... अपना के दारा सिंह बुझ$ताड़$ ... ?


दारा सिंह रन्धावा, जन्म: 19 नवम्बर, 1928 पंजाब, मृत्यु: 12 जुलाई 2012 मुम्बई

13 जुलाई को सभी अखबारों की सुर्खियों में जो खबर थी, उसने हमें अंदर तक झकझोर कर रख दिया। स्‍वीकार नहीं कर पा रहे थे कि ऐसा हो सकता है जबकि हम जानते थे कि यह तो होना ही था। खबर दारा सिंह से संबंधित थी। वे 12 जुलाई की सुबह साढ़े सात बजे मुम्बई स्थित अपने निवास "दारा विला" के साथ ही इस दुनिया और हम जैसे प्रशंसकों को हमेशा के लिए छोड़कर चले गए थे।

दारा सिंह नाम से परिचय हमें बचपन में ही हो गया था लेकिन उस नाम के व्‍यक्तित्‍व को हम नहीं जानते थे और न ही यह जानते थे कि हमारे गॉंव में क्‍यों किसी को लोग कभी-कभी दारा सिंह कहकर पुकारते हैं, कभी प्‍यार से तो कभी झगड़े में..। एक पिता, दादा अपने पुत्र, पौत्र को प्रेम करते वक्‍त कहता-  "इ दारा सिंह होई...। इ कउनो मामूली लइका थोड़े बा..।" प्‍यार से अपने बेटे के लिए किया गया दारा सिंह का संबोधन जब किसी और के लिए झगड़े में होता तो कुछ इस तरह होता- "का रे, अपना के दारा सिंह बुझ$ताड़े का?" हमें याद है, कई बार अपने गॉंव के सरकारी प्राथमिक पाठशाला से लौटते वक्‍त जब अपने ही दोस्‍तों से झगड़ा होता तो हमने भी कई बार, कईयों को कहा था- "ढेर कूद$ मत, हुकेम त दिमागे सही हो जाई, अपना के दारा सिंह बुझ$ताड़$...?"

तब रामानंद कृत रामायण का खूब जलवा था। गॉंव में एक ही व्‍यक्ति के घर टीवी था। रामायण के प्रसारण वाले दिन उस घर के लड़के-लड़कियों का भाव सातवे आसमान पर होता और हम सब भी उन्‍हें खूब भाव देते थे। सुबह से ही उन्‍हें पटाने में लग जाते कि हम आएंगे रामायण देखने। दूसरे गॉंवों से भी भारी संख्‍या में महिलाएं, पुरुष, बच्‍चे रामायण देखने पहुँच जाते। उस दिन टीवी घर के अंदर से निकालकर द्वार पर एक टेबल पर रख दिया जाता, सामने सैकड़ों की भीड़ पालथी मारकर पहले ही अपना स्‍थान ले लेती। गॉव में बिजली नहीं थी और टीवी बैट्री से चलता था। इसलिए ठीक प्रसारण के समय ही टीवी खुलता, तब तक लोग चुपचाप बैठकर उस समय का इंतजार करते थे। गजब का था सबकुछ...। एक दिन लोगों की भीड़ से तंग आकर टीवी मालिक ने दर्शकों को खूब भला-बुरा कहा था। आज भी हम याद कर घर में हँसते हैं कि तब टीवी का और टीवी वाले का क्‍या भाव होता था..।
सप्‍ताह में एक दिन रामायण का प्रसारण दूरदर्शन पर होता था, दिन याद नहीं आ रहा। हम सब उस दिन का बेसब्री से इंतजार करते थे। हम यानी सिर्फ बच्‍चे ही नहीं, गॉंव की महिलाऍं, लड़कियॉं, बूढ़े.. सभी को उस दिन का इंतजार रहता जब रामायण की अगली कड़ी देखने को मिलेगी। जब टीबी के सामने लोग रामायण बैठने देखते तो ऐसा लगता, जैसे वे पूजा पर बैठे हों। मनोरंजन से अधिक श्रद़धा का भाव होता। इसे लोग कभी धारावाहिक समझे ही नहीं थे, एक-एक पात्र पूजित था लोगों के दिलों में, राक्षसों के प्रति अपार घृणा थी..। प्रसारण वाले दिन हर घर में एक अजीब-सी हलचल रहती। और दिनों काम से जी चुराने वालीं लड़कियॉं अपनी मॉं का हर काम में ऐसे हाथ बँटाती कि उन्‍हें देखकर यकीन नहीं होता कि वे कभी मॉं का कहा नहीं मानती होंगी। और दिनों देर रात तक गॉंव के चौपाल में देश-दुनिया की समस्‍या पर घंटों बोलते रहने वाले पुरुष्‍ा, जो देर रात तक खाना खाने के लिए अपने घर की महिलाओं को इंतजार करवाते थे, उस दिन बिन बुलावे, घर पहुँच पीढ़ा लेकर बैठ जाते पालथी मारकर। साथ में घर के सभी बच्‍चे भी खाने पर बैठ जाते और फिर खाते वक्‍त- "केतना बजल?"। चौका में बैठीं महिलाऍं तो जैसे घड़ी ही देख रही होतीं, बोल पड़तीं- "खाईं आराम से, अभी टाइम बा..।" टाइम बा, यानी रामायण के प्रसारण का अभी वक्‍त नहीं हुआ है।
रामायण के सभी पात्र लोगों के दिलों में अंदर तक उतरते थे लेकिन एक पात्र हम बच्‍चों के लिए बेहद प्रिय था। रात में जिस दिन रामायण देखकर सोते, सुबह स्‍कूल जाते समय रास्‍ते में ढिसुम-ढिसुम, बस्‍ता को ही गदा बनाकर- जय श्री राम...। खूब मजा आता..।
इतना कुछ होने के बाद भी हम यह नहीं जानते थे कि रामायण के उस विशेष पात्र, हम बच्‍चों के उस प्रिय पात्र हनुमान जी का रोल कौन करता है, और ना ही यह जानते थे कि दारा सिंह, जो कि गॉंव की कहावतों में हैं, वे कौन हैं? हम दारा सिंह को भी सुनते थे और हनुमान जी को भी देखते थे लेकिन यह जानने में काफी वक्‍त लग गया कि रामायण के हनुमानजी और गंवई कहावतों के दारा सिंह एक ही शख्‍स है- तब हम बच्‍चे नहीं रहे थे।
अखबार के पहले पन्‍ने पर उसी दारा सिंह के निधन की खबर ने हमें एक बार फिर बचपन में ला खड़ा कर दिया और बचपन की वो यादें फिल्‍म बनकर दिमाग में साकार हो गई। बचपन में हम रूस्‍तमे हिंद को नहीं जानते थे, लेकिन दारा सिंह को खूब समझते थे। नहीं जानते थे कि उन्‍होंने 500 कुश्तियां लड़ी और कभी नहीं हारे, लेकिन यह जानते थे कि जिस किसी का भी नाम दारा सिंह होता है वह हारता नहीं है।

वे अब इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन हमारे बचपन की यादों के साथ हमेशा जीवित रहेंगे। रामायण के हनुमान जी को सादर प्रणाम और दारा सिंह जी को हमारी श्रद़धांजलि...।  

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट