अम्मा...
सभी माताओं को मातृ दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं। मेरी अम्मा को छोड़कर, क्योंकि अम्मा फेसबुक पर नहीं हैं। हां, उनकी नजर हर उस जगह है, जहां उनके बेटे की पहुंच है। यहां भी यदि हमने कुछ गलत लिखा तो वह जरूर भाई—बहन के माध्यम से उन तक पहुंच जाएगा और उसके बाद कोई तूफान आने जैसी चेतावनी मौसम विभाग की तरह जारी कर देंगी।
मेरी अम्मा देश की अधिकतर महिलाओं की तरह एक साधारण महिला और अधिकतर मांओं की तरह असाधारण मां हैं। वह फेसबुक पर नहीं हैं लेकिन वह तकनीकी रूप से दक्ष नहीं हैं, ऐसा भी नहीं हैं। दरअसल, वह होना नहीं चाहतीं। वह ऐसी मां हैं, जो वह सबकुछ सीख सकती हैं जो उनके बेटे के लिए हो; अपने लिए बस एक ऐसा बेटा रखती हैं जिसपर वे गर्व न कर सकें तो लज्जा भी न आए। इस फेसबुक पर जहां नहीं होने पर आजकल लोग किसी को गंवार भी समझ जाते हैं, यहां यदि हम एक शब्द भी लिख पाते हैं तो उसे सिखाने की शुरुआत अम्मा ने ही की थी; यह हम कैसे भूल सकते हैं? अम्मा निश्चित ही मातृ दिवस जैसे आयोजनों को नहीं समझतीं क्योंकि यह उनके समझने के लिए हैं भी नहीं, यह हमारे लिए हैं। उनके समझने के लिए जो कुछ भी है, वह— वह सबकुछ समझती हैं। अम्मा से आज भी बात हुई लेकिन मातृभाषा— भोजपुरी में ही। वैसी ही बातचीत जैसी अन्य दिनों होती है। 'अम्मा गोड़ लागsतानी' से शुरुआत और 'अच्छा प्रणाम' कहने के बाद 'खूब खुश रहs' सुनकर समाप्त। इस तरह की बातचीत में हैप्पी मदर्स डे या मातृदिवस की शुभकामनाएं कहना ऐसा लगता है जैसे मां—बेटे की बातचीत में कहीं कोई और आ टपका हो, ऐसा जैसे ये शब्द कहीं से जबरदस्ती घुसेड़ दिए गए हों। इसलिए हम मातृदिवस कीअम्मा को शुभकामनाएं नहीं देते। हां, यदि माँ पर लिखने बैठें तो हजारों पन्ने लिख सकते हैं और उसके केंद्र में निश्चित वही अम्मा होंगी। वह हमें एक—एक शब्द के लिए प्रेरणा दे रही होंगी।
आज कई आधुनिक मम्मियों ने पोस्ट किए हैं। उनमें अपने ममत्व से अधिक श्रेष्ठता साबित करने की होड़ है और वह भी किससे? मां से ही। आज की कुछ नई मम्मियों ने कल की अम्माओं से खुद को श्रेष्ठ साबित करने की कोशिश की है जबकि वह खुद उन्हीं जैसी की संतान हैं। यह बहुत बुरा लगा हमें क्योंकि एक मां की दूसरी मां से कभी तुलना नहीं हो सकती है। हां, एक दौर से दूसरे दौर की तुलना जरूर की जा सकती है। और यदि उस दौर से आज के दौर की तुलना की जाए तो निश्चित मानो की तब की अम्मा ने आज की मम्मी से हजार गुना अधिक संघर्ष किया है। इसलिए कि तब हर मोड़ पर लड़ना होता था, आज आपके पास लड़ने के लिए अतिरिक्त में आपका करियर और आपकी अपनी चाहतें हैं। बेटे को कहीं और छोड़कर जॉब पर चली जाने वाली यदि आप महान हैं, तो आपको पालने के लिए कभी कोई नौकरी न करने वाली मां क्या गंवार है? फेसबुक, पढ़ाई, करियर, पद, वेतन इनमें से एक भी अच्छी माँ होने की अहर्ता नहीं है, मां के लिए ममता होना चाहिए, संतान के लिए त्याग होना चाहिए, उसके लालन पालन में आ रही कठिनाइयों का सामना करने का साहस होना चाहिए और इनमें से कोई भी तब की अम्मा में आज की मम्मी से कम नहीं था। चाहों तो जिंदगी को रिवर्स गियर में लगाओ और बचपन में जाकर उस दौर को, तब के संघर्षों को, तब की अम्मा को एक नजर देख लो। इसी बहाने अपना बचपन भी दिख जाएगा और अम्मा भी।
अम्मा! 10वीं तक पढ़ी मेरी अम्मा ने हमें उतना पढ़ाया है, जितनी आज की कई माएं न पढ़ा सकें। अम्मा ने मुझे सिलेबस की किताबें ही नहीं पढ़ाई हैं, अपने साथ बैठाकर राम—राम भी लिखवाया है। मुझे धर्म ग्रंथ पढ़ाए हैं। और ढ़ेर सारी कहानियां सुनाई हैं... अनगिनत। जिंदगी देने के साथ ही जीना भी सिखाया। जिंदगी में संघर्ष करना, चुनौतियों से लड़ना भी सिखाया। अम्मा ने हमें सिर्फ पालने में झुलाकर बड़ा नहीं किया है, अपने साथ अपने संघर्षों में भी शामिल किया है और इसलिए हम काफी नजदीक से जानते हैं कि अम्मा होना, मम्मी होना एक ही है लेकिन अम्मा होना, मम्मी से अधिक नहीं होना तो कम होना भी नहीं है। तब घरों में भोजन ही नहीं बनाना होता, भोजन के योग्य खाद्य पदार्थ खुद ही तैयार करने होते थे। अम्मा ने अपने साथ 'ढेकुली' से धान कुटवाए हैं। दाल दरने के लिए 'जात' चलवाए हैं। चटनी पीसने के लिए 'सिलवट' पर 'लोढ़ा' भी चलवाया है। 'चूल्हा' बनवाया और लिपवाया भी है, उसके लिए हम खेतों से मिट्टी लाए हैं, जिसकी सुगंध आज तक है...। उन्होंने नौकरी नहीं की है, मगर इतने तरह के महीन और मेहनत वाले कार्य आप कर पाएंगे?
अब घरों में मां-बेटे के तौलिए भी अलग हैं। हम बड़े होने के काफी बाद तक कहीं से खेलकर, थककर आने पर तौलिए की जगह मां के आंचल से ही पसीने पोंछते रहे हैं। कई बार तो अब भी। और स्तनपान? अभी एक रिपोर्ट आई है कि भारत की मम्मियां स्तनपान में तीसरे नंबर पर हैं। आपको पता है ? हम वर्षों तक भारत की इस मां के सीने से ही लगकर सोते और जगते रहे हैं। स्तनपान के बाद बछड़ों की तरह सिंग मारते रहे हैं और वह बस मुस्कुराती रही हैं...! हां, अपने पुत्रों के लिए आज भी बहुत कुछ करती हैं मम्मियां लेकिन हम यह भी देख रहे हैं कि उतना बर्दास्त कभी नहीं कर पाएंगी आज की माएं कि खुद भूखी हों, घर में अन्न का दाना न हो तब भी उनका लाडला भूखा न सो पाए।
हां, आज की मम्मी की तरह अम्मा मेरी फ्रेंड नहीं हैं, वह आज भी कल वाली मेरी अम्मा ही हैं जो गलत फ्रेंडशिप से दूर रहने की नसीहत देती हैं और अच्छे दोस्तों के साथ समय बिताने पर मना नहीं करतीं। इस बेटे ने काफी फ्रेंड बनाए हैं लेकिन अपनी अम्मा को अम्मा ही रहने दिया है। इसके बाद भी अम्मा के साथ औपचारिकताएं नहीं निभाते, न हमें आती हैं इसलिए न तो आज हमने विश किया और न ही यदि करते तो वह सुनकर थैंक्यू बोलतीं। वह बह हंस देतीं जैसा कि वह सिर्फ मेरी कॉल चले जाने पर या मुझे देख लेने पर भी करती हैं। मेरा खुश होना ही उनके लिए अशेष शुभकामनाएं हैं और मेरा चिंतित होना ही उनके लिए सबसे बड़ा अशुभ।
और हां, मेरी अम्मा। आज की कुछ मम्मियों के पोस्ट यह भी हैं कि तब कि माएं कुछ बच्चों को सिखाती नहीं थीं...। आज वे अपने बच्चों को सबकुछ सिखा रही हैं— गुड टच—बैड टच भी। जी, यह बिल्कुल आसान है! खुद टीवी देखते हुए कहना कि बेटा टीवी नहीं देखना चाहिए। यह आसान है मोबाइल चलाते हुए कहना कि इससे आंख खराब हो जाएगी। बड़ा आसान है बच्चे को गुड टच, बैड टच बताना...। लेकिन बहुत मुश्किल है बच्चे के लिए इन सबसे खुद को दूर कर पाना, इन सबका त्याग कर पाना। बड़ा आसान है 'लेक्चर' से बताना; बड़ा कठिन है 'प्रैक्टिकल' कर दिखाना। तब की अम्मा ने कभी थ्योरी नहीं पढ़ाई, सच है कि हमें कहकर नहीं सिखाया क्योंकि उन्हें उसे करके बताया और बच्चे नकल बड़ी तेजी से करते हैं; हमने किया और हम सीखते गए।
यह सच है लेकिन उसके आगे भी एक सच है। अम्मा हमेशा अपने आचरण से बताती रहीं कि माएं पुत्रों के लिए क्या करती हैं, पत्नियां पतियों के लिए क्या करती हैं, बहुएं परिवार के लिए क्या करती हैं, स्त्रियां समाज के लिए क्या करती हैं, बहने भाई के लिए क्या करती हैं? और जिस नारी का जीवन ही त्याग की प्रतिमूर्ति हो, उसके लिए हमारा आचरण कैसा हो— यह बताने की भी जरूरत है क्या? हमने जो भी सीखा है, अपनी अम्मा और पापाजी से ही सीखा है और यह भी जान लीजिए कि दोनों ने ही हमें कुछ कहकर कभी नहीं सिखाया है; हमने सबकुछ उन्हें देखकर सीखा है। गुरुजी के आने पर दोनों ही झुक जाते, हम भी झुक जाते। ईश्वर के सामने दोनो ही झुक जाते, हम भी झुक जाते। दोनों हमें पढ़ने भेजते, हम चले जाते। हां, खेलने से मना करते तब भी चले जाते और देर से आने पर थप्पड़ पाते, रोने लग जाते और खुद ही मान भी जाते। अम्मा और पापाजी ने प्यार और कुटाई में पूरा बैलेंस रखा। बस हमने जान लिया कि गलत करो तो कुटाई होती है, सही करो तो तारीफ होती है। सही करने पर धर्म होता है, गलत करने पर पाप होता है और पाप नहीं करना चाहिए।
युग बदला है, नारियां बदली हैं, पुरुष बदले हैं, उनके चरित्र बदले हैं... लेकिन अम्मा और मेरा रिश्ता ठहरा हुआ है उसी बचपन में... जहां अम्मा की अंगुलियां छोड़ी थी; उससे एक पग भी हम आगे न बढ़े हैं। वक्त का साहस नहीं कि वह मुझे मेरे बचपन से निकाल पाए, अम्मा के आंचल से दूर कर पाए इसलिए सबकुछ बदल गया है लेकिन अम्मा वही हैं, हम भी वही हैं, हमारी बातचीत की भाषा वही है, पुट वही है... कुछ न बदला। आज फिर अम्मा के आंचल में बेटा सिमट गया है, यह वक्त वहीं जाकर ठहर गया है...।

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