों पर जलती लालटेन की लौ से प्रस्‍फुटित रोशनी जब नदी की धारा से टकराती है तो अद़भुत छटा का निर्माण हो रहा है। प्रसिद़ध संस्‍था चिरांद विकास परिषद ने यहां गंगा घाट पर गंगा बचाओ संकल्‍प का आयोजन किया है। नदी के तट पर पांच छोटे-छोटे आरती मंच बने हैं और काशी से आए बटुक इन पांचों मंचों पर अपनी उपस्थिति से जनमानस को धन्‍य कर रहे हैं। नदी घाट के किनारे मंदिरों पर लगे कृत्रिम प्रकाश से काफी रोशनी है लेकिन जब बटुकों ने अपने दाहिने हाथ से आरती अरधा पकड़ा और बाये हाथ के सहारे से चारों तरफ मां गंगे की स्‍तुति शुरू की तो उससे निकली रोशनी ने इस कृत्रिम रोशनी को मात दे दी है। इस अरधे की 108 ज्‍योतियों ने लोगों के मन के सारे विकार मिटा दिये और हमारे अंदर तक रोशनी पहुंच गयी। पांच अरधों की कुल 540 ज्‍योतियों से न सिर्फ घाट पर गजब की रोशनी फैल गयी है बल्कि यहां मौजूद लोगों के दिलों में व्‍याप्‍त अंधेरा भी दूर हो गया। लोग अनायास ही बोल रहे हैं- मां गंगा की जय। गंगा मईया की जय। यह स्‍वर उनके मुख से नहीं, मन से निकल रहा है। वे नहीं जानते, क्‍या बोल रहे हैं, बस खुद ही आवाज निकल रही है- गंगा मईया की जय। आरती शुरू हो गई है। उपस्थित हजारों हाथ खुद ही हवा में लहराये और मां गंगा की स्‍तुति के लिए एक-दूसरे से जुड़कर ऐसे चिपक गए हैं जैसे वे हमेशा से ऐसे ही हों। पूरे एक घंटे की महाआरती के दौरान हाथ जुड़े रहे और लोगों के मन में मां गंगा की अविरल धारा बह रही थी। न किसी को गर्मी हो रही है, न पसीने छूट रहे है और न ही कहीं आने-जाने की जल्‍दी है। अथवा, सबकुछ है लेकिन उपस्थित लोगों को मां गंगा के अलावा कुछ याद ही नहीं। वे सबकुछ भूल चुके हैं। बस मां याद हैं, वे उनके बच्‍चे हैं और उनकी अपार कृपा के बदले आज जब उन्‍हें उनकी स्‍तुति के लिए यह अवसर मिला है तो वे भला इसे कैसे जाने दे सकते हैं। बस जड़ हो गए हैं सभी। सबकुछ थम गया है। वक्‍त जैसे रूक गया है यहां आकर। ऐसा सिर्फ धर्म में ही संभव है। हजारों की भीड़ लेकिन कोलाहल कही नहीं। यदि स्‍वर है तो सिर्फ आरती के स्‍वरयुक्‍त पंक्तियों की। हम नवम्‍बर 2007 में अपनी मां के साथ काशी स्थित दशाश्‍वमेघ घाट पर गए थे, यहां आकर ऐसा लग रहा है जैसे हम काशी में ही आ गए हों। सबकुछ वैसा ही है। नदी के किनारे मंदिरों की श्रृंखला, अपार आस्‍था को समेटे महाआरती के दर्शन को लालायित लोग। कुछ भी इतर नहीं। बस जगह बदल गयी है। 2 साल पहले हम बनारस में थे, आज वहीं दृश्‍य चिरांद में पाकर धन्‍य हो रहे हैं। मां गंगा के शीतल जल को छूते हुए जब हवाएं दक्षिण की तरफ से आ रही हैं तो ऐसा लगता है जैसे मां का आंचल हमें छूकर गया हो। अधिकतर लोगों की आंखें श्रद्धा से बंद है और वे बंद आंखों में मां गंगा की प्रतिमूर्ति देख रहे हैं। ऐसे में जब हवाएं उन्‍हें (हमें भी) छूकर जा रही है तो अद्भुत आनंद की अनुभूति हो रही है। यहां सिर्फ हम नहीं हैं, हमारे जैसे हजारों लोग हैं और कुछ बड़े लोग भी हैं जो विशेष अवसरों पर ही देखे जाते हैं। लेकिन आज वे भी हमारे जैसे ही हैं, एकदम सामान्‍य वेष में, सामान्‍य शैली में लेकिन अपार आस्‍था के साथ। जाति-धर्म का भी कोई भेदभाव नहीं। बिहार विधानसभा प्रत्यायुक्त समिति के सभापति रामदास राय, विधानपरिषद सदस्य सलीम परवेज, विधायक ज्ञानचंद मांझी, पूर्व मंत्री मुनेश्वर चौधरी, पूर्व सांसद लाल बाबू राय, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के क्षेत्र प्रचारक स्वांत रंजन, वरीय पत्रकार कृष्‍णकांत ओझा, अखिल रंजन, श्रीराम तिवारी, विश्व हिन्दू परिषद के मंत्री ओमप्रकाश, वरीय अधिवक्ता मणीन्द्र कुमार सिन्हा, प्रमुख देवंती देवी, मुखिया सरिता देवी आदि विशिष्ट अतिथि के रूप में उपस्थित हैं। अभी-अभी चिरांद विकास परिषद के संरक्षक महंत कृष्ण गिरी उर्फ नागा बाबा ने आगंतुक विशिष्ट अतिथियों का इस महाआरती में स्‍वागत किया है। कृष्‍णगिरि स्‍वयं संत हैं और सैकड़ों उनके भक्‍त भी। लेकिन यहां आज वे भी नतमस्‍तक हैं। धर्म खुद अपनी गाथा कह रहा है। वह बोल नहीं रहा लेकिन सबकुछ दिख रहा है। आरती के दौरान जब मां गंगा की लहरों में थोड़ी उथल-पुथल हो रही है तो ऐसा लग रहा है जैसे मां कह रही हो- हम खुश हुए तुम्‍हारी प्रार्थना से, मांगो, क्‍या मांगते हो। लेकिन हमें बोध कहां है, हम तो बस निश्‍चेत हो गए हैं। यहां धर्म है और जय भी। धर्म की बात हो और जय-जयकार न हो, भला कैसे हो सकता है। हर तरफ मां गंगा की जय-जय कहते आज हमें लगा कि हम खुद ´जय´ हो गए हैं। जैसे ही आरती समाप्‍त हुयी, एकाएक सबकी तन्‍द्रा भंग हो गई और वे अमर लोक से पुन: चिरांद की धरती पर वापस आ गए। उपस्थित महिलाएं, बच्‍चे अवाक हैं। वे शायद सोच रहे हैं कि आरती अभी खत्‍म क्‍यो हो गयी। मां की स्‍तुति के लिए इतनी बेसब्री, अकुलाहट वाली इस धार्मिक भीड़ को देखकर हमें जो सुखद अनुभूति हुयी है, वह हम शब्‍दों में बयां नहीं कर सकते। हमने यहां जो कुछ भी महसूस किया, वह आपको बताने की पूरी कोशिश की। लेकिन, हम जानते हैं कि हम इसमें सफल नहीं हो सके हैं। अहसास को यदि इंसान पूरी तरह बांट ले तो फिर क्‍या कहना। लेकिन ऐसा संभव नहीं। हमने चिरांद की इस पुण्‍यभूमि पर आकर जो कुछ महसूस किया वह सबकुछ जानना है तो इस महाआरती में शामिल होने के अलावा आपके पास और कोई विकल्‍प नहीं है। गंगा महाआरती के अवसर पर उपस्थित लोगों की इस अविस्‍मरणीय और अपार आस्‍था को हमारा प्रणाम !

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