शिक्षक और चोर? लगता है आ गया कलयुग

वैसे तो कलयुग ही है लेकिन कभी-कभी भ्रम हो जाता है। परंतु जब-जब कुछ अच्‍छे लोगों के कारण ऐसा भ्रम होता है, तब-तब कुछ महान कलीयुगी मेरे इस भ्रम को तोड़ने का पुण्‍य काम कर ही डालते हैं। अभी कल ही की बात है। शाम में डेस्‍क पर एक खबर आई। सारण के पानापुर से आयी इस खबर में कुछ शिक्षकों को ग्रामीणों ने पकड़ा था। पहले तो लगा कि शायद ग्रामीणों ने गलती से शिक्षक को चोर समझ पकड़ लिया होगा लेकिन पूरी खबर पढ़ने के बाद समझ में आया कि शायद सरकार ने चोरों को ही शिक्षक बना रखा है। पानापुर के नवसृजित प्राथमिक विद्यालय सिसई के एक नहीं बल्कि तीन-चार शिक्षक मिड डे मिल का चावल चोरी करने विद्यालय पहुंचे थे, वह भी पिकअप वैन लेकर। यही नहीं बगल के प्राथमिक विद्यालय का एक शिक्षक भी इस कांड में उनके साथ था। यानी, शिक्षक चोरों की पूरी गैंग थी। पढ़ने और समझ़ने के बाद विस्‍मय कम, दु:ख अधिक हो रहा था। विस्‍मय इसलिए नहीं हुआ क्‍योंकि इन नवनियोजित शिक्षकों के इससे भी बड़े-बड़े कारनामें सुनने को मिलते रहते हैं। दु:ख इसलिए हुआ क्‍योंकि शिक्षकों की हमारे मन-मस्तिष्‍क में एक ऐसी छवि बनी हुई है तो ऐसे कारनामें सुनने के बाद भी थोड़ी देर के लिए धूमिल जरूर होती है, लेकिन मिटती नहीं और इन खबरों के पुरानी होने के साथ ही शिक्षकों की वही पुरानी और स्‍वच्‍छ छवि मन-मस्तिष्‍क पर हावी हो जाती है परंतु जब इस पारंपरिक छवि को धक्‍का लगता है तब दु:ख स्‍वाभाविक हो जाता है। ऐसी खबरें पहले जब सुनी जाती थी तो लगता था जैसे समाज में भूकम्‍प आ गया। हर जगह चर्चाए होती थीं। अखबार के कार्यालयों से लेकर चौक-चौराहों तक। लेकिन धीरे-धीरे जैसे-जैसे ऐसी खबरों की संख्‍या बढ़ती गयी, वैसे ही इनकी चचाएं भी कम होती चली गईं और फिर यह सबकुछ लोगों को स्‍वाभाविक-सा लगने लगा। लेकिन, अब भी मुझ जैसे कुछ रूढिवादी लोग हैं जो सबकुछ जानते हुए भी यह मानने को तैयार नहीं होते कि ऐसा भी हो सकता है। वह जानते हैं कि ऐसा हो रहा है फिर भी सवाल करते हैं कि क्‍या ऐसा भी हो सकता है?  जब-जब ऐसे सवाल पनपते हैं, मन खुद ही जवाब देता है- कुछ भी हो सकता है, कलियुग है।

टिप्पणियाँ

लोकप्रिय पोस्ट