यहां मोहब्बत खून मांगती है
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| मोहब्बत कर मौत के अंजाम तक पहुंची सूब्बी- फाइल फोटो |
एक पिता ने झूठी शान के लिए न सिर्फ अपने ही खून का खून कर दिया बल्कि पुत्री के प्रेमी को फसाने के लिए अपनी ही बेटी के कपड़े तक फाड़ डाले ताकि उसे बलात्कार के बाद हत्या कहकर उस जुर्म में उसके प्रेमी को जेल भिजवा सके। परंतु गांव वालों की मुखबीरी के कारण शशिशेखर कल यानी 2 सितंबर को पकड़े गए और अब जेल में हैं। आखिर क्या मिला उन्हें ? पकड़े जाने के बाद शशिशेखर ने पुलिस व मीडिया के सामने बयान दिया कि उन्होंने आन-बान-शान के लिए अपनी बेटी की हत्या कर दी। लेकिन, क्या वे कह सकेंगे कि उनकी वो आन-बान-शान जिसके लिए उन्होंने अपनी ही बेटी का खून कर दिया, अभी बची है? अपनी ही पुत्री की हत्या करने में कौन-सी शान है? अभी वे जेल में बंद हैं तो उन्हें कौन से इज्जत मिल रही है? बेटी के प्रेमी को फंसाने के लिए वे इस हद तक गिर गए कि अपनी हही जवान बेटी की लाश को निर्वस्त्र कर दिया, क्या समाज थूकेगा नहीं यह सब जानकर ? झूठी शान में अंधे होकर वे सिर्फ एक हत्यारे बनकर रह गए। वे न तो अपनी पुत्री के पिता बन सके और न ही समाज के एक इज्जतदार व्यक्ति।
आनर किलिंग के इस मामले, या किसी भी मामले में हमें यह समझ में नहीं आता कि जिस सम्मान की खातिर अपने ही खून का लोग खून कर देते हैं, वह सम्मान उन्हें कहां मिलता है? ऐसा आचरण करने वाले माता-पिता से भी बड़े गुनाहगार क्या उनके बच्चे हैं जो मोहब्बत करते हैं? क्या ऐसे पिता जवाब देंगे कि मोहब्बत बड़ी जुर्म है या फिर हत्या? अपने प्रेमी के साथ किए वादे निभाने के लिए घर से बेटी का भागना बड़ा पाप है या अपनी झूठी शान के लिए पिता द्वारा उसका खून कर देना? यदि एक बार मोहब्बत को खता भी मान लें तो यह गलती बच्चे करते हैं, यह उनका बचपना हो सकता है। मगर, ऐसे अभिभावकों को क्या कहें जो उनकी गलती की सजा देने के लिए उनसे भी बड़ा गुनाह करा डालते हैं? समाज में यदि मोहब्बत करने वाले की सजा मौत है तो फिर मोहब्बत में मौत देने वाले की सजा क्या हो?
हाल के दिनों में सामाजिक बदलाव तेजी से हुए हैं। काफी स्वच्छंदता-स्वतंत्रता का भाव जगा है। इस माहौल से किशोर-युवा सबसे अधिक प्रभावित हैं और प्रभावित हो रहे हैं। यदि इस स्वच्छंद माहौल में वे कुछ गलतियां करते हैं तो इसे समझने की जरूरत है। वे क्यों बहक रहे हैं, यह जानने की जरूरत है? यह विचार करने की जरूरत है कि उन्होंने अपने लिए जो साथी चुना है वह उनके योग्य है या नहीं? यदि है तो उसे स्वीकारने में हमारी शान आड़े नहीं आनी चाहिए और यदि नहीं है तो अपने बच्चे को समझाने की आवश्यकता है। सिर्फ इसलिए कि बच्चे ने अपना जीवनसाथी खुद चुन लिया या फिर वह किसी और जाति का है, उनका प्रतिरोध नहीं होना चाहिए। कोई भी कदम उठाने के पहले यह सोचने की जरूरत है कि हमारे लिए हमारे पुत्र-पुत्री की खुशी ज्यादा जरूरी है या समाज में मिली झूठी शान? और सबसे बड़ी बात तो यह कि समाज की वह शान भी हम कायम नहीं रख पाते, भावुकता में कुछ ऐसे कदम कदम उठा डालते हैं कि हम सिर्फ खोते ही हैं- पाते कुछ भी नहीं।

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