भारतीय रेलवे : यात्रा "मुस्‍कान" के साथ... ???

भारतीय रेलवे का एक स्‍लोगन है- यात्रा मुस्‍कान के साथ। जब भी किसी रेलवे स्‍टेशन पर इस स्‍लोगन पर हमारी नजर जाती है, अनायास ही मुस्‍कान तैर जाती है- इस स्‍लोगन पर। एक तरफ यह स्‍लोगन और दूसरी तरफ भारतीय रेलवे के यात्रा की सच्‍चाई। कितना विरोधाभास है? फिर, भी कितने शान से भारतीय रेलवे हैके सभी स्‍टेशनों पर यह स्‍लोगन लटका रहता है। काश! यह स्‍लोगन सच होता और भारतीय रेल की यात्रा मुस्‍कान लिए संपन्‍न हो जाती। 
कल ही की बात है। एक शादी समारोह में भाग लेने मौसी चंडीगढ़ से छपरा आई थीं। हम छपरा में हैं, तो इतनी तो जिम्‍मेदारी हमारी बनती ही है कि उन्‍हें रेलवे स्‍टेशन तक छोड़ने जायें। गए भी। हरिहरनाथ एक्‍स. से अंबाला के लिए उनका रिजर्वेशन टिकट था। छपरा से ट्रेन खुलने का समय टिकट पर ही दिया था- 10.20 बजे। हम उनके साथ छपरा जंक्‍शन पर सुबह 9.30 बजे ही पहुँच गए। पहुँचते ही पहले इन्‍क्‍वायरी गए और वहां बोर्ड पढ़ा- हरिहरनाथ एक्‍स.- समय से, प्‍लेटफार्म संख्‍या 01। मौसी के दो छोटे बच्‍चे ऐडी (10 साल) और मैडी (04 साल) भी उनके साथ थे। जब हमने उनसे कहा कि चलिए अच्‍छा है ट्रेन एक नंबर प्‍लेटफार्म पर ही आएगी तो उनके साथ-साथ बच्‍चे भी खुश हो गए कि सीढि़यां चढ़कर 2 या 3 नंबर प्‍लेटफार्म पर नहीं जाना पड़ा। इसलिए भी खुश हो गए कि ट्रेन समय पर है...। 
हम ट्रेन के इंतजार में प्‍लेटफार्म पर बैठकर बात ही कर रहे थे कि अनाउंस हुआ- ... हरिहरनाथ एक्‍स. प्‍लेटफार्म संख्‍या 2 पर आ रही है...।  हम फौरन इन्‍क्‍वायरी के पास गए, बोर्ड देखा तो एक कर्मी प्‍लेटफार्म सं. 01 को मिटाकर वहां 02 लिख रहा था। चूंकि ट्रेन आने की सूचना हो गई थी, बहस करने का कोई फायदा नहीं था। हम लोग सीढि़या चढ़कर प्‍लेफार्म सं. 02 पर पहुँचे। सबने कुछ न कुछ सामान उठा रखा था। यहाँ तक कि 04 साल का मैडी भी पानी के दो बोतल हाथ में लेकर चल रहा था। हम सब के साथ सैकड़ों यात्री, जिन्‍हें इस ट्रेन से जाना था, वे भी अपने सामान के साथप्‍लेटफार्म संख्‍या 02 की ओर दौड़ रहे थे। अफरातफरी मची थी...। 
हम सब सीढि़यॉं उतरकर प्‍लेटफार्म 02 पर कदम रखे ही थे, फिर अनाउंस हुआ- ... तकनीकी कारणों से हरिहरनाथ एक्‍स. प्‍लेटफार्म संख्‍या 02 की बजाय 01 पर आ रही है..। ऐडी चौंक गया- ऐसा भी होता है कहीं? अभी तो 02 नंबर बोला था, फिर 01 नंबर? हम इन्‍क्‍वायरी की इस हरकत पर थोड़ा भी नहीं चौके थे और न ही चौके थे वे सैकड़ों यात्री जो हमारे साथ ही प्‍लेटफार्म सं. 02 पर पहुँचे थे। हमारी तरह वे भी बड़ी भारतीय रेलवे में होने वाली ऐसी छोटी-छोटी बातों से वाकिफ थे लेकिन बच्‍चों के लिए यह नया था। हाँ, परेशानी सबकी बढ़ गई थी- चौंकने वाले की भी, और नहीं चौंकने वाले की भी। सब पुन: आनन-फानन में सीढि़यॉं चढ़ने लगे। साथ ही भारतीय रेलवे और छपरा जंक्‍शन की इन्‍क्‍वायरी में कार्यरत कर्मियों को आर्शीवचन भी दिए जा रहे थे। एकाध शब्‍द मौसी ने भी उगला था। हमने मन ही मन अपनी भड़ॉंस पूरी की थी जबकि बच्‍चे सीढि़यॉं चढ़ते हुए जोर-जोर से "रामायण-महाभारत का पाठ" करते जा रहे थे। प्‍लेटफार्म सं. 01 पर पहुँचने और ट्रेन में चढ़ जाने के बाद भी बच्‍चे रेलवे को बख्‍शने के मूड में नहीं थे और दोनों आपस में झगड़ते हुए रेलवे को नए-नए खिताब और नया-नया नाम दे रहे थे। कुछ इस तरह- ऐडी : रेलवे कुत्‍ता है, मैडी : नहीं-नहीं, गदहा है, ऐडी : ........ मैडी : ......। बच्‍चे मौसी के डॉंटने के बाद ही चुप हुए थे। वे पानी के बोतल और छोटे बैग लेकर दो-दो बार सीढि़यॉं चढ़ने पर मजबूर करने वाले रेलवे को अपने तरीके से अपना आशीर्वाद पहुँचा रहे थे। ट्रेन चलने को हुई तो बच्‍चों ने हमारे पैर छूए और हमने मौसी के। जाते-जाते मैडी ने हमारे कान में कहा- आपका रेलवे कुत्‍ता है..। उसे समझ में आ रही थी कि हम छपरा में रहते हैं और यहां का रेलवे मेरा है जो कि घटिया है। उसका अंबाला का रेलवे ऐसी घटिया हरकत नहीं करता। ट्रेन चल दी तो हम भी लौट पड़े।
प्‍लेटफार्म से होते हुए मुख्‍य द्वार से जंक्‍शन से बाहर आते हुए फिर स्‍लोगन दिखा- भारतीय रेलवे : यात्रा मुस्‍कान के साथ...। इस बार इस स्‍लोगन पर हँसने का भी मन न हुआ। 

(भारतीय रेलवे के प्रति अमर्यादित शब्‍द हमने इरादत नहीं लिखा है, बल्कि यह इसलिए आवश्‍यक था ताकि रेलवे अधिकारियों को यह समझने में सहूलियत हो कि जब यात्रियों को परेशानी होती है तो वे किस तरह अपनी भड़ॉंस निकालते हैं... यहॉं तक कि बच्‍चे भी।)

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