श्रावण की पहली सुबह हर-हर महादेव से गूंजे मनुष्‍यालय से शिवालय तक


श्रावण के पहले दिन छपरा शहर के धर्मनाथ मंदिर में जलाभिषेक करती श्रद़धालु महिलाऍं

सूरज की पहली किरण अभी धरती को स्पर्श करने को मचल ही रही थी, सुबह भी अलसायी-अलसायी-सी थी..। परंतु, आस्था में डूबा जनमानस से अन्य दिनों की तरह आज पूजन-अर्जन के लिए सूर्योदय की प्रतीक्षा भी लंबी और असहज प्रतीत होने लगी थी। होती भी कैसे नहीं? शिवभक्ति तो तन-मन में, नींद टूटने के साथ ही प्रस्फुटित हो चुकी थी। आस्था भला किसी का इंतजार करती है? बस उमड़ पड़ी..।
04 जुलाई, बुधवार, पवित्र श्रावण का पहला दिन। आस्था से ओतप्रोत भक्तों के घरों के किवाड़ की कौन कहे, देवों के आलयों के पट भी वक्त से पहले खुल गए और इसी के साथ मंदिरों के बाहर प्रतीक्षारत भक्त मंदिरों में प्रविष्ट हो गए। मंदिरों में प्रविष्ट होने के साथ ही भक्तों के अंदर, सावन के साथ प्रविष्ट हुई शिवभक्ति बाहर उमड़ पड़ी और शिवजी का अभिषेक आरंभ हो गया। गंगा जल, गाय का दूध, जिसे जो सुलभ था, उसके हाथ में पकड़े पात्र से वह द्रव्य शिव जी को प्राप्त होने लगा था। छपरा शहर स्थित धर्मनाथ मंदिर, जिस पर सारण जिलेवासियों की असीम आस्था है, श्रावण के प्रथम दिन भक्तों की होने वाली भीड़ के अनुरूप रात्रि में ही तैयार हो चुका था। धर्मनाथ मंदिर ही क्यों? जिले के ढोढनाथ मंदिर, शिलनिधि मंदिर (शिल्हौड़ी मंदिर), हरिहरनाथ समेत सभी शिवालय, देवालय भक्तों के लिए पूर्व से ही तैयार थे और जैसे ही शिव भक्तों ने इन मंदिरों में प्रवेश किया, मंदिरों के साथ ही आस-पास के वातावरण में शिवभक्ति घुल-मिल गयी और इसी के साथ हर-हर महादेव व बोलबम की गूंज से हर क्षेत्र, शिवधाम बन गया।
जैसे-जैसे सुबह का आलस्य मिटता गया, मंदिरों का परिसर शिवभक्तों से भरता गया। धुंधली से साफ होती सुबह और फिर दोपहर, शाम.. सब शिव भक्तों की भक्ति के साक्षी बने। सुबह-सुबह सूर्य से प्रस्फुटित किरणों ने भी जैसे धरती को स्पर्श करने से पहले शिवालयों के शिखरों को चूमा, उसके फर्श को नमन किया और फिर शिवभक्तों को पुलकित किया। शिव को सूर्य का नमस्कार होते ही जैसे इन्द्र भी जागे और किसानों के लाख आग्रह-निवेदन के बाद भी अपनी कृपा न बरसाने वाले इन्द्र ने बादलों से निकल भोलेनाथ का अभिषेक किया। सुबह-सुबह ही बारिश की इन झीनी-झीनी बूंदों ने शिवालयों के साथ ही शिवभक्तों को भी भिंगोया। यद्यपि, बारिश थोड़ी ही देर रही तथापि, शिवभक्तों की यह भावना और भी सबल हो गई कि हर पुण्य कर्म के साथ बारिश होती है तथा कुछ ही बूंदें यह भान करा गई कि शिवभक्तों पर उनके भोलेनाथ प्रसन्न हैं।
सावन के पहले दिन शिव के अभिषेक के साथ ही पवित्र श्रावण मास की पवित्रता वातावरण को पवित्र बना रही है। यूं तो श्रावण का हर दिन अब भक्तों की भक्ति की कहानी कहेगा, किंतु श्रावण के सोमवार की विशेष महत्ता के कारण इस दिन की विशेष पूजा की तैयारी आज ही से शिवालयों में शुरू हो गई है। प्रथम सोमवार को उमड़ने वाली असंख्य भक्तों की भीड़ को देखते हुए धर्मनाथ मंदिर में विशेष तैयारी की जा रही है। भक्तों की सुविधा व सुरक्षा के भी प्रबंध किए जा रहे हैं। पहले दिन ही भक्तों की उपस्थिति से मेला में परिवर्तित स्थल को देखने के बाद सोमवार को लेकर मंदिर प्रबंधन ने खास प्रबंध शुरू कर दिया है। प्रशासन को भी सोमवार, 9 जुलाई को धर्मनाथ मंदिर के सामने से गुजरने वाले पथ पर यातायात व्यवस्था को सुचारू कर पाना और शिव भक्तों को सुरक्षा दे पाना चुनौती भरा कार्य होगा। सोमवार के अभिषेक को लेकर भक्तों ने भी विशेष तैयारी की है। जिले के हजारों भक्त अभी से ही बाबा वैद्यनाथ की यात्रा पर निकल गए हैं ताकि सोमवार का विशेष जलाभिषेक का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हो सके। अमरनाथ जाने वाले भक्तों का जत्था भी यहां से प्रस्थान कर रहा है। इसे लेकर छपरा जंक्शन के साथ ही छोटे-छोटे सभी स्टेशनों, बस स्टैंडों पर भीड़भाड़ बढ़ गयी है। बाबा की नगरी जाने वाले भक्त आराम करने के क्रम में शहर के चौक-चौराहों पर दिखने लगे हैं।
श्रावण मास में शिव की आराधना करने वाले और शिवधाम जाने वाले भक्तों के लिए पवित्रता को आवश्यक बताते हुए पं. सुभाष पांडेय कहते हैं कि कांवर लेकर बाबाधाम जाने वाले भक्त तन-मन शुद्ध रखें। ज्योतिष में कांवर यात्रा को छोटी यात्रा की संज्ञा दी गयी है। कांवर यात्रा में सड़क यात्रा से केतु ग्रह सुफल देता है। वहीं इस दौरान पीले वस्त्र धारण करने से वृहस्पति देव प्रसन्न होते हैं। तीर्थो का जल भरकर लाने से चन्द्र देव की कृपा मिलती है। वहीं यात्रा में शुद्ध सात्विक आचरण और मर्यादित रहने से शनि और राहु प्रसन्न होते हैं। माता-पिता और बुजुर्गो को सम्मान देने और परंपरा निभाने से सूर्य देव और पितृ देव प्रसन्न होते हैं। अच्छा बोलने से वाणी के देवता बुध और शुक्र प्रसन्न होते हैं। कांवर से केवल शिव ही नहीं त्रिदेव भी प्रसन्न होते हैं। ऊं नम: शिवाय, महामृत्युंजय मंत्र और रूद्राष्टाध्यायी के मंत्र जाप करते हुए भगवान शिव का अभिषेक करें। कांवर यात्रा के दौरान भी शिव मंत्रों का जाप दोगुना फल देता है।

(हमारी इस खबर को आप पटना से प्रकाशित दैनिक जागरण के आज के अंक में भी देख सकते हैं। अथवा, इसे दैनिक जागरण की वेबसाइट पर भी पढ़ा जा सकता है- http://www.jagran.com/bihar/saran-9436060.html)

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