देश के प्रधान सेवक को देश के मामूली सेवक का पत्र...




प्रधानमंत्रीजी,
नमस्कार।

आज हमें आपसे मन की बात कहने का मन है, बल्कि मन बड़ा उद्वेलित है इसलिए कहना पड़ रहा है। माननीय प्रधानमंत्रीजी, जब आप किसी मंच से सवा सौ करोड़ देशवासियों कहकर संबोधित कर रहे होते हैं तब उसमें एक हम भी संबोधित हो रहे होते हैं, आपको बड़े गौर से सुन रहे होते हैं। बस थोड़ा समय दीजिए और हमें भी गौर से सुन लीजिए। जी, प्रधानमंत्रीजी, हम देश की जनता बोल रहे हैं। सुन लीजिए!

आज आपकी सरकार के एक आदेश ने हमें आपकी सोच के बारे में सोचने पर विवश कर दिया है। आपकी सरकार ने आदेश दिया है कि रमजान शुरू होने से लेकर अगस्त में अमरनाथ यात्रा संपन्न होने तक आतंकियों के खिलाफ संघर्ष अभियान नहीं चलेगा। प्रधानमंत्रीजी, क्या यह निर्णय सही है? क्या यह आदेश देशहित में है? अक्सर मन की बात करने वाले प्रधानमंत्रीजी, मन को साफ कर बताइए, अक्सर चुनावी सभाओं में झूठ बोलने वाले प्रधानमंत्रीजी, बिल्कुल सच बताइए कि यह आदेश क्या वोट बैंक की राजनीति से प्रेरित नहीं है? क्या यह निर्णय कश्मीर में रोज देश के लिए अपनी जान न्यौछावर करने वाले जवानों की शहादत का अपमान नहीं है? क्या यह एकतरफा संघर्ष विराम देश की सुरक्षा के लिए लड़ रहे सैनिकों को मौत के मुंह में धकेलने जैसा नहीं है जबकि किसी भी आतंकी संगठन ने हथियार डालने की घोषणा नहीं की है; उल्टे लश्कर—ए—ताइबा ने डराया ही है?

प्रधानमंत्रीजी, जवानों को निर्देश है कि वे रमजान के महीने में आतंकियों के खिलाफ ऑपरेशन नहीं चलाएंगे। माने क्या करेंगे? आतंकी जब गोलियां चलाएंगे; तब वंदेमातरम कहते हुए शहीद हो जाएंगे क्योंकि आपके लिए उनकी जान से अधिक 2019 में होने वाले चुनाव की फिक्र है? सच बताइए। 56 इंच का सीना है आपका लेकिन उस सीने में दिल—विल तो है ना? धड़कता तो है ना? ​य​ह निर्णय दिल से ही किया है ना? या सत्ता का धूर्त दिमाग, देशप्रेम वाले दिल पर हावी हो गया है? सच बताइए...।

प्रधानमंत्रीजी, अक्सर चर्चा होती है कि आतंक का तो कोई धर्म नहीं होता और यकीनन नहीं होता है क्योंकि हमारी परंपरा है कि हम धर्म को महज किसी मजहब का नाम नहीं समझते हैं; हम धर्म को सत्य का पर्याय समझते हैं और अधर्म को झूठ का, गलत का। इस तरह भारतीय संस्कृति इस बात को सुनिश्चित करती है कि जो गलत है, वह धर्मविरूद्ध है; जो सही है, सिर्फ वही धर्म है। प्रधानमंत्रीजी, धर्म और आतंक का अर्थ स्पष्ट होने के बाद भी जम्मू कश्मीर की मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती से लेकर गृहमंत्री राजनाथ सिंह और उसमें शामिल आप तक के इस निर्णय को हम किस रूप में देखें कि रमजान में आतंकियों के खिलाफ अभियान नहीं चलेगा?

नरेंद्र दामोदारदास मोदीजी, आप अक्सर अपनी सभाओं में पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का जिक्र किया करते हैं फिर तो उनके समय की बातें भी याद होंगी आपको, या भूल गए? इस बात की क्या गारंटी है कि सेना चुप बैठ जाएगी तो आतंकी भी हथियार रखकर रमजान में नमाज पढ़ने बैठ जाएंगे जोकि मंदिरों के साथ मस्जिदों में भी बम विस्फोट करते समय नहीं सोचते? याद कीजिए 18 साल पहले की घटना। 2000 में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी और उन्होंने आतंकियों के विरूद्ध लड़ाकू अभियानों की शुरुआत नहीं करने की घोषणा कर दी थी। उस घोषणा के चार महीनों के दौरान आतंकियों ने श्रीनगर एयरपोर्ट पर बड़ा हमला किया था। लश्कर—ए—ताइबा के छह आतंकियों के हमले में दो जवान और दो नागरिक मारे गए थे और घाटी में सक्रिय सभी आतंकी गुटों ने सरकार के प्रस्ताव को ठुकराया दिया था। आतंकी कश्मीर में खुलेआम घूम रहे थे...। आप बताइए, इस बात की क्या गारंटी है कि हालात फिर से नहीं दोहराए जाएंगे? माननीय, संघर्ष विराम का यह निर्णय लेते समय आपने चाहे अपना सीना 56 इंच से भी अधिक फुलाने की कोशिश की हो लेकिन इसे आपकी बुजदिली ही मानी जाएगी, बहादुरी नहीं। आप बताइए ना कि आतंक के सामने हथियार डाल दिए जाने के आपके निर्णय को किस रूप में देखें जबकि पिछले साल रमजान के दौरान करीब 80 फीसदी हिंसा की घटनाएं हुई थीं और ज्यादातर मुठभेड़ स्थलों पर आतंकियों के बचाव के लिए मुस्लिम नागरिकों को ढाल बनते देखा गया था। आठ अमरनाथ यात्रियों की मौत भी भूल गए क्या? यदि याद है तो फिर अमरनाथ यात्रा यह एकतरफा संघर्ष विराम क्यों?

प्रधानमंत्रीजी, आप देश में इस समय हिंदुत्व के सबसे बड़े चेहरे हैं। कुछ लोग तो आपको हिंदू हृदय सम्राट भी कहते हैं तो बताइए ना कि क्या हिंदुओं के हृदय का सम्राट ऐसा होता है? इस देश में जब महज आरोप लगने पर मन्दिरों में घुसकर, पूजा से उठाकर, घरों में जाकर, सोते से जगाकर भी कई हिन्दू सन्तों को गिरफ्तार करने में पुलिस नहीं हिचकी है जबकि उनमें से कई बाद में बेगुनाह भी साबित हुए, ऐसे में आतंकियों के खिलाफ उनका धर्म देखकर कार्रवाई रोक देना क्या सही है? यह निर्णय आप हिंदू बनकर किए हैं? या सरकार बनकर? सही बताइए, हमें तो यह दोनों में से किसी का नहीं, सिर्फ एक मौकापरस्त नेता का निर्णय लग रहा है। क्या आपने हिंदुओं को खुश करने के लिए भी कभी कोई ऐसा आदेश दिया कि नवरात्र तक किसी अपराधी की गिरफ्तारी नहीं होगी? फिर, हिंदू सम्राट का मुस्लिम प्रेम का यह ढोंग क्यों? सच बताइए, 2019 का चुनाव नजदीक है इसलिए ना!

प्रधानमंत्रीजी, संविधान में धर्मनिरपेक्ष देश है अपना। सभी धर्मों के पर्व—त्योहारों पर उस धर्म के लोगों का विशेष ख्याल किया जाना चाहिए। निश्चित ही, सरकार को ऐसी व्यवस्था की जानी चाहिए कि रमजान में न किसी मुसलमान को दिक्कत हो, न नवरात्र में किसी हिंदू को लेकिन सवाल यह है कि आप कश्मीर के आतंकियों को आतंकी की जगह, मुस्लिम के रूप में क्यों देख रहे हैं? प्रधानमंत्रीजी, जो आतंकी होगा वह क्या रमजान के महीने में अल्हा का नेक बन्दा हो जाएगा? वह जो आतंक को ही धर्म मान चुका है, उसके प्रति यह प्रेम क्यों? माननीय, आपके इस निर्णय से एक तरफ तो देश में यह संदेश जा रहा है कि मुस्लिम आतंकी होते हैं तो दूसरी तरफ यह भी कि मौके जब चुनाव के हों तो आप जीत सुनिश्चित करने के लिए कोई भी दांव चल सकते हैं, भले ही वह देशविरूद्ध हो। आप बताइए ना, जो सरेआम बच्चों पर पत्थर बरसाते हैं, तीर्थयात्रियों को मौत के घाट उतार रहे हैं, जिनके हाथ असंख्य कश्मीरी पंडितों के खून से रंगे हैं, जो हर धर्म वालों को मिटाकर सिर्फ अपना कथित जिहाद जिंदा रखना चाहते हैं, वे आपको रमजान पर नमाज पढ़ने वाले लगते हैं क्या? वे आपको पत्थरबाज, आतंकी नहीं, बल्कि मुस्लिम दिखते हैं क्या? वे जब किसी निर्दोष नागरिक या देश की सुरक्षा में लगे कर्तव्यनिष्ठ जवान को मारने के बाद यदि हथियार रखकर नमाज भी पढ़ रहे होंगे, तब क्या कश्मीर कल्याण- देश कल्याण की दुआ मांग रहे होंगे? बिल्कुल नहीं! वे आतंक कायम रहे की बात ही दोहरा रहे होंगे... ।

प्रधानमंत्रीजी, हम देश के नागरिक हैं, देश के सेवक हैं लेकिन आप तो प्रधानसेवक हैं फिर आपकी सेवकाई में इतना दोष क्यों? आप तो सरकार हैं, आपके पास आतंक के सबसे पुष्ट आंकड़े हैं, फिर सुरक्षा से समझौता क्यों? आतंकवादियों के प्रति यह दरियादिली क्यों? 1990 में जबसे कश्मीर में आतंक का दौर शुरू हुआ, तब से अब तक 13978 नागरिकों की आतंकी हमलों में जान जा चुकी है। यह जानकारी आपही की सरकार ने हालही में एक आरटीआई कार्यकर्ता रोहित चौधरी को दी है। इसमें गृह मंत्रालय ने माना है कि आतंकी हमलों में 5123 सुरक्षाकर्मियों की जान भी गई है। प्रधानमंत्रीजी, यकीन नहीं होता कि आप महज सत्ता के लालच में 5123 जवानों की जान का इस तरह सौदा करेंगे...। विनती है कि कृपया वोट के लिए देश का सौदागर बनने से बचिए।

प्रधानमंत्रीजी, 2014 के लोकसभा चुनाव के समय आपकी कई रैलियों में हमने आपको सुना था। तब हम छपरा में थे। हमें याद है कि कांग्रेस की सरकार थी और जवानों की हत्या के बाद आतंकी उनके सिर काट ले गए थे। छपरा स्थित एयरपोर्ट के मैदान पर आप गरज रहे थे कि यदि मेरी सरकार आई तो किसी जवान का सिर काटना तो दूर, उसकी तरफ कोई आंख उठाकर भी नहीं देख सकेगा। सच बता रहे हैं, आपका भाषण सुनकर मेरे अंदर देशप्रेम का रक्त प्रवाह अचानक बढ़ गया था। देशप्रेम रगों में तेजी से दौड़ने लगा था। जवानों के साथ हुई उस नाइंसाफी और उसके बाद मौन—मनमोहन सरकार पर हमें भी बहुत गुस्सा आया था और तब हमने मन ही मन तय किया कि आपको जरूर वोट देंगे। देश में ऐसी मजबूत सरकार लाएंगे जो आतंक का नामोनिशान मिटा दे और देश के अंदर हम नागरिक ही नहीं, सीमा पर हमारे जवान भी सुरक्षित रहें। यूपी से होने और बिहार में होने के कारण हम वहां के वोटर नहीं थे। सिर्फ आपको वोट देने के लिए हमने अपनी पत्रकारिता की तमाम पैरवियां लगा दीं, अपने तमाम परिचितों से आग्रह किया और वोटरलिस्ट में नाम जुड़वाए। हमने वोट किया लेकिन आज आपने उसी भावना पर चोट किया। आज हम आहत हैं कि ये हमने किसे चुन लिया? अखिल भारत में सिर्फ भाजपा का परचम लहराने वाले एक प्रचारक को? सरकार बनाने के लिए चुनावी सभाओं में झूठ बोलने वाले को? हम जैसे राष्ट्रप्रेमी नागरिकों को भरमाने के लिए सभाओं में 56 इंच सीना फुलाने वाले को और देश की तमाम समस्याओं के मोर्चों पर सीना सिकुड़ा लेने वाले को? कश्मीर में पंडितों को बसाने का वादा कर, रोहिंग्याओं को बसाने वाले को? आतंक को धर्म समझने वाले को? या सत्ता को ही अपना सर्वस्व समझने वाले को?

प्रधानमंत्रीजी, आपने आतंक पर मनमोहन के मौन से हमें डराया था और हमारा वोट पाया था लेकिन अभी आप क्या कर रहे हैं? आपके शासनकाल में बीते तीन वर्षों में जम्मू-कश्मीर में पत्थरबाजी की 4,799 घटनाएं हुईं जिनमें दो सुरक्षाकर्मियों की मौत भी हो गई। गौर कीजिए कि आपकी सरकार ने ही राज्यसभा में यह आंकड़ा दिया था। लिखित सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री हंसराज अहीर ने कहा था कि 2015 में पत्थरबाजी की 730, 2016 में 2,808 और 2017 में 1,261 घटनाएं दर्ज की गई हैं। बताइए ना, यह कब थमेगा? और यह भी बताइए ना कि आप इन घटनाओं पर मौन क्यों हैं? जबकि बाकी सभी मुद्दों पर बोलते हैं? यह भी बताइए कि इसके लिए कौन दोषी है, क्योंकि देश की सारी समस्याओं के लिए आप बताते हैं कि कौन दोषी है...।

प्रधानमंत्रीजी, कहां तो आतंक मिटाने का वादा था और कहां आप उससे ही गठजोड़ कर बैठे। आपके होते हुए जम्मू कश्मीर सरकार ने पत्थरबाजी के 9,730 मामले वापस ले लिए और आप देखते रहे? प्रधानमंत्रीजी, यह मेरे आंकड़े नहीं हैं, यह जानकारी मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने विधानसभा में दी थी और वह भी लिखित में। दो साल में पत्थरबाजी की छोटी घटनाओं में शामिल 4000 से ज्यादा लोगों के लिए माफी की सिफारिश की गई है। पत्थरबाजों और उनके परिवार की सुरक्षा के लिए पहली बार आरोपियों की पहचान उजागर नहीं की गई है। यह क्या है? पत्थरबाजों और उनके परिवार की सुरक्षा? अरे, वादा तो नागरिकों की सुरक्षा का था ना! सच बताइए, पत्थरबाजों से लेकर आतंकियों तक पर आपका दिल कब आया? अब तो आपकी सरकार को पत्थरबाजों पर पैलेट गन से वार करना भी अच्छा नहीं लगता, क्यों सच है ना? सुना है कि पैलेट गन नहीं, अब पत्थरबाजों पर घाव नहीं करने वाली प्लास्टिक की बुलेट चलाई जाएंगी? सवा सौ करोड़ नागरिकों की समस्याओं, उनके दर्द से जो आहत नहीं हैं, उनके दिल में पत्थरबाजों के लिए इतना दर्द क्यों है? बताइए ना!

प्रधानमंत्रीजी, वादा तो यही था ना कि यदि एक जवान भी मरा तो आप दस मारेंगे? और हकीकत क्या है? साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल तो आप जान ही रहे हैं ना! पंजाब के पूर्व जांबाज पुलिस अफसर केपीएस गिल ने इसे शुरू किया था। पोर्टल की रिपोर्ट साफ कह रही है कि सुरक्षा बलों की जम्मू कश्मीर में और नियंत्रण रेखा, अंतरराष्ट्रीय सीमा पर शहादत बढ़ रही है। आपका केन्द्रीय गृहमंत्रालय तो इतना घबराता है कि शहादत का आंकड़ा ही नहीं बताता। मंत्रालय की रिपोर्ट में 2011-13 के दौरान 239 और 2014-2017 के दौरान 368 आतंकियों के मारने का दावा है लेकिन सुरक्षा बलों की शहादत की संख्या का आंकड़ा नहीं है। हां, साऊथ एशिया टेररिज्म पोर्टल पर इसके भी आंकड़े हैं। इसकी रिपोर्ट में साफ है कि पहले एक सुरक्षा बल का जवान शहीद होता था तो तीन आतंकी मारे जाते थे और अब एक जवान की शहादत पर दो आतंकी मारे जा रहे हैं। आम नागरिकों के मारे जाने का अनुपात करीब-करीब जस का तस है। पिछले साल 28 मई तक 25 नागरिक जम्मू-कश्मीर में हिंसा-आतंकवाद की भेंट चढ़े, 25 जवान शहीद हुए और आतंकी मारे गए 60। यानी दो आतंकियों को मारने के लिए एक जवान को मरना पड़ रहा है...। क्या खाक आप जवानों की चिंता कर रहे हैं?

प्रधानमंत्रीजी, हम ढूंढ रहे हैं, उस शख्स को जो 2014 के चुनाव के समय दिखा था। हमें बताइए कि चुनाव के दौरान आतंक के खिलाफ गरजने वाला वह शेर बचा भी है या मर गया? और इन चार वर्षों के बीच की वह तारीख भी बताइए, जब सत्ता के लिए आतंक से समझौता करने वाला यह बुजदिल पैदा हुआ? प्रधानमंत्री जी, किसी निर्दोष व्यक्ति को धर्म के आधार पर निशाना बनाना जितना गलत है, उतना ही गलत है उसके धर्म को देखकर उसके अपराध, आतंक को शह देना। इस तरह धर्म, जाति के आधार पर किसी का आतंक, अपराध बर्दास्त करने का चलन चल पड़ा तो हर राज्य में कश्मीर जैसे हालात होंगे। आग्रह है कि यह आदेश तत्काल रदद् कीजिए। आतंक मिटाने का अपना वादा पूरा कीजिए, नहीं तो चूड़िया ही पहन लीजिए; ताकि जब शहीदों की विधवाएं अपनी चूड़ियां तोड़ रही होंगी तब आप अपनी चूड़ियां खनकाते रहिएगा...।

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