आह! ये दलित और नारी उत्‍थान...???

विश्‍व में अपने तरीके से अपना बढ़ा हुआ विकास दर दिखाकर भारत नाम कमा रहा है तो बिहार भी अपनी शैली में विकास दर को भुना रहा है। कभी साइकिलों से एक साथ स्‍कूल जातीं दर्जनों लड़कियों की तस्‍वीरें तो कभी विजय प्रतीक चिह़न दिखातीं महिला मुखिया। ल‍ेकिन विजय का यह प्रतीक क्‍या वाकई इनके विजयी होने का प्रतीक है? अभी बिहार में पंचायत चुनाव चल रहा है। यह पंचायत चुनाव जहां आधी आबादी की बुलंद होती तस्‍वीर बना रहा है, दलितों को मुखिया बना उन्‍हें नेतृत्‍वकर्ता की कतार में खड़ा कर रहा है, वहीं इसके पीछे की हकीकत भी बता रहा है।
हमारे मकान मालिक जो कि पेशे से वकील हैं, आजकल बड़े परेशान दिखते हैं। वे अपनी परेशानी कहते तो नहीं, लेकिन परेशानी कुछ अधिक होने के चलते झलक ही जाती है। जब मैं रात के 10-11 बजे घर पहुंचता हूं तो उन्‍हें फोन पर तेज-तेज चिल्‍लाते सुनता हूं। अब यह उनकी भी आदत में शुमार है और मेरी भी। तब तक, जब तक कि तृतीय चरण का चुनाव यहां संपन्‍न नहीं हो जाता। दरअसल, वकील साहब के पंचायत में चुनाव इसी चरण में होना है। वकील साहब की पंचायत वाली सीट दलित आरक्षित है। पिछले पांच वर्षों से अपना जनाधार बना रहे थे और अंदर ही अंदर तैयारी में लगे थे कि इस बार पंचायत के सबसे मालामाल पद पर वे ही बैठेंगे। लेकिन, नीतीश के तीर ने उन्‍हें कुछ इस कदर घायल किया है कि वे भीष्‍म पितामह की तरह रणक्षेत्र में लेटे पड़े हैं। हां, वकील साहब चूंकि आज के जमाने के हैं, इसलिए पितामह की तरह सिर्फ युद्ध देखते रहने की बजाय परिणाम लिखने में लगे हैं। लड़ नहीं सकते तो क्‍या हुआ, लड़ा तो सकते ही हैं।

रात जब मैं घर पहुंचा तो उनके द्वारा फोन पर तेज आवाज में की जा रही बातें सुनकर झल्‍लाहट होने लगी। वे अपने मुखिया प्रत्‍याशी को फोन पर, किस तरह लड़ा जाए, किस तरह भूमिहार, पंडित, राजपूत वोटरों को भी आकर्षित कर लिया जाए और किस तरह अपनी जाति वालों के वोट बहकने न दिया जाए- आदि के गुर बता रहे थे। मैं उनके कमरे में पहुंचा और उनसे इशारों में पूछा तो थोड़ी देर की बात के बाद वे मुझसे मुखातिब हुए- किसी बड़े नेता के अंदाज में, ऐसे नेता जो चुनावी सभाओं में खुद को किंग मेकर कहते नहीं थकते। वकील साहब बोलने लगे। वे जिस प्रत्‍याशी से रोज बात करते थे, वह उनके पंचायत का 5 सालों तक प्रतिनिधित्‍व कर चुका है यानी मुखिया रह चुका है। अब वह दूसरी पारी की तैयारी कर रहा है। हमने पूछा- दूसरी पारी और इतना कच्‍चा खिलाड़ी? कहे- बोका है, जब तक कुछ ना बताओ, समझता ही नहीं। जाति से हरिजन है, मेरे साथ एक ही बोरे पर बैठकर सरकारी स्‍कूल में पढ़ा है इसलिए हेल्‍प कर रहा हूं। मेरी बात भी मानता है। कल गांव के लोग बड़े उदास थे क्‍योंकि मैं वहां नहीं था।... वकील साहब की इस लाइन ने तो मेरा माथा ही खराब कर दिया। एक व्‍यक्ति के गांव नहीं रहने से पूरा गांव उदास? वह भी इस जमाने में? वकील साहब ने राज खोला- कल मैं वहां होता तो सबको भर पेट मुर्गा-भात और पाउच मिलता। कहे ना कि बोका है? जब तक समझाओ नहीं, उसको यह सब समझ में ही नहीं आता। सब मुखिया प्रत्‍याशी रोज किसी न किसी गांव वालों को सामूहिक रूप से दारू पिला रहे हैं और वह अपने गांव वालों को ही पिलाने में दिन-रात लगा हुआ है।... बात हो ही रही थी कि वकील साहब को एक फोन आया। बात करने के तुरंत बाद उन्‍होंने फिर अपने साथ्‍ा एक ही बोरे पर पढ़ने वाले प्रत्‍याशी को फोन लगा दिया- का हो? .... सिंह के इहां कुछु रहल ह?... त काहे ना गईल ह? ते कहिया सुधरबे? अभीए उनके नंबर दे तानी, तुरंत फोन क के उनसे माफी मांग अउर पूछ कि आंधी-पानी त आवता लेकिन कहेम त अभीये आ जाएम। बुरबक कही के। उनका हाथ में कम से कम पचासों वोट बा आ तु बोका राम एगो-दूगो वोट के चक्‍कर में दूसरा गांव में रात बिताव ताड़े। जल्‍दी फोन क के बताउ हमके कि का बात भईल...। फोन कटने के बाद मैंने वकील साहब से पूछा, आप जो रोज इतनी मेहनत करते हैं और शनिवार-रविवार गांव में बिताते हैं, उसके जीतने पर आपको क्‍या मिलेगा? कहने लगे- मोटरसाइकिल का सॉकर खराब है। बहुत दिनों से राजदूत पर चढ़ते-चढ़ते परेशान हूं, अब स्‍पलेंडर पर चढ़ने का मन कर रहा है। लेकिन जानते हैं, यदि अभीए हम नया मोटरसाइकिल ले लिए त सब समझेंगे कि कमा लिए। लेकिन हम बुरबक थोडि़ए हैं, एक साल बाद ही जो करना होगा करेंगे। मैंने तो खुद ही मुखिया बनना चाहा था लेकिन चलिए काम करने से ज्‍यादा मजा, काम कराने में है।... अभी वे अपना दर्शन बता ही रहे थे कि तभी फिर उनका मोबाइल बज गया। बात सुनकर लगा कि यह भी उन्‍हीं के पंचायत की एक महिला-दलित प्रत्‍याशी का फोन था। उससे भी वकील साहब उसी शैली में लगे थे। बातों से ऐसा लग रहा था कि उसकी जीत को लेकर बहुत सीरियस हैं। मैं सोच में पड़ गया कि दलित मित्र जो एक ही चट़टी पर बैठकर पढ़ा है और यह दलित महिला जो कि उनके दूसरे किसी दलित मित्र की पत्‍नी है, दोनों को एक साथ वकील साहब कैसे जीताएंगे, वह भी एक ही पंचायत से, मुखिया पद पर ही? बात खत्‍म होने के बाद मैंने अपनी उत्‍सुकता वकील साहब के सामने रख दी। वकील साहब हंसने लगे। जब बोले, उनका अंदाज पूरी तरह बदला हुआ था। इस बार की बातचीत से उनका दर्शन पूरी तरह स्‍पष्‍ट हो चुका था। बोले- आप ही बताइए कि किसी नेतृत्‍वकर्ता का पढ़ा-लिखा और योग्‍य होना जरूरी है कि उसकी विशेष जाति का, लिंग का होना जरूरी है? हम बोले- मेरी समझ से उसमें नेतृत्‍व क्षमता होनी चाहिए चाहे वह किसी भी जाति का, लिंग का हो। वकील साहब बोले- बस यही तो सच है। अब वह महिला जो क,ख,ग भी नहीं जानती, जो अपना विकास नहीं कर सकती, वह पूरे पंचायत का विकास किस आधार पर कर लेगी?... उसे छोडि़ए, उस बोका प्रत्‍याशी को ही ले लीजिए। 5 सालों तक मुखिया रह चुका है, अब तक नहीं समझ पाया कि चुनाव कैसे लड़ते हैं। रोज हमसे पूछता है कि फलां आदमी को कैसे मैनेज करे... उस गांव में काम कराने से कुछ फायदा होगा कि नहीं...? ऐसे लोगों के जीतने पर किसका भलां हो जाएगा? यदि उसे हम दिमाग नहीं देंगे तो कोई और देगा। ऐसा कोई भी प्रत्‍याशी अपने दिमाग से ना तो चुनाव लड़ने लायक है और न ही जीतने के बाद पंचायत चलाने वाला है। और जब कोई ना कोई इनके द्वारा मुखियागिरी करेगा ही, तो मैं ही क्‍यों ना करू?... अभी इन दोनों के अलावा एक और मुखिया प्रत्‍याशी को मैं सपोर्ट कर रहा हूं। इन तीनों में से कोई भी जीते मुखिया मैं ही रहूंगा।...  मैं उनके मुंह से उनका और उनके जैसे लोगों का यह दर्शन सुन दंग रह गया। उनकी बातचीत से यह तो साफ हो ही गया कि नीतीश के इस 50 प्रतिशत आरक्षण से दलितों और महिलाओं का किस तरह उत्‍थान हो रहा है। इस दर्शन को जानने के बाद मेरे मन में एक कराह उठी- आह ये दलित और नारी उत्‍थान...

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