अमोघ 'झूठास्त्र' की निंदा न कीजिए, प्रधानमंत्री की इस कला को नमस्कार कीजिए!


कर्नाटक में चुनावी रैली में प्रधानमंत्री ने कहा कि "महाराष्ट्र, गोवा, गुजरात, राजस्थान, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और त्रिपुरा में एक के बाद एक चुनावी हार के बावजूद कांग्रेस उतनी चिंतित नहीं थी जितनी अब है क्योंकि हार उसे नजर आ रही है. मैं आपको बताऊं क्यों... क्योंकि कर्नाटक में उनके मंत्रियों एवं नेताओं ने यहां एक टैंक बनाया है. लोगों से लूटे गये धन का एक हिस्सा घर ले जाया जाता है जबकि बाकी उस टैंक में डाल दिया जाता है. टैंक पाइपलाइन के मार्फत दिल्ली से जुड़ा है, जो धन सीधे दिल्ली पहुंचाती है...."
यह देश के प्रधानमंत्री का भाषण है। वह कर्नाटक की कांग्रेस सरकार पर भ्रष्टाचार का ऐसा आरोप लगा रहे हैं, जिसका कोई सबूत उनके पास नहीं है। कर्नाटक के मुख्यमंत्री ने चैलेंज भी किया है कि यदि प्रधानमंत्री के पास सबूत है तो देश के सामने सार्वजनिक कर दें लेकिन कोई सबूत नहीं है तो सार्वजनिक क्या करेंगे? झूठ के भी भला कोई सबूत होते हैं? यदि प्रधानमंत्री के इस आरोप का कोई सबूत होता तो मोदी सरकार सीबीआई, आईटी से लेकर तमाम केंद्रीय एजेंसियों को इस काम में लगा चुकी होती और अब तक कर्नाटक सरकार के कई नेता जेल में होते। अब तक भाजपा की आईटी टीम इन सबूतों को कर्नाटक ही नहीं देश के कोने—कोने में फैला चुकी होती और कर्नाटक चुनाव कांग्रेस बिना लड़े ही हार चुकी होती। लेकिन, चूंकि ऐसा नहीं है इसलिए प्रधानमंत्री कुछ नहीं कर पा रहे। वे सिर्फ बोल रहे हैं। करिअप्पा-थिमैय्या प्रकरण के बाद वे एक बार फिर झूठ बोल रहे हैं...। सवाल है कि प्रधानमंत्री आजकल झूठ क्यों बोल रहे हैं? दरअसल, प्रधानमंत्री मजबूर हैं। इसलिए उनके अमोघ अस्त्र 'झूठास्त्र' के प्रयोग किए जाने पर उनकी नींदा न कीजिए, बल्कि उनकी इस खूबी के लिए उन्हें नमस्कार कीजिए।
प्रधानमंत्री को पता है कि कर्नाटक चुनाव जीतने के लिए न तो उनके पास विपक्ष के खिलाफ कुछ ठोस मसाला है और न ही अपना बखान करने के लिए अपनी कुछ खास उपलब्धियां इसलिए वे करें भी तो क्या? भाजपा ने अश्वमेघ यज्ञ के घोड़े को छोड़ दिया है और उसे बचाने की सारी जिम्मेदारी अकेले प्रधानमंत्री पर। ऐसे में प्रधानमंत्री को इस चुनाव में भी आजमाना ही पड़ा है अपना अमोघ अस्त्र— झूठ। वह झूठ जो प्रधानमंत्री के मुंह से सुनते समय जनता को बिल्कुल सच लगता है। वैसे भी, भला कोई सोच सकता है कि देश का प्रधानमंत्री भी झूठ बोल सकता है? यदि किसी को संशय भी हो तो उसे दूर कैसे करे? और चुनावी सभाओं में उमड़ी एक—दो लाख की भीड़ में से यदि दो—चार लोगों ने यह प्रयास किया, सच जान भी गए तो क्या? अधिकतर भीड़ तो झूठ पर ही फिदा होगी ना? और हो भी क्यों न! अपने प्रधानमंत्री के झूठ बोलने का अंदाज ही कुछ ऐसा है कि कोई भी फिदा हो जाए। प्रधानमंत्री मोदी किसी भी झूठ को इस खूबी के साथ बोलते हैं कि संदेह की गुंजाइश ही न बचे। वह इतना जोर देकर कोई बात कहते हैं कि सच जानने वाले को खुद पर ही संदेह हो जाए कि कहीं उसे ही तो गलत पता नहीं था! झूठ को सच में बदल देने की इतनी बड़ी खूबी होने के बाद भी प्रधानमंत्री मोदी की यह भलमनसाहत ही कही जाएगी कि इस खूबी पर उनको जरा भी घमंड नहीं है। यकीन मानिए, प्रधानमंत्री झूठ बोलना बिल्कुल नहीं चाहते लेकिन वे जानते हैं कि सच बोलना उनके ही खिलाफ जाएगा, इसलिए झूठ बोलने के लिए मजबूर हैं। चार साल पहले जनता से किए उनके सारे वादे हवा हो गए हैं। नोटबंदी और जीएसटी, जिसे वे उपलब्धियां बताते थे, वही सबसे अधिक फेल साबित हुईं। ऐसे में वे बोलें क्या?
कर्नाटक चुनाव में भाजपा के मुख्यमंत्री उम्मीदवार से लेकर तमाम प्रत्याशियों पर आपराधिक मुकदमे दर्ज हैं। बीजेपी ने उम्मीदवारों की जो दो सूची जारी की है, उनमें 24 ऐसे हैं, जिनके खिलाफ आपराधिक मामले हैं। कई ऐसे भी हैं जो जेल तक जा चुके हैं। कट्टा सुब्रमण्यनायडू और कृष्णा शेट्टी तो भूमि घोटाले में जेल जा चुके हैं। माइनिंग माफिया जी सोमशेखर रेड्डी, जिसे बेल्लारी सिटी विधानसभा सीट से बीजेपी ने टिकट दिया है, उसे जमानत दिलाने के लिए जज को रिश्वत देने के आरोप में उसका छोटा भाई जेल गया था। अब बताइए, प्रधानमंत्री किस मुंह से कहें कि कांग्रेस ने या किसी और दल ने आपराधिक छवि के लोगों को टिकट दे दिया है? जब खुद उनकी पार्टी आपराधिक छवि वालों के साथ कर्नाटक चुनाव जीतने उतरी है? अब वे किस तरह यह सच बोलें? अपना ही कुकृत्य कैसे बोलें? इसलिए झूठ बोलना पड़ रहा है।
हां, वे चुनावी सभाओं में यह बोल सकते हैं कि देखिए केंद्र सरकार राज्यों के लिए क्या कर रही है लेकिन वह भी कैसे बोलें? कुछ करें तब तो बोलें? अभी इसी 3 मई को सुप्रीम कोर्ट में कावेरी जल विवाद पर सुनवाई चल रही थी। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा कि वह मंगलवार तक एक हलफनामा दाखिल कर बताए कि उसने कावेरी जल विवाद को निपटाने के लिए क्या कदम उठाए हैं? जानते हैं सरकार ने क्या कहा? सरकार का पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा- "कावेरी नदी के जल बंटवारे से संबंधित विधेयक कैबिनेट के समक्ष रखा जा चुका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विदेश यात्रा के बाद फिलहाल कर्नाटक चुनाव में व्यस्त हैं, इस वजह से अभी तक विधेयक को मंजूरी नहीं मिल पाई है। कृपया मामले की सुनवाई 12 मई तक के लिए टाल दें क्योंकि इस दिन कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने हैं...।" अब सोचिए, तमिलनाडु और कर्नाटक में कावेरी के पानी बंटवारे को लेकर योजना बनाने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दो माह पहले ही दे दिया था लेकिन योजना सिर्फ इसलिए लंबित है क्योंकि प्रधानमंत्री विदेश दौरों के बाद चुनाव प्रचार में व्यस्त हैं? एक तरफ पानी के लिए तमिलनाडु का गला सूखा जा रहा है और दूसरी तरफ '18 घंटे देश के लिए काम' करने का दावा करने वाली सरकार कह रही है कि वह 12 मई तक कर्नाटक में प्रचार छोड़कर देश का कोई और काम करने के लिए खाली नहीं है? जाहिर है कि अब ऐसे में प्रधानमंत्री झूठ नहीं बोलेंगे तो क्या बोलेंगे?
आप भरोसा कीजिए, अपने प्रधानमंत्री झूठे बिल्कुल नहीं हैं। वे न तो अपना सच छुपाना चाहते हैं और न ही विपक्ष के बारे में झूठ बोलना चाहते हैं लेकिन वे यह दोनों काम बस मजबूरी में कर रहे हैं। आप उनकी मजबूरी समझिए और उनकी निंदा की जगह, उनके झूठ पर आंखें बंद कर यकीन करते हुए उनका साथ दीजिए। समझिए कि वे यदि झूठ बोलने के आदी होते तो हर समय बोलते लेकिन वे मजबूरी में बोलते हैं इसलिए कभी—कभार बोलते हैं। खासकर चुनावों में उनकी यह मजबूरी बढ़ जाती है। अभी एक बार फिर चुनाव है इसलिए झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं। आप सकारात्मक ढंग से सोचिए और झूठ के प्रयोग से किसी भी चुनाव को अपने पक्ष में करने की इस नई रणनीति के लिए मोदीजी के आभारी होइए। धन, बाहुबल इन सबसे बहुत हानि है लेकिन झूठ बोलकर वोट लेने में कोई हर्ज नहीं है। इसमें कोई खर्च भी नहीं आता। न किसी को धमकाना पड़ता है। इसलिए इसे प्रधानमंत्री की खूबी के रूप में लीजिए, और गौरव का आभास कीजिए कि ब्रह्मास्त्र के बाद झूठास्त्र का भी अविष्कार अपने ही देश में हुआ है। आप इसके प्रचार-प्रसार में शामिल होइए। प्रधानमंत्री की इस खूबी को उनकी तमाम खूबियों में शीर्ष पर रखिए क्योंकि यह खूबी इस हद तक देश के किसी भी अन्य प्रधानमंत्री में नहीं थी। हम खुद ऐसा सोचने लगे हैं कि किसी झूठ से माहौल बनाकर चुनाव जीत लेना कोई आसान काम नहीं है, यह बहुत बड़ी खूबी है। झूठ को भी अति आत्मविश्वास के साथ बोलने की प्रधानमंत्री की इस बड़ी खूबी में एक और खूबी के हम कायल हैं, वह है झूठ बोलने के विषय चयन के साथ ही उसके समय चुनाव का। वे अपने झूठास्त्र का प्रयोग हमेशा अंतिम समय में करते हैं। चुनाव से ठीक एक—दो सप्ताह पहले। वे जानते हैं कि झूठ के पांव नहीं होते इसलिए वे सतर्क रहते हैं कि मतदान तिथि और उनके झूठ—तिथि में इतना अधिक फासला न हो जाए कि बीच में सच से उस झूठ का सामना हो जाए। इसी खूबी से बोले गए झूठ का परिणाम गुजरात चुनाव में दिखा था। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन पर लगाए गए झूठे आरोपों के बारे में भले ही बाद में राज्यसभा में गुपचुप माफी मांग ली गई लेकिन गुजरात में सरकार तो बन गई ना? यदि चुनाव में जीत की कीमत दो—चार झूठ है तो बोलने में क्या हर्ज है? हां, ऐसा करने से प्रधानमंत्री पद की गरिमा मटियामेट हो रही है तो यह चिंता मोदी क्यों करें? उन्हें कौन-सा हमेशा इस पद पर बने रहना है। वे तो कहते ही हैं कि फकीर हैं। भाई, वे तो उठेंगे और अपने झूठ के झोले के साथ चल देंगे। समझेंगे आने वाले वे प्रधानमंत्री, जिनके सच को भी जनता चेक करेगी कि कहीं यह भी 'पिछले वाले' की तरह झूठ तो नहीं बोल रहा? वैसे भी मोदीजी का सपना प्रधानमंत्री पद की गरिमा बनाए रखनी थोड़ी है? उनका सपना कांग्रेसमुक्त भारत है फिर चाहे वह सच बोलने से साकार हो या झूठ बोलने से और वह सपना झूठ के जरिए सच में परिणत हो रहा है। एक—एक कर अखंड भारतवर्ष में भाजपा राज हो रहा है। हां, यह राज झूठ की बुनियाद पर खड़ा हो रहा है लकिन कांग्रेसमुक्त भारत तो सच में हो रहा है ना! आप प्रधानमंत्री के झूठ बोलने की कला से जलते हैं इसलिए निंदा करते हैं; हम तो उनकी इस कला के मुरीद हो चुके हैं और इसलिए हमें तो गुजरात के बाद कर्नाटक में भी अपने मोदीजी के झूठास्त्र के सकारात्मक परिणाम की उम्मीद है...।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट