इसे गिरफ़तारी कहते हैं तो अपहरण किसे कहते हैं... ???

लगातार पुलिस-पब्लिक मित्र की बातों के बाद भी पुलिस की छवि यदि नहीं सुधर रही है तो इसके लिए कोई और नहीं, खुद पुलिस जिम्‍मेवार है। पुलिस की हरकतें उसे जनता का मित्र बनने से खारिज करती हैं। पुलिस इस मायने में मित्र कही जा सकती है कि वह बुराइयों से बचाती है, एक सच्‍चा मित्र भी हमें बुराइयों से बचने की सीख देता है लेकिन, जब पुलिस किसी को बेवजह गिरफ़तार कर लें तो.. ? पुरानी कहावत है कि पुलिस वाले किसी का मित्र नहीं होते, वर्तमान में सरकार द्वारा लाख प्रयास सिर्फ इसीलिए किए जा रहे हैं कि जनता पुलिस को अपना मित्र समझने लगे, लेकिन कहावतें यूं ही नहीं बनती हैं, पुलिस आज तक उसी भूमिका में है - वह किसी की मित्र नहीं हो सकती। बिहार के सारण जिले के बनियापुर थाना क्षेत्र से एक व्‍यक्ति को यूपी की पुलिस आई और लेकर चली गयी। उसके घर वालों को यह भी नहीं बताया गया कि उसे क्‍यों ले जाया जा रहा है। और तो और, खुद गिरफ़तार व्‍यक्ति को पता नहीं था कि उसे क्‍यों गिरफ़तार किया गया। उसे सादे वेशधारी दो व्‍यक्ति जबरन अपनी मोटरसाइकिल पर बिठाकर चलते बने। प्रत्‍यक्षदर्शी इस तरीके को क्‍या समझें? गिरफ़तारी? या अपहरण? भला, गिरफ़तारी का यह कोई तरीका है...? इन तरीकों से तो यही लगता है कि मानवाधिकार का मतलब अब तक इन पुलिस वालों की समझ में नहीं आया है, या फिर ये इसे समझने नहीं चाहते और खुद को हमेशा "पुलिस वाला गुंडा" की भूमिका में ही रखना पसंद करते हैं।
24 जून की शाम बनियापुर थाना क्षेत्र के कटसा गांव में यूपी की बलिया जीआरपी पुलिस पहुंची और गांव के 35 वर्षीय युवक पंकज कुमार को उठाकर लेती गयी। उसकी गिरफ़तारी इस तरीके से की गयी, कि प्रत्‍यक्षदर्शियों और परिजनों ने समझा कि उसका अपहरण हो गया और वे परेशान हो गए। अपने स्‍तर से तहकीकात के बाद 25 जून को थक-हारकर परिजन बनियापुर थाना पहुंचे पंकज के अपहरण की एफआईआर दर्ज कराने। परिजनों ने बताया कि बिना किसी को कुछ बताए पंकज को दो लोग उठाकर मोटरसाइकिल पर बिठाकर चले गए। परिजनों ने यह भी जानकारी दी कि जब पंकज के मोबाइल नंबर पर उन लोगों द्वारा संपर्क किया जा रहा था तो फोन कोई और रिसीव कर रहा था और उधर से भद़दी गालियां दी जा रही थीं। फोन पर खुद को पुलिस बताते हुए लोग यह कह रहे थे कि उसे मोतिहारी थाना लाया गया है तो कभी यह कहते कि छपरा नगर थाना में उससे पूछताछ चल रही है। इसी से परिजनों को उसके अपहरण की आशंका और पुख्‍ता हो गई। पुलिस द्वारा गिरफ़तार किए जाने की बात पर बनियापुर पुलिस का माथा ठनका और थानाध्‍यक्ष रघुनाथ प्रसाद ने इसकी तहकीकात शुरू की तो पता चला कि यूपी के बलिया जिला की जीआरपी पुलिस यहां एक अभियुक्‍त संजय श्रीवास्‍तव की खोज में आयी थी लेकिन भ्रम वश वह पंकज को लेती गयी। थानाध्यक्ष रघुनाथ प्रसाद ने तत्‍काल पंकज को यूपी से लाने के लिए प्रशिक्षु दारोगा सतीश कुमार को भेजा। तब जाकर परिजनों की जान में जान आयी और स्‍पष्‍ट हुआ कि पंकज का अपहरण नहीं हुआ है। यह मामला पुलिस की कार्यशैली के बारे में बहुत कुछ सोचने पर विवश करता है। सरकार लाख पुलिस-पब्लिक मित्रता की दुहाई देती रही, लेकिन ऐसे मामले जब तक आते रहेंगे, पुलिस को पब्लिक कभी अपना मित्र नहीं मान सकेगी।

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